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स्मृति लेख - मेरा दोस्त प्रोफेसर पुष्पपाल सिंह

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

आज दिनांक 28 अगस्त, 2015 की रात को डॉ. कमल किशोर गोयनका का मोबाइल आया। ”महावीर ¡ मैं आगरा से लौट रहा हूँ। एक बुरी खबर है। हमारा दोस्त पुष्प पाल नहीं रहा”। कमल जानते थे कि इस समाचार को सुनकर मुझे कितनी पीड़ा होगी। सन् 1954 के बाद के वर्षों में इन्टर कॉलेज की मित्र मंडली में हम चार अंतरंग एवं आत्मीय मित्र थे। (1) मैं स्वयं (2) कमल किशोर गोयनका (3) पुष्प पाल सिंह (4) नरेन्द्र देव शर्मा। हम चारों में से नरेन्द्र जर्मनी चला गया और वहाँ लुफ्तांज़ा एयरलाइन्स में प्रशासनिक अधिकारी हो गया। शेष हम तीनों ने हिन्दी में स्नातकोत्तर अध्ययन तथा शोध कार्य किया। सन् 1964 में, मेरी नियुक्ति जबलपुर के विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी एवं भाषाविज्ञान विभाग में हो गई। भौगोलिक दूरी के कारण मेरा पुष्प पाल से उतना मिलना जुलना नहीं हो पाया। मगर कमल किशोर गोयनका से पुष्प पाल सिंह के समाचार मिलते रहे।

सन् 2001 में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक पद से सेवा निवृत्त होने के बाद मेरा डलहौजी जाना हुआ। शायद सन् 2003 या सन् 2004 की बात है। तब तक दूरसंचार की सुविधा हम दोनों को सुलभ हो गई थी। मैंने जब पुष्प पाल को अपने डलहौज़ी जाने के कार्यक्रम से अवगत कराया तो उनके आग्रह ने मुझे रास्ते में एक रात पटियाला में रुकने पर विवश कर दिया। अगले दिन पटियाला से लौटने से पहले हमको सपरिवार पुष्प पाल के घर नाश्ते का जो सुखद सौभाग्य प्राप्त हुआ, उसकी यादें आज मानस को गहरे से उद्वेलित कर रही हैं। जब किसी अपने के निधन का समाचार मिलता है तो सबसे अधिक वे यादें ताजा हो उठती हैं जिन्होंने आपके मन में बहुत गहरे पैठ बनाई हो। नाश्ते की सामग्री से अधिक महत्वपूर्ण मेरे मित्र को वह हार्दिक उल्लास था जो छलक-छलक रहा था। मेरे लिए पटियाला से पुष्प पाल जुड़ गए।

पिछले कुछ वर्षों से पुष्प पाल केन्सर के पीड़ित थे। इस कारण वे सपरिवार पटियाला से दिल्ली आकर बस गए थे। इसी वर्ष मार्च के महीने में मेरा सपत्नीक पटियाला विश्वविद्यालय जाना हुआ। वहाँ के “गुरु गोबिन्द सिंह धर्म अध्ययन विभाग” के संयोजकत्व में “आचार्य तुलसी स्मारक व्याख्यानमाला” के प्रसंग में, मुझे विश्विद्यालय में व्याख्यान देना था। मुझे और मेरी पत्नी को पुष्प पाल सिंह और उनकी धर्मपत्नी की पटियाला में कमी बहुत महसूस हुई। लौटकर मेरी पुष्प पाल से बात हुई। बता रहे थे कि रिकवरी बहुत अच्छी है। मन को संतोष हुआ। अचानक कमल के द्वारा मोबाइल पर दिए गए दुखद समाचार ने शोक संतप्त कर दिया। ऐसे क्षणों में स्मृतियों का दबाब इतना आलिप्त और संसिक्त होता है कि उनकी अभिव्यक्ति के लिए भाषा लाचार हो जाती है। मुझकों विगत पचास वर्षों में मेरे जिन आत्मीय जनों ने पत्र लिखे, उनमें से डॉ. अनूप सिंह को जो पत्र अति महत्वपूर्ण लगे, उनको चयनित कर उन्होंने पुस्तक प्रकाशित की है। उसमें से मेरे दोस्त के वे तीन पत्र जो मेरे संस्थान में निदेशक बनने के पहले के हैं, पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं -

 

(पत्र संख्या – एक)

पटियाला

दिनांक 25-02-1990

प्रिय भाई डॉ. जैन जी,

सप्रेम नमस्कार।

बड़ा अपूर्ण-सा पत्र था किंतु फिर भी आपके द्वारा प्रेषित संगोष्ठी के शोध-पत्र एवं विवरण प्राप्त हुए। आभार।

आपने इस रूप में स्मरण किया बड़ा अच्छा लगा। आपकी प्रगति देख कर हृदय हर्ष से पुलकित होता है। जब-तब आपके समाचार डॉ. गोयनका से मिलते रहे हैं। साल में दो-एक बार डॉ. गोयनका के यहाँ रुकना होता है।

मैं पिछले सात वर्षों से विश्वविद्यालय में हूँ। आप कभी इध्रर दर्शन दें-यदि आने की सुविधा हो तो परीक्षक – एम. फिल., पी.एच.डी. - के रूप में बुलाने की सुविधा हो सकती है। अपना मन लिखिए। मेरा भोपाल आना तो एक नवगीत समारोह में हुआ था। जबलपुर कभी नहीं आया हूँ। कभी आया तो दर्शन कर सुख प्राप्त करूंगा।

परिवार में सभी को यथायोग्य।

आपका

पुष्प पाल सिंह

 

(पत्र संख्या – दो)

पटियाला

दिनांक 13-06-1990

प्रिय भाई जैन जी,

सप्रेम नमस्कार।

सपरिवार स्वस्थ सानंद होंगे।

इतने सुदीर्घ अंतराल के पश्चात अबकी बार हुई यह अल्पकालिक भेंट अत्यंत आत्मीय और स्मरणीय थी। विशेषतः भाभी का स्नेह और पुनः आने का आमंत्रण याद रहेगा- देखो कब संभव हो पाता है।

महावीर भाई, मुझे लगता है, लगता क्या हैं तथ्य ही है। यह कि हम सबमें उस अंतरंग मण्डल में नरेन्द्र, कमल, तुम और मैं- तुम्हारी उपब्ध्यिाँ और पदेन उन्नति सबसे अच्छी रही- तुम्हारी इस उपलब्धि पर मुझे गर्व की अनुभूति होती है। अपना भाई यहां तक तो पहुँचा- इसी में आत्मतोष है। प्रभु करे तुम उन्नति के और भी सोपान आयत्त करो, मेरी अनंत शुभ कामनाएं! 35-40 बरसों में तो अब मिले थे- देखें अब कब मिलना होता है। होता भी है या नहीं- सब प्रभु-इच्छा अधीन है।

भाभी को नमस्कार कहिए।

आपका

पुष्प पाल सिंह

 

(पत्र संख्या – तीन)

डॉ. पुष्यपाल सिंह

डी. फिल, डी. लिट्.

हिन्दी विभाग

63 केसर बाग, पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला

निकट एन.आई.एस. पटियाला-148001

दिनांक 26-10-1991

प्रिय भाई डॉ. जैन जी,

सप्रेम नमस्कार।

सुखद संयोग कि मैं दिल्ली से डॉ. कमल किशोर गोयनका जी के यहां से लौटा तो आपका पत्र एक अर्से बाद मिला। पहली बार श्रीमती जी वहां गयी थीं। गोयनका भाई और भाभी का बहुत आग्रह वर्षों से था कि कभी सपत्नीक आऊं। दिसम्बर में बेटी का विवाह है, उसी सिलसिले में शॉपिंग के निमित्त गये थे।

रही बात प्रोफेसरशिप की!! बंधु! ‘सकल पदारथ है जग माँहिं, करमहीन नर पावत नाहीं’ सो अब ऐसी कोई स्पृहा नहीं है कि मैं प्रो. होऊँ ही, सुविधापूर्वक जो मिल जायेगा उसे स्वीकारना अच्छा लगेगा। पटियाला मैं तो दूर-दूर तक कोई दिक्कत नहीं है। किन्तु आर्थिक पक्ष भी देखना होगा कि पिछली सर्विस को मान्य समझा जाये। यहां पैंशन योजना भी लागू हो गयी है। इन सब पक्षों पर विचार कर स्थान छोड़ा जा सकता है। वैसे भी पंजाब के हालात प्रीतिकर नहीं हैं। बड़ी बेटी का विवाह हो ही जायेगा, अब लड़का फरीदाबाद चला गया है। अभी दो बेटियां और हैं- M.A. Psychology तथा X में। इस समय अगर कोई उपयुक्त अवसर बाहर होता है तो मैं कोठी आदि बेचकर जा सकता हूँ। अतः कोई अच्छी संभावना देखें तो लिखें।

पिछले वर्ष एम.फिल. के लिए आपका नाम था किंतु मार्च 1991 में जल्दी-जल्दी सभी प्रबंध यहीं चण्डीगढ़ से रातों-रात कर लिये गये। पी-एच.डी. में कई बार आपका नाम दे चुका हूँ किंतु टिक हो नहीं पाया। यह सब इसलिए कि मिलने का अवसर मिल सके।

सुविधा होते ही नरेन्द्र को पत्र लिखूँगा।

कभी-कभी पत्र डालते रहें। परिवार में सबको यथायोग्य।

आपका

पुष्पपाल सिंह

 

मैं जर्मनी में नरेन्द्र को इस दुखद समाचार से अवगत कराने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ। जब मैं ही इतनी मर्मान्तक पीड़ा सहन कर रहा हूँ तो विदेश में रहने वाले अपने मित्र को यह कष्टदायक समाचार देने का पाप क्यों मोल लूँ। मगर यदि समाचार नहीं देता तो क्या यह उलाहना सुनना नहीं पड़ेगा कि तुमने समाचार क्यों नहीं दिया। बड़ी उलझन, कशमकश और दुबिधा है। मैं इस समय स्मृतियों के रथ में घूमने वाला एक पहिया मात्र हूँ

---

 

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव

बुलन्दशहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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