बुधवार, 12 अगस्त 2015

हरीश कुमार की कविताएँ - अपने ही बिखरे हुए...

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1

अपने ही बिखरे हुए
प्रतिबिम्ब को खोजता हूँ
कभी पुस्तकें
कभी बाजार
कुछ सिगरेट के टुकड़े
कुछ कोने अँधेरे से
मयनोशी से आच्छादित
कभी कुछ वस्तुएं बेमानी
शायद उपजा सके कोई
मनोरंजक सी कहानी
हिसाब किताब की मोटी
गर्द खाई फाइलों के बीच
सुरक्षा के चंद घेरे लिए
तुन्दीयल अफसरों के प्रशंसा पत्र
सब विडंबनाओं का हुजूम समेटे है
यह शायद त्रासदी होगी अगर
बचे खुचे सार्थक प्रतिबिम्ब भी
गायब हो जाये और मिट जाए
एक सार्थक चेहरे की हर सम्भावना ।

 

2

सबसे पूजनीय वो औरत भी हैं
जो उमस भरे मौसम में
कुकिंग गैस के आगे खड़ी
पकाती है गोल रोटियां और सालन
अपनी हर खीझ को मुस्कुराकर छुपाती है
कभी किसी प्रशंसा की स्नेह की
कामना किए बिना वो बस सींचा करती है
परम्पराओं के उत्तरदायित्व का बोध
हर औरत में एक मां छुपी रहती है ।

 

3

आज बगीचे में
उमस के मौसम में हवा चली है
मैं आनंदित हूँ
मन से तन से
एक तितली रंग बिरंगी
भिंडी के पौधे पर बैठी
हिलती पंख हिलाती
अच्छी सच्ची लग रही थी
मोहित होकर उसे पकड़ने को
बचपन की लालसा जगी थी
चुपचाप शिकारी की तरह मैंने
था कदम बढ़ाया किन्तु
रोक दिया इच्छा हाथ को
मन को भी झटकाया था
उड़ जाने दिया उसे पल में
मैं खुल के हंसा मुस्काया था।

 

4

आदमी
जानवर और
संगीत धीरे धीरे
अपने होने का चिह्न
तलाशते है जब भी
अकस्मात उनकी सारी भौतिकता
टकटकी लगाये खोजने लगती है
प्रकृति के मौन में उत्तर प्रत्त्युतर ।

5

आदमी की महत्वाकांक्षा
रोज यात्रा करती है
हेमिंग्वे के बूढ़े मछुआरे की तरह
आशावादी और संघर्षशीलता की
लालटेन थामे अग्रसर है पुनः
वह जानता है कि उसके हौंसले की डोंगी
लालसाओं के समुद्र में डगमगायेगी बार बार
फिर भी प्रयत्नशीलता का संस्कार
आज भी उसमे जीवित है
शायद यही उसके आदमी होने का
शाश्वत चिह्न है
जिंदगी के टुकड़े चुनने का
लिया उसने प्रण है ।

 

6

संसद का जोकर

जी हाँ मैं चेहरे बेचता हूँ
दया से लेकर कमीनेपन तक
प्यार और क्रूरता का हर रंग
बड़ी गहराई से रंगा गया है
चुनावी दिनों के लिए खास
सबको आता है बड़ा रास
यही नहीं पुरे पांच साल का
पैकेज ऑफर भी उपलब्ध है
हर आदमी जिससे स्तब्ध है
आइये एक बार आजमाइए
पुरे दिन पहन कर घूमिए
बस रात को धो सुखाइए ।

 

7

अभिव्यक्ति

मैं हर बार लौटती रही
तुम्हें पुकारा कितनी बार
भावनाओं के बचे खुचे
अंतिम कुछ टुकड़े
मैं ही सुलगाती रही
घुलती रही तुम्हारें मौन में
कड़वी स्याही बनकर कि
यदा कदा तुम अपनी ही खोई
परम् अभिव्यक्ति को पा लो
कर पाओ स्वयं से साक्षात्कार ।

 

8

आओ दौड़ चले
सड़क की उस ओर
आज भी घास का जंगल
कंक्रीट के उस पार
बचपन के रंग ओढ़े
हमें वापस बुलाता है
इससे पहले कि
निकल जाए वो बादलों की छाया
आओ देखलें ऊँचे पेड़ो से
उन्हें गले मिलते हुए ।

 

9

नगर में बारिश हो रही है
बाजार में गलियों में पानी खड़ा
जैसे अपनी जिद पे अड़ा
नगर प्रधान की बीवी फिर भी
खड़ी छत पे मुस्कुरा रही है
चुनाव के बाद जैसे
अपना रुआब जमा रही है
लोग परेशां है जैसे सदा से थे
सपने उनके अब बड़े न थे
पानी के बीच घसीटते स्कूटर
मिल में बजता जोर का हूटर
घर से काम औ काम से घर
आवाज दबी सी हुई बेअसर
कनखियों से देखते आगे बढ़ रहे
गड्ढो से खैर अपनी मना रहे
अपने जूते चप्पल बचा रहे थे
विकास का गाना बड़बड़ा रहे थे ।

 

10

वो विचार ही क्या
जिस पर न हो पुनर्विचार
वो परम्परा ही क्या
जो सहे न तर्क की धार
वो व्यवहार ही क्या
जिसमे न कोई आचार
वो आदर ही क्या
जो भय से हो साकार -

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हरीश कुमार

गोबिंद कालोनी , गली 0-

बरनाला ,पंजाब

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