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बड़ा ही मुश्किल है जंगलियों को पालतु बनाना

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डॉ. दीपक आचार्य

 

जो जैसा है वैसा ही रहने वाला है।

और ऎसा इसलिए है कि जिसका बीज जैसा होता है वैसा ही पेड़ बनता है, वैसे ही टहनियाँ फैलती हैं और उसी प्रकार के फल भी लगते हैं।

फिर जिन बीजों को परंपरागत गर्भाधान संस्कारों से उपचारित ही नहीं किया गया हो, उनके बारे में कुछ भी कहना समय गँवाना ही है और ऎसा करना अपनी ऊर्जाओं को बेवजह खपाकर आत्म ऊर्जाहीन होना ही है।

अब दूसरे किसी भी प्रकार के भेद कहीं नज़र नहीं आते। अब दो ही प्रकार रह गए हैं । एक जंगली की तरह व्यवहार करने वाले हैं और दूसरे पालतु।

अब दोनों का ही कुछ नहीं कहा जा सकता। अपने-अपने लाभ, स्वार्थ और कामों को देखकर कोई किसी भी वक्त आकस्मिक रूप से पाला बदल सकता है, अपनी भूमिकाओं में अनपेक्षित बदलाव ला सकता है और अप्रत्याशित हरकतों से जमाने भर को छका सकता है।

भरोसा किसी पर भी नहीं किया जा सकता।  अब न किसी को पालतु की श्रेणी में रखा जा सकता है, न जंगली की। अपने-अपने कामों और अवसरों को देख पाला बदल डालने में सारे के सारे माहिर हो गए हैं।

दिन में जिसे पालतुओं के डेरों में देखा जाता है, रात के अंधेरों में वह जंगलियों में डेरों में जाकर मौज-मस्ती में खो जाता है और अंधेरा रहते-रहते फिर लौट आता है पालतुओं के डेरोें में। किसी को कानों कान भनक तक नहीं पड़ती इनके कारनामों की।

यों ही जंगलियों के डेरों से यकायक निकल कर दिन उगते ही कोई शालीनता का स्वाँग रखकर पालतुओं के डेरों में आ धमकता है और आदर्शों की बातें करते हुए सभी को भ्रमित करता हुआ सूरज के लौटने के साथ ही फिर जा घुसता है अंधेरों की सियासत करने वाली माँद में अपने जंगलराज की आग को सुलगा कर अलाव तापने और दूसरों को तपवाने।

संस्कारहीनता और स्वार्थपरता के मौजूदा दौर में बड़ा ही मुश्किल है किसी की प्रवृत्तियों को बदलना। 

इसका मूल कारण यह भी है कि आजकल मुखौटा संस्कृति हावी है, लोग अपने चेहरे छुपाने लगे हैं, बदलने लगे हैं और अवसरों को देखकर मुखौटे पहनने और बदलने लगे हैं।

सबकी पहचान खो चुकी है। मुखौटे और अवसर ही हैं जो पहचान कराते हैं, और अवसर निकल जाने के बाद पहचान खत्म हो जाती है अथवा बदल जाती है।

एक इंसान पूरी जिन्दगी असंख्य मुखौटों के साथ जीता है और मुखौटों को यहीं पर रखकर सिधार जाता है। फिर मुखौटों से कहीं अधिक बार जुबाँ फिसलती रहती है, झूठ का रस चाटती हुई सत्य को भ्रमित करती रहती है।

हमारी न कथनी में सच रहा है, न करनी में।  हर अंग अपने आप में द्वीप की तरह होता जा रहा है। पहले मन-मस्तिष्क और हृदय सारे मिलकर किसी एक काम को अंजाम देते थे और वह काम अप्रत्याशित सफलता का इतिहास रचता था।

आजकल सारे अंग अलग-अलग काम करने लगे हैं। आदमी की वाणी और व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर है, हाथों की मुद्राओं और चरणों के चलन में कहीं कोई साम्य नहीं है, आदमी का सोचना, बोलना और करना सब कुछ भिन्नताओं से भरा होता जा रहा है।

लगता है जैसे आदमी कुछ देने नहीं बल्कि लेने ही लेने के लिए आया हुआ है। संस्कारों के पलायन की स्थिति हर तरफ लगभग एक जैसी है, शिक्षा के मामले में हमने बहुत सारी ऊँचाइयां भले ही पा ली हों, संस्कारहीनता ने हमें अपनी जड़ों से इतना अधिक काट डाला है कि इन मानवीय मूल्यों का पुनरुद्भवन संभव ही नहीं है। हम चाहे कितना ही कुछ कर लें जंगलियों को पालतु बनाना संभव है ही नहीं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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