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भाषा शिक्षण

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

 

‘भाषा शिक्षण’ के तीन आयाम हैं –

1. मातृभाषा के रूप में शिक्षण

2. द्वितीय अथवा अन्य भाषा के रूप में शिक्षण

3. विदेशी भाषा के रूप में शिक्षण

मातृ भाषाशिक्षण के समय शिक्षार्थी अपनी भाषा का आधारभूत ज्ञान प्राप्त कर चुका होता है जबकि द्वितीय एवं विदेशी भाषाशिक्षण के अधिगम में शिक्षार्थी की मातृभाषा की ध्वनि एवं व्याकरणिक व्यवस्थाओं की सीखी हुई आदतें व्याघात पैदा करती हैं। मातृभाषा की अर्जित भाषिक आदतें भाषा-अधिगम में बाधा पहुँचाती हैं। अन्य भाषाशिक्षण के दो भेद माने जा सकते हैं - 1. द्वितीय भाषा 2. विदेशी भाषा। इसे अन्य भाषाशिक्षण के रूप में जब हिन्दी शिक्षण पर विचार करते हैं तो द्वितीय भाषा तथा विदेशी भाषाशिक्षण का मुख्य अन्तर यह है कि भारत के हिन्दीतर भाषियों तथा हिन्दी भाषियों के बीच सामाजिक सम्पर्क होते रहने के कारण उनमें परस्पर सांस्कृतिक एवं भाषिक एकता के सूत्र विद्यमान हैं जबकि विदेशी भाषियों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग होने के कारण उनको हिन्दी भाषा के सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों को भी सिखाने की जरूरत होती है। शिक्षार्थी की मातृभाषा की अपेक्षा से द्वितीय भाषाशिक्षण और विदेशी भाषाशिक्षण दोनों ही इतर अथवा अन्य हैं। यह भी कहा जा सकता है कि द्वितीय एवं विदेशी भाषा दोनों ही मातृभाषा की तुलना में अन्यभाषा हैं।

1.मातृभाषा के रूप में शिक्षण

एक बच्चे का लालन-पोषण जिस परिवार में होता है, वह उस परिवार के सदस्यों की भाषा को सहज रूप में सीख लेता है। सामान्य रूप से पाँच वर्ष की आयु का बालक अपनी माँ, परिवार के सदस्यों, मित्रों तथा मिलन-जुलने वालों के बीच रहकर अनौपचारिक रूप से मातृभाषा को बोलना सीख लेता है। जब वह किसी विद्यालय में पढ़ने के लिए प्रवेश लेता है तो वहाँ उसको उसकी मातृभाषा के भाषा-क्षेत्र की मानक भाषा का उच्चारण, पढ़ना और लिखना सिखाया जाता है।

यह सर्वमान्य है कि प्रत्येक व्यक्ति की भाषिक दक्षता विदेशी भाषा की अपेक्षा मातृभाषा में अधिक होती है। इसी कारण मातृभाषा के द्वारा किसी विषय को अधिक आसानी से समझा जा सकता है और उसके द्वारा विचार की अभिव्यक्ति अधिक प्रभावपूर्ण ढंग से की जा सकती है। सम्प्रति, मैं हिन्दी माध्यम से ज्ञान विज्ञान के विभिन्न विषयों का विश्वविद्यालयीन स्तर पर शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थियों की भाषिक दक्षताओं की अभिवृद्धि की समस्याओं और उनके समाधान के सम्बंध में निवेदित करना चाहता हूँ। इस तथ्य पर आम सहमति है कि विश्वविद्यालयीन स्तर पर ज्ञानविज्ञान की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा का विशिष्ट रूप होता है।इसी कारण शिक्षा नीति इस प्रकार की होनी चाहिए जिससे छात्र अपनी मातृभाषा के विशिष्ट रूप को सीख सकें तथा उसमें अपेक्षित सक्षम हो सकें।

देश के शिक्षाशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि हाईस्कूल अथवा हायर सेकेण्डरी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जो छात्र महाविद्यालयों में प्रवेश लेते हैं, उनमें उतनी भाषिक दक्षता नहीं होती जितनी महाविद्यालयीन अध्ययन के लिये अपेक्षित है। इसकी पुष्टि हमारे द्वारा सन् 1976 में जबलपुर विश्वविद्यालय के 4 महाविद्यालयों के विभिन्न संकायों एवं विषयो के प्रथम वर्ष के 400 छात्रों के परीक्षण द्वारा हुई।

महाविद्यालयों के हिन्दी माध्यम से अध्ययन करने वाले प्रथम वर्ष के छात्रों की अपेक्षित भाषायी-दक्षताओं का विकास करने के उद्देश्य से जबलपुर के विश्वविद्यालय ने भारतीय भाषा-संस्थान, भारत सरकार, मैसूर के सहयोग से अगस्त 1976 में ‘हिन्दी ब्रिज कोर्स परियोजना’ के क्रियान्वयन का निश्चय किया। इस योजना के अन्तर्गत बी0ए0, बी0एस-सी0 एवं बी0 कॉम0 प्रथम वर्ष के हिन्दी माध्यम से अध्ययन करने वाले छात्रों की भाषिक दक्षताओं के विकास हेतु 200 घण्टों की पाठ्य सामग्री का श्रवण एवं टिप्पण (नोट्स) निर्माण बोधन, पठन बोधन, निर्देशित निबन्ध लेखन, सार लेखन (हिन्दी से हिन्दी एवं अंग्रेजी से हिन्दी) सम्बन्धी दक्षताओं के अनुरूप वर्गीकरण के अलग-अलग पुस्तिकाओं का निर्माण किया गया तथा उनको प्रकाशित भी किया गया। इस परियोजना के अन्तर्गत प्रकाशित पुस्तकें निम्न हैं –

1. हिन्दी ब्रिज कोर्स-पूर्व परीक्षणः (Hindi Bridge Course-Pre Test) (1978)

2. हिन्दी ब्रिज कोर्स-पश्चात् परीक्षणः(Hindi Bridge Course-Post Test) (1978)

3. हिन्दी ब्रिज कोर्स-पूर्व एवं पश्चात् परीक्षण: (Hindi Bridge Course-Pre and Post Tests) (1978)

4. हिन्दी ब्रिज कोर्स-परीक्षण (अध्यापक पुस्तिका): (Hindi Bridge Course-Tests : Teacher's Primer) (1978)

5. हिन्दी ब्रिज कोर्स-श्रवणबोधनः (Hindi Bridge Course-Listening Comprehension) (1978)

6. हिन्दी ब्रिज कोर्स-श्रवण एवं टिप्पण निर्माण बोधन (क): (Hindi Bridge Course-Listening and Note taking Competence (A) (1978)

7. हिन्दी ब्रज कोर्स-श्रवण एवं टिप्पण निर्माण बोधन (ख): (Hindi Bridge Course-Listening and Note taking Competence (B) (1978)

8. हिन्दी ब्रज कोर्स-पठन बोधन: (Hindi Bridge Course-Reading Comprehension ) (1978)

9. हिन्दी ब्रिज कोर्स-निर्देशित निबंध-लेखन: (Hindi Bridge Course-Guided Composition) (1978)

10. हिन्दी ब्रिज कोर्स-सार लेखन (अंग्रेजी से हिन्दी):(Hindi Bridge CourseEpitomized Writing (from English to Hindi)(1978)

11. हिन्दी ब्रिज कोर्स-सार लेखन (हिन्दी से अंग्रेजी ): (Hindi Bridge Course – Epitomized Writing (from Hindi to English) ) (1978)

12. हिन्दी ब्रिज कोर्स-अध्यापक निर्देश पुस्तिकाः (Hindi Bridge Course – Teachers Guide Book) (1978)

इन पुस्तकों में जिन विषयों से सामग्री का चयन किया गया है उनमें समाजशस्त्र, भौतिकशास्त्र, जीवविज्ञान एवं वनस्पतिविज्ञान प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त सामान्य ज्ञान की पुस्तकों, पत्रिकाओं एवं रेडियों वार्ताओं से भी सामग्री संकलित की गई है। 400 गद्यांशों में से विविध विशेषज्ञों के परामर्श से अन्ततः 200 गद्यांशों का चयन करने के पश्चात् उन्हें अलग-अलग भाषिक दक्षताओं में वितरित करने के बाद प्रत्येक दक्षता की सामग्री का श्रेणीकरण तथा प्रत्येक गद्यांश का आलोचनात्मक परीक्षण कर उसे अर्थपूर्ण इकाइयों में विभाजित किया गया है।

शिक्षक पुस्तिका में अध्ययन हेतु व्यापक एवं निश्चित शैक्षणिक निर्देश प्रदान किए गए हैं तथा ‘छात्र पुस्तिकाओं’ में अलग-अलग दक्षताओं से सम्बंधित उपयुक्त निर्देश तथा दक्षता-विकास एवं मूल्य निर्धारिक प्रश्नों का निर्माण किया गया है। निर्मित सामग्री का नियंत्रित एवं प्रयोगिक परिस्थितियों में प्रयोग करके सामग्री की सार्थकता के परीक्षण हेतु ‘पूर्व परीक्षण’ एवं ‘पश्चात् परीक्षण’ का भी निर्माण ‘परीक्षणों’ के निष्कर्षों को ध्यान में रखकर किया गया है।

मातृभाषा के माध्यम से विश्वविद्यालयीन शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थियों की भाषा दक्षता की अभिवृद्धि एवं विकास के लिए इसी प्रकार की सामग्री का निर्माण किया जाना चाहिए तथा उसके आधार पर भाषा शिक्षण कराया जाना चाहिए।

अन्य भाषा के रूप में शिक्षण कराने वाले शिक्षकः

अन्य भाषा के रूप में शिक्षण (द्वितीय भाषा के रूप में शिक्षण तथा विदेशी भाषा के रूप में शिक्षण) कराने वाले शिक्षकों में विशेष योग्यताओं एवं गुणों का होना आवश्यक हैः

1.उनको लक्ष्य भाषा के ध्वनिमिक अथवा स्वनिमिक तथा व्यवस्थापरक अभिलक्षणों, प्रयोगों, विशिष्ट शब्दावली तथा भाषिक संस्कारों का सूक्ष्म ज्ञान होना चाहिए।

2.उनको प्रशिक्षणार्थियों की भाषाओं की संरचनाओं का ज्ञान होना चाहिए तथा उनको लक्ष्य भाषा एवं शिक्षार्थी / शिक्षार्थियों की मातृ-भाषा/ मातृ-भाषाओं के व्यतिरेकात्मक विश्लेषण से परिचित होना चाहिए।

3.उनको ध्वनि विज्ञान, ध्वनिम अथवा स्वनिमविज्ञान, एककालिक अथवा संकालिक भाषाविज्ञान एवं संरचनात्मक भाषाविज्ञान के सिद्धांतों से परिचित होना चाहिए।

4.उनको अन्य भाषा शिक्षण (द्वितीय एवं विदेशी) की नवीनतम पद्धतियों एवं प्रविधियों का ज्ञान होना चाहिए।

5. उनमें उन पद्धतियों एवं प्रविधियों के आधार पर लक्ष्य भाषा के शिक्षण की व्यावहारिक योग्यता होनी चाहिए।

6.उनको शिक्षार्थी/ शिक्षार्थियों की योग्यता आयु एवं भाषा-अधिगम के उद्देश्यों से परिचित होना चाहिए तथा उनको तदनुरूप अपनी शिक्षा योजना में परिवर्तन करते रहना चाहिए । हिन्दी भाषा के शिक्षण के संदर्भ में इसको दो उदाहरणों से स्पष्ट किया जा सकता है।

(क) यदि किसी प्रबुद्ध वयस्क शिक्षार्थी का उद्देश्य हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि को सीखना है तो अध्यापक को हिन्दी भाषा के उच्चारित एवं लिखित रूपों के अन्तर की ओर निर्देश करते हुए देवनागरी वर्णो के आकार-प्रकार, वर्णो के उपवर्ण तथा लिखावट में उनको वितरणगत स्थितियाँ स्पष्ट करते हुए उनके लिखने का अभ्यास कराना चाहिए।

(ख) इसी प्रकार यदि शिक्षार्थी का उद्देश्य हिन्दी माध्यम से कार्यालयीन प्रशासनिक कार्य सम्पन करना है तो प्राध्यापक को उसके कार्यालय के प्रशासनिक कार्यो में प्रयुक्त होने वाली प्रशासनिक हिन्दी की विशिष्ट शब्दावली (रजिस्टर्स), प्रमुख वाक्य साँचों आदि का शिक्षण कराना चाहिए।

7. शिक्षार्थी/ शिक्षार्थियों को भाषा अधिगम में जिन समस्याओं एवं व्याघातों का सामना करना पड़ रहा है, उनमें उनको पहचानने की क्षमता तथा उसका समाधान करने की योग्यता होनी चाहिए।

8.सामग्री-निर्माण तथा प्रस्तुतीकरण करते समय उनको सजग रहना चाहिए जिससे शिक्षार्थी/ शिक्षार्थियों में लक्ष्य भाषा को बोलने, लिखने, पढ़ने और समझने की आदत का अधिकाधिक सहज रूप से निर्माण हो सके।

9. उनमें कक्षा में इस प्रकार का वातावरण उत्पन्न करने की क्षमता होनी चाहिए जिससे शिक्षार्थी भाषिक सामग्री का अधिकाधिक रूचि एवं निष्ठा के साथ अभ्यास कर सकें, उसको कक्षा में अन्य शिक्षार्थी/ शिक्षार्थियों से सम्भाषण के समय तथा कक्षा के बाहर दैनिक जीवन के कार्यकलापों में प्रयुक्त कर सके।

लक्ष्य भाषा के किस रूप का प्रशिक्षण

कोई भाषा पढ़ाते समय सर्वप्रथम यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उनको उस भाषा के किस भाषिक रूप का प्रशिक्षण दें। इस सम्बंध में यह उल्लेखनीय है कि यदि शिक्षार्थी का भाषा सीखने का कोई विशिष्ट प्रयोजन नहीं है तो सामान्य रूप से हमें उस भाषा के मानक रूप का अभ्यास कराना चाहिए। मानक से तात्पर्य भाषा के उस रूप से है जिसको उस भाषा के पढ़े-लिखे भाषी मानक मानते हैं। औपचारिक अवसरों पर उस भाषा के उच्च-शिक्षा प्राप्त व्यक्ति इस भाषा-रूप के द्वारा परस्पर सम्भाषण करते है। भाषणों, संगोष्ठियों, परिचर्चाओं आदि में इस भाषा का जो रूप प्रयुक्त होता है।

पाठ्य-सामग्री-निर्माण एवं प्रशिक्षण-बिन्दुः

शिक्षार्थी की मातृभाषा एवं लक्ष्य भाषा के व्यतिरेकी अध्ययन को ध्यान में रखकर पाठ्य-सामग्री का तदनुरूप निर्माण करना चाहिए तथा अध्ययन बिंदुओं को निर्धारित कर वर्गीकृत पाठ्य-सामग्री का प्रशिक्षण एवं अभ्यास कराना चाहिए। उदाहरण के लिए अपनी विशिष्ट भाषिक संरचना एवं व्यवस्था के कारण हिन्दी सीखते समय समस्त हिंदीतर भाषियों को कुछ समान समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

उदाहरणार्थ -

1.संज्ञा शब्दों का लिंग निर्धारण

2.विशेषण का विशेष्य के अनुसार रूपांतरण सम्बंधी विशिष्ट नियम

3.ने परसर्ग की वितरणगत स्थितियाँ

4.सम्बंधकारक ‘का’,‘के’, ‘की’ परसर्गो का प्रयोग

5. कर्ता एवं क्रिया की अन्विति सम्बंधी नियम

6. संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग

एक भाषा-परिवार के भाषा-भाषियों की समान समस्याएँ

हिन्दी भाषाशिक्षण की हिन्दीतर आधुनिक भारतीय आर्य भाषा-भाषियों एवं द्रविड़ भाषा-भाषियों की भिन्न समस्याओं का आकलन किया जाना चाहिए।

उदाहरणार्थ-

हिन्दी के नकारात्मक अव्यय प्रयोगों को सीखने में द्रविड़ भाषा-भाषियों को सापेक्षिक दृष्टि से अधिक समस्या होती है।

आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के उपवर्गो की समान समस्याएँ

उपवर्ग का नाम

भाषा का नाम

उत्तरी वर्ग

काश्मीरी, लहँदा, पंजाबी, सिन्धी, डोगरी, नेपाली

पश्चिम-दक्षिणी वर्ग

गुजराती, मराठी, खानदेशी, कोंकणी

मध्य वर्ग

भीली, हलबी

पूर्वी वर्ग

असमिया, बांग्ला, विष्णुप्रिया, ओडिया

उदाहरण-

पूर्वी वर्ग के भाषा-भाषियों को हिंदी ध्वनिमिक अथवा स्वनिमिक व्यवस्था एवं लिंग विधान का अभ्यास करने में जितनी अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है उतना पश्चिमी-दक्षिणी वर्ग के भाषियों को नहीं करना पड़ता ।

शिक्षण-पद्धतिः

भाषाशिक्षण का लक्ष्य भाषा सिखाना होना चाहिए न कि भाषा के बारे में व्याकरणिक वक्तव्य देने की कला सिखाना। इस लिए मौखिक वार्तालाप पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। अन्य भाषाशिक्षण की आदर्श स्थिति अन्य भाषा को उसके मूल भाषियों के परिवेश में उनसे प्रत्यक्ष बातचीत करके उसी प्रकार सीखना है जिस प्रकार बच्चा अपनी मातृभाषा सीखता है। मगर यह स्थिति सम्भव न हो तो अध्यापक को भाषाशिक्षण में शिक्षार्थी/ शिक्षार्थियों की मातृ-भाषा के कारण होने वाले व्याघातों को दूर करने पर बल प्रदान करना चाहिए। मातृभाषा को व्यक्ति बाल्यकाल में समाज में रहकर सीख लेता है किन्तु अन्य भाषा सिखाते समय हमें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मातृभाषा-शिक्षण एवं अन्य-भाषा-शिक्षण में कई मूलभूत अन्तर हैं। इनमें सर्वप्रमुख यह है कि जब कोई बालक स्कूल में पढ़ने जाता है, तो अपनी मातृभाषा को ध्वनि-व्यवस्था, व्याकरण एवं शब्दावली को सीख चुका होता है। अपनी मातृभाषा की ध्वनियों, दैनिक जीवन की शब्दावली एवं उसके सरल वाक्य साँचों से अभ्यस्त हो चुका होता है। किन्तु अन्य-भाषा शिक्षण के आरम्भ में वह अन्य भाषा में बिल्कुल अपरिचित एवं अनभिज्ञ होता है। इसी के साथ ही अन्य-भाषा सीखते समय उसकी मातृभाषा की सीखी हुई भाषिक आदतें व्याघात पैदा करती हैं। इसी कारण अन्य-भाषाशिक्षण में भाषाविज्ञान बहुत सहायता प्रदान करता है।

अन्य भाषा-शिक्षण एवं आधुनिक भाषाविज्ञानः

भाषाविज्ञान ने अन्य-भाषा शिक्षण में महत्वूपर्ण योगदान दिया है। भाषावैज्ञानिक लक्ष्य-भाषा का भाषा का भाषावैज्ञानिक अध्ययन कर उसकी अभिरचनाओं एवं व्यवस्थाओं की विवेचना करता है। साथ ही प्रशिक्षणार्थी की मातृभाषा की अभिरचनाओं एवं व्यवस्थाओं को ज्ञात कर दोनों भाषाओं (मातृभाषा एवं लक्ष्य भाषा) का, प्रत्येक स्तर पर व्यतिरेकात्मक अध्ययन करता है। इस अध्ययन से अन्य-भाषा-शिक्षक को प्रशिक्षार्थी एवं लक्ष्य भाषा - इन दोनों भाषाओं की व्यवस्था एवं संरचना के साम्य वैषम्य का पता चल जाता है। भाषावैज्ञानिक अध्ययनों से वह यह भी जान पाता है कि मातृभाषा से भिन्न लक्ष्य-भाषा की अभिरचनायें कौन-कौन सी हैं तथा प्रशिक्षण में मातृभाषा के कौन-कौन से भाषिक तत्त्वों का व्याघात संभावित है। इस दृष्टि से वह अध्यापन बिन्दुओं का निर्माण कर, पाठ्य सामग्री का निर्माण करता है। लक्ष्य-भाषा के विशिष्ट ध्वन्यात्मक लक्षणों को अभिरचना-प्राभ्यास प्रक्रिया द्वारा सिखाने की सामग्री प्रदान करता है। इसी प्रकार लक्ष्य-भाषा की विशिष्ट व्याकरणिक अभिरचनाओं, मूल उपवाक्य संरचनाओं तथा उनके विस्तारणों एवं रूपान्तरणों, शब्द अथवा व्याकरणिक खण्ड परिवर्तनों तथा विविध प्रकार के प्राभ्यसों (सुनना, दुहराना, पहचानना, प्रतिस्थापन, रूपान्तरण, विस्तार, प्रश्नोत्तर आदि) की पाठ-सामग्री बनाता है। भाषा-प्रयोगशाला क लिए विशेष पाठों का निर्माण करता है। इस प्रकार भाषाविज्ञान की पद्धतियों के ज्ञान के आलोक में वह भाषा के सम्पूर्ण प्रशिक्षण का कार्य पूर्व नियोजित एवं वर्गीकृत पाठय-सामग्री तथा नियन्त्रित प्रक्रिया के द्वारा सम्पन्न करता है।

इस प्रकार भाषा-विश्लेषण, भाषा-शिक्षण-सामग्री-निर्माण तथा भाषा-सामग्री के वर्गीकरण एवं प्रस्तुतीकरण आदि में आधुनिक भाषाविज्ञान बहुत सहायता प्रदान करता है। यह भी उल्लेखनीय ‘भाषाविज्ञान’ भाषा-शिक्षण में सहायक साधन मात्र है, भाषाविज्ञान ही भाषा-शिक्षण नहीं है। भाषा का अध्यापक भाषाविज्ञान की सहायता से शिक्षणार्थी की मातृभाषा एवं लक्ष्य-भाषा के स्वरूप, साम्य वैषम्य, शिक्षण कार्य की सम्भावित समस्याओं की खोज तथा समाधान हेतु पाठय-सामग्री का तदनुरूप निर्माण आदि कार्य सम्पन्न करता है किन्तु कक्षा में वह भाषा सीखाता है, भाषविज्ञान नहीं पढ़ाता।

भाषा-शिक्षण में भाषा-विज्ञान का उपयोगः सीमा एवं दिशा-निर्देशः

भाषाशिक्षण में व्याकरण एवं ध्वनिविज्ञान आदि का ज्ञान यदि कहीं सहायक सिद्ध हो सकता है तो उसका सहज उपयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए एक अध्यापक तमिल भाषी विद्यार्थी को हिन्दी बोलना सिखा रहा है। अनेक बार के प्रयास के बाद भी वह हिन्दी की ‘‘ड़’’ एवं ‘‘ढ़’’ ध्वनियों का उच्चारण नहीं कर पाता । ऐसी स्थिति में अध्यापक यह बता सकता है कि जिह्वा की नोक को उलट कर उसके नीचे के भाग से कठोर तालु के अंतिम भाग को छूकर उसे झटके के साथ नीचे मसूढ़े की ओर लाकर उच्चारण करो। ध्वनिविज्ञान का यह ज्ञान विद्यार्थी को ‘‘ड़’’ एवं ‘‘ढ़’’ ध्वनियों का उच्चारण सिखाने में सहायक सिद्ध हो सकता है। ध्वनियों के ध्वन्यात्मक मूल्य बताने की आवश्यकता नहीं है कि ये ध्वनियाँ मूर्धन्य उत्क्षिप्त हैं। इसी प्रकार लक्ष्य भाषा की व्याकरणिक संरचनाओं के बारे में कुछ प्रारम्भिक निर्देश एवं संकेत दे देना विद्यार्थी के लिए उपयोगी हो सकता है तथा उसका ज्ञान प्राप्त करके वह अन्य भाषा के रूपों एव साँचों का अनुकरण कर सकता है। मैं इस बात पर बल देना चाहता हूँ, कि यदि एक बार विद्यार्थी किसी भाषा के रूपों को बोलना सीख लेता है तब उन रूपों के बारे में व्याकरणिक जानकारी देने की जरूरत बिल्कुल नहीं है। इस बात को हिन्दी भाषा के कुछ उदाहरणों से स्पष्ट किया जा सकता है। हम हिन्दीतर भाषी को हिन्दी के वाक्य बोलने का अभ्यास करा रहे हैं। आरम्भ में हम उसे दो वाक्य बोलना सिखाते हैं।

(1) लड़का अच्छा है।

(2) मामा अच्छा है।

इसके बाद हम उसे सिखाते है -

(1) लड़के को खिला दो।

(2) मामा को खिला दो।

यह सम्भव है कि कोई विद्यार्थी प्रश्न करे कि ‘‘मामे को खिला दो’’ क्यों नहीं? उसकी इस जिज्ञासा का समाधान करने के लिए हम प्रशिक्षणार्थी को यह बता सकते है कि आकारांत हिन्दी संज्ञा शब्दों के दो रूप वर्ग हैं। एक वर्ग के अन्तर्गत ‘‘लड़का’’ ‘‘बच्चा’’ ‘‘घोड़ा’’ इत्यादि शब्द आते हैं तथा दूसरे वर्ग के अंतर्गत ‘‘मामा’’ ‘‘चाचा’’ ‘‘ दादा’’ इत्यादि शब्द आते हैं। तदनंतर इनके रूपांतरण की अभिरचनाओं के अभ्यासों को कराना चाहिए। हमें विद्यार्थी को भिन्न तालिकाओं के वाक्यों को बोलना सिखाना चाहिए तथा उनका इतना उच्चारणाभ्यास कराना चाहिए कि वे उसकी आदत बन जाए। उसे भाषा शिक्षण की दृष्टि से इन संज्ञा रूपों के बारे में व्याकरणिक वक्तव्य देने की कला नहीं सिखाना है। इसी प्रकार विशेष्य एवं विशेषण के सम्बंध की अभिरचना का अभ्यास कराने के लिए हम सिखाते हैं।

1.सुन्दर लड़का जा रहा है।

2.सुन्दर लड़की जा रही है।

इसके बाद हम उसे सिखाते है-

3.अच्छा लड़का जा रहा है।

4.अच्छी लड़की जा रही है।

यदि प्रशिक्षणार्थी को यह शंका होती है कि ‘‘सुन्दर’’ विशेषण ‘‘लड़का’’ तथा ‘‘लड़की’’ दोनों के साथ समान रूप से प्रयुक्त हो रहा है, ‘‘अच्छा’’ विशेषण ‘‘ लड़की’’ के साथ क्यों नहीं प्रयुक्त होता? तो उसकी इस शंका का समाधान करने के लिए हमें उसे रूपांतर सहित विशेषणों के सम्बंध में परिचित कराते हुए उनका अभ्यास कराना चाहिए। अन्य-भाषा के शिक्षक को तो भाषाविज्ञान में निष्णात होना चाहिए और भाषावैज्ञानिक अध्ययनों से सहायता लेनी चाहिए मगर उसे हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि कक्षा में उसे प्रशिक्षणार्थी को लक्ष्य भाषा सिखाना है। उसे प्रशिक्षणार्थी को भाषाविज्ञान नहीं पढ़ाना है। अन्य-भाषाशिक्षण में भाषाविज्ञान के ज्ञान से केवल सहायता लेनी है। कक्षा में भाषाविज्ञान के सिद्धांतों की विवेचना नहीं करना है

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्दशहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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