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भारत-चीन मैत्री का एक विशेष सूत्र है "हिंदी भाषा"

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चीन के गुवांगडाँग विश्वविद्यालय के हिंदी के वरिष्ठ प्रोफ़ेसर डॉ.गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'से एक भेंट वार्ता

- बिनय कुमार शुक्ल

सूरत में एक साहित्य सम्मलेन के दौरान मेरी मुलाक़ात डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा'गुणशेखर' जी से हुई | शर्मा साहब वर्तमान समय में चीन के गुवांगडाँग विश्वविद्यालय में हिंदी के वरिष्ठ प्रोफ़ेसर हैं | चीन सरकार के विशेष आग्रह पर उक्त विश्वविद्यालय में डॉ. शर्मा जी को विदेश मंत्रालय द्वारा प्रोफ़ेसर के पद पर प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया है | उनका जन्म उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के समशेर नगर नामक स्थान पर हुआ था | प्रारंभिक और पूएव माध्यमिक शिक्षा गाँव में तथा उच्चतर माध्यमिक और स्नातक तक की शिक्षा महमदाबाद (अवध) में बाद में लखनऊ से उन्होंने हिन्दी साहित्य में परास्नातक से एम.एड और पी.एच.डी तक का सफ़र पूरा किया | विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की प्रवक्ता पात्रता परीक्षा के साथ-साथ फ़ेलोशिप भी प्राप्त की। लखनऊ विश्वविद्यालय में कनिष्ठ व वरिष्ठ शोध अध्येता रहे।इस समय चीन में हैं । इसके पूर्व ये ईरान में भी हिंदी सेवाएँ दे चुके हैं।इसके अलावा देश में भी लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन(आई ए एस) अकादमी ,मसूरी जैसे भारत के प्रतिष्ठित प्रशिक्षण संस्थान में सहायक प्रोफेसर रह चुके हैं

स्नातक से साहित्य के पठन-पाठन एवं लेखन में उनकी रुचि पैदा हुई | हिन्दी के अनेक पत्र- पत्रिकाओं में उनके लेख,कविता और कहानी प्रकाशित होते रहे हैं | उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों में एक दोहा संग्रह 'डरा हुआ आकाश',गज़ल संग्रह'परधान के हराम में','अफसर का कुत्ता' और 'पुलसिया व्यायाम' व्यंग्य संग्रह,'दलित साहित्य का स्वरूप विकास और प्रवृत्तियाँ'आलोचना की पुस्तक,'स्त्रीलिंग शब्दमाला और अरबी फारसी की व्यावहारिक शब्दावली नाम से दो लघु शब्द कोश, विदेशी भाषा के रूप में हिंदी के अध्ययन -अध्यापन के लिए समरूप पद्धति के आधार पर लिखी गई An Introductory Hindi Reader,'भारत के बहुरंगी दृश्य,नाम से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों द्वारा गंभीर मुद्दों पर लिखे निबंधों के संग्रह का संपादन,विदेशी विश्व विद्यालयों में पढ़ाए जाने के उद्देश्य से 'हिन्दी साहित्य का सरल और संक्षिप्त इतिहास' आदि महत्त्वपूर्ण पुस्तकें हैं। इनके साथ-साथ समय-समय पर दलित,बाल और स्त्री विमर्श पर आलोचनात्मक एवं अन्य गंभीर मुद्दों पर प्रकाशित आलेख और कविताएँ इनके सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़े होने का प्रमाण हैं। उन्हें विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय समय पर सम्मानित किया जाता रहा है जिनमें साहित्य शिरोमणि सम्मान", "तुलसी सम्मान", “सृजनगाथा सम्मान" 'विश्व हिन्दी सेवा सम्मान' प्रमुख है | चीन में कार्यरत होते हुए भी विश्व भर में साहित्य चर्चा के लिए उनका भ्रमण अनवरत चलता रहता है | उनके साथ की गई वार्ता के अंश निम्नलिखित हैं :-

हिंदी एक सर्वाधिक आसान भाषा है एवं चीन की भाषा विश्व की कठिनतम भाषाओँ में से एक है, ऐसे में हिंदी के विद्वान द्वारा चीन के लोगों को हिंदी भाषा का प्रशिक्षण देने की बात एक चुनौती भरा कार्य है | इस सम्बन्ध में मैंने उनका विचार पूछा |

डॉ. शर्माजी ने बताया कि चीन के छात्रों में हिंदी सीखने के प्रति एक विशेष रुझान है | इस रुझान की वजह से हिंदी शिक्षण वहां बहुत ही सुगम है | आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि प्रथम वर्ष में वर्णमाला सीखने वाले विद्यार्थी तीसरे वर्ष में आते ही मुझे हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने में मदद किए | जहां तक चीनी भाषा की कठिनता का प्रश्न है ,मेरे विचार से भाषा कठिन और सरल होने से पहले भाव सम्प्रेषण का एक माध्यम है |इसमें जिस स्तर की रुचि होगी उसी के अनुरूप सीखने में समय लगेगा। मैं भी वहां रहकर कामचलाऊ चीनी भाषा बहुत ही सुगमता से सीख गया |

मैंने पूछा कि कहा जाता है कि विविधताओं में भी समानता होती है | चीन और भारत में असंख्य विविधता हो सकती है ,इसके बावजूद कई प्रकार की समानताएं होंगी | शायद इसी कारण से "हिन्दी चीनी भाई भाई" का नारा दिया गया होगा | इस नारे की सच्चाई झलकती हो ऐसा कोई वाकया बताइये |

डॉ. शर्माजी ने बताया कि चीन एवं भारत की संस्कृतियाँ विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियाँहैं |दोनों जल और प्रकृति को विशेष महत्त्व प्राप्त है। दोनों समाज सहयोग को बहुत महत्त्व देते हैं। दोनों संस्कृतियों एकता और संगठन का बड़ा महत्त्व है। भारत की सिंधु घाटी की सभ्यता की तरह चीन की पीली नदी की सभ्यता है जो इससे भी पुरानी है लेकिन बहुत लंबे कालखंड से थोड़े -बहुत परिवर्तन के साथ आगे भी चलती रही।न नदी लुप्त हुई और न सभ्यता । आज भी इस नदी को हवांगहो के नाम से जाना जाता है।

चीन के छात्रों में हिंदी सीखने की अभिरुचि कैसे जागृत हुई इस विषय में हमने उनके विचार जानना चाहा |

उन्होंने बताया कि चीन में आजकल चलें भारत की ओर का विचार लिए हुए गाँव- गाँव में हिंदी सीखने की अभिरुचि बढ़ी है |इसका मुख्य कारण है चीन का भारत से व्यापार एवं सांस्कृतिक रिश्ते बढ़ाने की पहल |चीनी वस्तुओं का व्यापार पहले से ही भारत में फल फूल रहा है | सांस्कृतिक सम्बन्ध जुड़ जाने से और भी प्रगाढ़ता आएगी |

मैंने पूछा कि लिखने और पढ़ने की बात तो ठीक है किन्तु बोलचाल में अन्य भाषा समझना थोड़ा कठिन तो होता ही है , ऐसे में चीनी विद्यार्थियों की समस्याएं आसानी से हल करने करने में जो अड़चनें आती हैं उनका समाधान आप कैसे करते हैं ?

उन्होंने बताया कि लिखने- पढ़ने एवं बोलने में हिंदी जितनी आसान है उसके उलट मंडारिन(चीनी भाषा) बोलचाल में जितनी आसान हैं , लिखने-पढ़ने में उतनी ही कठिन है |चीनी विद्यार्थियों को हिंदी सिखाने में ट वर्ग , त वर्ग एवं च वर्ग की ध्वनियों में अंतर करना सिखाने के बाद राह आसान हो जाती है | शेष वे स्वयं की रुचि के कारण अपेक्षाकृत जल्दी सीखने की कोशिश करते हैं |इसलिए सिखाने में बहुत दिक्कते नहीं आती हैं | 

कहा जाता है कि यदि आप किसी और देश में जाकर बसना चाहते हैं तो उस परिवेश में खुद को रहने लायक बनाने के दो ही उपाय हैं । पहला तो यह है कि आप वहां के लोगों को या तो अपनी भाषा सिखा दीजिये या उनकी भाषा सीख लीजिये | इस सम्बन्ध में आपने क्या किया ?

उन्होंने बताया कि कुछ उन्होंने उनसे सीखा एवं कुछ उनको सिखाया | उन्होंने यह भी बताया कि आप चाहे जितने प्रयास करके उनको अपनी भाषा सिखा दीजिये पर जबतक उनकी भाषा नहीं सीखेंगे खासकर चीन में तो गुजारा असंभव नहीं तो बहुत मुश्किल अवश्य है |सब्जी वाले,टैक्सी ड्राइवर और परचून वाले को आसानी से न हिंदी सीखा पाएंगे और न अङ्ग्रेज़ी । इसलिए आसान यही है कि जीने के लिए उन्हीं की भाषा सीख लें।

किसी भी देश को जानना है तो वहां की भाषा के अलावा उनकी संस्कृति एवं साहित्य को जानना परम आवश्यक है | हमने चीन के सम्बन्ध में उनका विचार पूछा |

उन्होंने बताया कि भारत एवं चीन के आमाजिक और सांस्कृतिक मूल्य मिलते हैं |यहाँ भी परोपकार एवं उदारता का जीवन दर्शन अपने देश की तरह ही है | संगठन एवं सहयोग इस संस्कृति में खूब है | लेकिन श्रम जहाँ अपनी संस्कृति अनादृत हो रहा है यहाँश्रम इस संस्कृति का सबसे आदृत पक्ष है और सामाजिक और आर्थिक उन्नति का मेरुदण्ड भी है |

मैंने उनसे पूछा कि मीडिया की बात देखें तो चीन एवं भारत के सम्बन्ध में अधिकांशतः नाकारात्मक समाचार ही आते रहते हैं |इन परिस्थितियों में कोई सकारात्मक पहलू बताइये जिससे दोनों देशों की मैत्री प्रगाढ़ हो सकती हो |

उन्होंने बताया कि मीडिया ने भारत को भी ऐसा बदनाम करके रखा है कि चीनी समाज को हर भारतीय शोषक एवं बलात्कारी लगता है। समूचा समाज नियम एवं कानून विहीन लगता है |इसके पीछे सबसे अधिक दोषी हमारे अपने ही न्यूज चैनल हैं। बलात्कार की खबरों में इनकी जितनी रुचि है उतनी अच्छे काम करने वालों के कर्म दर्शाने में नहीं। चाहे कैलाश सत्यार्थी हों या अंशु गुप्ता इन्हें नोबल और मैग्सेसे सम्मान के पहले कितने लोग जानते थे?क्या इं मीडिया वालों का दायित्व नहीं बनता था कि उनके अच्छे कामों को प्रकाश में लाएँ।इसी की ज़गह अगर इनकी कोई बदनामी की झूठी-सच्ची कैसी भी बात होती तो इनके अन्तः कक्षों तक में घुसने की चेष्टा करते पाए जाते। इन चैनलों की प्रवृत्ति को देखते हुए इन्हें न्यूज़ के बजाय न्यूड चैनल कहना अधिक तर्कसंगत लगता है।इन्होंने अपने देश की छवि को बहुत क्षति पहुंचाई है।लोगों के आने-जाने और व्यापार से धीरे-धीरे सोच बदल रही है | वे भी इंसान हैं और हम भी | हम दोनों को एक दूसरे को और भी करीब से समझने की जरूरत है |

मैंने डॉ. शर्माजी के बारे में सुन रखा था कि ये इसके पूर्व भी हिंदी के प्राध्यापक के रूप में किसी अन्य देश में भी रह कर आ चुके हैं | मैंने उनसे उस देश एवं चीन में हिंदी के बारे में जानना चाहा |

उन्होंने बताया कि वो चीन के पहले ईरान गए थे | ईरान की भाषा फ़ारसी है | कामचलाऊ फ़ारसी तो वे दो ही महीने में सीख गए थे किन्तु अच्छी पकड़ वाली कामकाजी चीनी दो साल में भी नहीं सीख पाए|

ऐसा देखा जा रहा है कि विदेशों में हिंदी सीखने का रुझान बढ़ रहा है चाहे विदेशियों के मन में हो या फिर वहां बसे प्रवासी भारतीयों में | इसके इतर देखा जा रहा है कि भारत में सरकारी कार्यालयों में आंकड़ों में तो हिंदी पसर रही है परन्तु तथ्य यह है कि अब भी अधिकांश कार्य एवं पत्राचार अंग्रेजी में ही किया जा रहा है | इस मानसिकता में बदलाव हो इस सम्बन्ध में मैंने उनका सुझाव मांगा |

उन्होंने बताया कि यह बात सत्य है कि भारत में हिंदी उपेक्षित है | यह शुभ लक्षण नहीं है | मैंने मलेशिया एयर लाइंस से यात्रा किया , वो हिंदी बोल रहे थे परन्तु जब मैं भारतीय एयर लाइंस में यात्रा किया तो अंग्रेजी झोंकी जा रही थी | यहाँ बिना जरूरत के अंग्रेजी बोली जाती है | भारतीय अधिकारी जितनी श्रम शक्ति का नाश करते हैं उतना किसी देश के नहीं। अंग्रेज़ी में प्रारूप बनवाते हैं फिर अनुवाद करवाते हैं।मूल में हिंदी में काम करने शर्म आती है।हिंदी में काम करने इतनी लाज तो गोरों को भी नहीं जितना काले अंग्रेजों को आती है। ऐसा अभागा देश शायद ही कोई हो जहाँ जरूरत की चीजें उपेक्षित एवं गैर जरूरी चीजें सर-माथे धारी जाती हों |चीन में उच्च शिक्षा का कामचलाऊ माध्यम भी मंडारिन (चीनी भाषा)ही है | इसलिए चीन आगे जा रहा है | चीनी लोग अंग्रेजी को एक भाषा से अधिक कुछ भी नहीं मानते हैं |चीन क्या रूस,जापान और टर्की जैसे देशों ने अपनी भाषा में ही गौरव समझा है। यही हमें भी करना होगा |

मैंने उनसे पूछा, दूसरे देशों खासकर पड़ोसी देशों से मैत्री सम्बन्ध प्रगाढ़ करने में अंगरेजी के बजाय हिंदी एवं हमारी संस्कृति एक सेतु बन सके इस सम्बन्ध में आपकी क्या राय है ?

उन्होंने बताया कि पड़ोसी देश से रिश्ते बनाने के लिए हिंदी ही काम आएगी क्योंकि रिश्ते बनाने में भाषा और संस्कृति दोनों की बराबर भूमिका होती है | हमारी संस्कृति की संवाहिका हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ हैं , अंग्रेजी नहीं | ईरान में ही हमने देखा था कि वहां हिंदी फिल्में चीन से अधिक देखी जाती हैं | वहां भारतीय पुरुष को देखकर ख़ुशी से उछल पड़ते थे और सलमान , शाहरुख़ और अमिताभ बच्चन कह कर पुकारते थे | स्त्री को देखकर ऐशवर्या राय , हेमामालिनी और माधुरी दीक्षित कहकर पुकारते थे | यहाँ वैसा जूनून नहीं है लेकिन हिंदी फिल्मों के शौकीन लोग यहाँ भी हैं |अगर टीवी चैनलों ने कबाड़ा न किया होता तो भारतीय लोगों के प्रति अच्छी सोच यहाँ भी रही है। आम लोगों में पाकिस्तानी लोगों के प्रति न तो वहाँ कभी अच्छी धारणा थी और न यहाँ ही रही है। भाषा सांस्कृतिक पुल होती है। यदि हम पुल ही अंग्रेज़ी की ओर बनाएंगे तो प्रवाह भी उधर ही होगा। अपनी संस्कृति की ओर तो होगानहीं । अच्छा है कि हम अब भी स्वदेश और स्व संस्कृति की ओर लौट आएँ। सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो भूला नहीं कहा जाता ।ज़्यादा समय बाद लौटने से परिस्थितियाँ बेकाबू हो चुकी होंगी।

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