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राजेन्द्र नागदेव की कविताएँ

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उम्मीद

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे कोई कंदील रात के तीसरे पहर टिमटिमा रही हो
पेड़ की सूखी डाल पर
और थके पाँवो की शिराओं में कर रही हो रक्त संचार
कहती हो
ख़त्म होते हैं रास्ते
खत्म होती हैं पगडंडियां
ये लंबाइयां मुसाफिर के सपनों से बडी नहीं होतीं

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे पतझड़ में फूट पड़ी हो कोई कोंपल
कोख में सहेजे
संसार भर के फूलों का पराग

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे कोठरी में बंद कैदी के लिए
दया याचना की चिठ्ठी

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे भूकंप में हिलती धरती पर गिरे पेड़ के खोखल में
बचा हुआ गिलहरी का बच्चा

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे सूखे तालाब की गर्म धूल पर
आकाश से गिरी एक बूंद

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे मरघट में कफ़न के नीचे
अचानक हिल गया हाथ

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे कटी हुई पतंग
मांझे के साथ हवा में लहराती
वापस छत पर गिरे

एक उम्मीद कभी-कभी इस तरह जगती है
जैसे जंगल की आग के ऊपर
भटक कर आ गया कोई बादल

उम्मीद कभी- कभी आती है
रेत की पहाड़ी में राई के दाने की तरह
हवा धीमे-धीमे सरसराती है पहाडी पर
राई तक पहुंचना होता है
अंतत: आदमी की उंगलियों को ही

उम्मीद को मैं सहेजना चाहता हुं
सीप में बूंद की तरह
फेफड़ों में सांस की तरह
किसी मरणासन्न के बिस्तर पर
बोतल में सलाइन की तरह
भूख के पास रोटी की तरह

मैं सहेजना चाहता हूं उम्मीद
मरुभूमी में मात्र सोते की तरह
जिस उम्मीद पर जीवित रहती है दुनिया
वह मरीचिका वाली उम्मीद नहीं होती।
*      *      *     *      *     *      *
       

  परिन्दा
     

कोई आकाश इतना बड़ा नहीं
कि पंखों को परास्त कर दे,
झुका दे परिन्दे के पर
ऐसी हवा कहीं नहीं
परिन्दा जब उड़ेगा तिनकों की खोज में
लेकर ही लौटेगा

मामूली जीव नहीं परिंदा
परिन्दे का मामूली दिखना
नज़र का मामूली होना है।
*          *         *        *

  छल
 

झींगुर नींद में
सूनी रात, सन्नाटा
चाँद पत्तों से निकल
गली में थोड़ा सा गिरा अभी-अभी

मैं कुत्तों का भौंकना सुनता हूँ अचानक
चाँद को कोसते हैं इन दिनों वे अक्सर
रोने की तरह होता है कोसना
यह रोना भिन्न सुर में है
लुटेरे बस्ती में आ गए लगता है 

दरवाजों, खिड़कियों की साँकलें ठीक करता हूँ
दीवार पर चिपकी छिपकली को करता हूँ
सारी चेतना समर्पित
यह छल है अपने आप से
पर कारगर होता है कभी-कभी
आपत्ति से आँख चुराना

कुत्तों की आवाजें
धीमी. . . धीमी. . . और धीमी
अब खो गई
कुछ हुआ तो है
क्या? असमंजस में हूँ
छिपकली का प्रताप है
या रिवाज़ इन दिनों का
कुत्तों की दोस्ती शायद लुटेरों से हो गई।
*           *         *         *
      
                    

नदी अब नहीं बहती

नदी ने छोड़ दिया है बहना
बहने के लिए देह में जल नहीं है

जल
जल कर आकाश में घुल गया
बहुत तड़पा होगा
जलने से पहले जल

धूप की चादर पर अब
नदी में सोया है
तमतमाया मरुस्थल

एक पंछी अभी-अभी मँडरा कर यहाँ
जाने कहाँ चला गया
आया होगा पुरखों के दिखाए पथ पर उड़ान भरता
साइबेरिया या अंटार्कटिका से इतनी दूर
समय कितना क्रूर हो जाता है कभी-कभी !

नदी का भीगा आंचल
किनारों पर दूर तक फैला रहता था
फूलों की तरह टंके होते थे
शंख,सीप,सदियों तक तराशे गए शालिग्राम
इन्द्रधनुष के धुंधले रंग अपने में सहेजे                                                  
चकमक पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़े                                                          
नन्हीं उंगलियों के बनाए
धीरे-धीरे ढहते रेत के अधूरे घरौंदे
सपनों में रात भर सँवरने
कल फिर                                                                            
वहीं से आगे बनाए जाने के लिए
सब सूखी रेत पर निर्जीव पड़े
कभी न लौटने वाले जीवन की
निरर्थक प्रतीक्षा में

हवा में अबतक सुनाई देती है
धोबीघाट से धोबनों के कपड़े पछीटने की आवाज
मांझियों के                                                                           
घरों को लौटते अनगढ़ गीत                                                           
दिखाई देती हैं                                                                            
जाल से उलझती                                                                             
जल के लिए तड़पती मछलियाँ
पूरा द्रश्य अभी है हवा में
पुरानी पड़ती जा रही निगेटिव फ़िल्म सा                                            
धीरे-धीरे कहानी समेट किसी दिन
फ़िल्म भी चली जाएगी
नदी की तरह कहीं
लौट कर न आने के लिए

किनारे पर दूर-दूर तक उगे घने जंगल
उजाड़ दिये
खोद डाली पहाड़ियॉ 
बादलों के विश्रामस्थल
कर दिये तहस नहस
वे आकाश पथ से निकलते रहे यात्रा में बिना रुके
नदी प्यासी रह गई

लुप्त हुई
किसी सरस्वती की खोज में
इतिहास में, भूगोल में, भूगर्भशास्त्र में
कहाँ- कहाँ नहीं गए !
अंतरीक्ष में घूमते उपग्रहों से
चीर दी प्रथ्वी की काया
और….                                                                                   
लुप्त नहीं हुई                                                                    
एक नदी को
इतिहास में खो जाने दिया
इतिहासजीवी हैं
वर्तमान से क्या सरोकार ?

भविष्य में कभी फिर इतिहास में जाएंगे
और कहेंगे
भूचाल नहीं आया था
दरकी नहीं थी धरती
किसी भयानक हलचल का होना                                                         
नहीं पाया गया
बहते-बहते पूरी नदी
जाने कैसे लुप्त हो गई !
एक छद्म अचम्भा                                                                            
हवा में तिर जाएगा

नदी का जल पी पीकर
जीती रहीं सभ्यताएं                                                                   
सभ्यताओं को पालती पोसती
मरती रही नदी
नदी को दिया जाता रहा धीमा जहर
एक दिन मरना था ही
नदी मर गई

नदी सूखती है
सूख जाता है शहर
नदी सूखती है
सूख जाते हैं नल
नदी सूखती है
सूख जाते हैं कंठ
खड़खड़ाना भूल जाते हैं बर्तन
खाली रह जाती है
बाल्टियों की पूरी कतार
उतर जाते हैं
उदासी के कुएँ में गहराई तक मन
बहुत कठिन होता है
कुएँ से फिर ऊपर निकल आना

पत्तों पर धरे दीप
सांझ की झलमल रोशनी में अब
कहाँ सिराए जाएँगे ?
कहाँ भरेंगे मेले ?
मांझियों के स्वर
कहाँ से उठेंगे ?
कहाँ तक जाएंगे ?
कहाँ से लौटेंगे ?
कहाँ तक लौटेंगे?
कैसे लोटेंगे ?
नावें रेत पर नहीं चलतीं

पुलों के पत्थर
कहाँ देखेंगे अपनी छाया-प्रतिच्छाया ?
अलस्सुबह और ढलती सांझ
साइकिल पर पुल से गुज़रता लड़का
कहाँ पाएगा पानी में साथ-साथ चलता
बिल्कुल अपने सा हमसफ़र ?
सफ़र अकेला हो गया

कई प्रश्न
प्रश्नों को जन्म देते और प्रश्न
प्रश्न ही प्रश्न
उत्तरों की जगह
नदी के सूखे पाट पर
दूर तक पसरा हुआ भयानक सन्नाटा।
***                   ***                 ***

 

नदी में सारंगी
   

शब्द जा चुके
स्वर जा चुके
इच्छाएँ, सम्भावनाएँ सब कुछ

उठ गया मेला

सब तरफ़ खालीपन
हवा से लुढकते खाली दोने
कुत्तों का रह रह कर झगड़ना
पन्नियाँ . . . मुड़ेतुड़े कागज
प्लास्टिक गुड़ियों के छूटे हुए पाँव
कलाई से रार में हार
धूल में गिरी चूड़ियों के टुकड़े,
सात दिनों बाद
भीड़ से घबराती रही हवा का मुक्त सरसराना

सर्कस का उदास तंबू
बाहर                                                         
गहरी नींद में सोया थका हुआ भोंपू
अंदर
बंद पलकों के पीछे जागे हुए जीव-
घोड़े,हाथी,औरतें,शेर,आदमी,तोते,रीछ
नींद की देह में गहराई तक धँसे
भूखे कल के पैने पंजे

अंधकार में उदास सारंगिया
समय में शेष
सारंगी भर पुराना समय
झोले में उंडेलता है,
सीडी के युग में बाँस की सारंगी
सहमी सहमी पड़ी रही अन्जान कोने में
सप्ताह भर नि:स्वर

पुराना समय अपनी झोपड़ी में                            
संभव है, अब न लौटे
नदी की धार में बहा
मुक्त कर दे समय को सारंगिया
और अतीत की खोह से बाहर निकल
सम्मिलित हो जाए समझदारों की पंक्ति में

कुछ समझदारियाँ बहुत त्रासद होती हैं
मैं नदी में सारंगी का रोना सुन रहा हूँ
*                *               *

  अंकुर
        

अंदर उठता है बवंडर  
            देह छितर जाती है
लगता है
दुनिया थम जानी चाहिए
रुक जाना चाहिए पृथ्वी का अब
विक्षिप्ता की तरह निर्विराम घूमना,
हिमयुग की प्रतीक्षा लंबी हो गई।

लगता है
भुरभुरी बर्फ में बदल जाए
धरती के संतप्त मन का भीषण हाहाकार                                                        
सड़ चुका समूचा जंगल हो ध्वस्त  
नये आदमी के नये अंकुर
नई मिट्टी में जन्में फिर। 
*                *                *

                                   राजेन्द्र नागदेव
                                   डी के 2- 166/18, दानिशकुंज
                                   कोलार रोड
                                   भोपाल-462042
             फो 0755-2411838  मो 8989569036
              ईमेल raj_nagdeve@hotmail.com

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