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बेटियां भी तय करेंगी मंजिलें

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डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

० शासकीय प्रयासों से अब बदल रही सूरत

बेटियों के मामले में हमारा समाज शुरू से ही दूसरी दर्जे की सोच रखता आया है। आज जब हम 21वीं सदी में जीवन यापन कर रहे है, तब विचारों में कुछ कुछ सकारात्मक सोच दिखाई पड़ने लगी है। 19वीं शताब्दी में महिलाओं और बेटियों के प्रयास करते हुए बीजारोपण किया गया। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को समाप्त करने पूरा समाज का विरोध सहते हुए भी बिगुल फूंका। साथ ही बाल विवाह जैसी प्रथाओं पर अंकुश लगाने समाज को जागरूक करने का काम बदस्तूर जारी रखा। अब समाज बेटियों को पढ़ाना चाह रहा है। वह उसे देश सेवा का प्रहरी भी बना रहा है। इतना ही नहीं अब युवतियां हवाई जहाज उड़ा रही है। वे रेल गाड़ी भी दौड़ा रही है, अंतरिक्ष में कदम रखकर वैज्ञानिकों की सूची में भी शामिल हो रही है। इन सारे बदलावों ने एक आशा का संचार किया है। अब हमारी बेटियां किसी से कम नहीं रहेंगी।

कन्या भ्रूण हत्या से लेकर गहराती लैंगिक असामानता, महिलाओं के प्रति सामाजिक भेदभाव, बढ़ती मातृत्व मृत्यु दर, 40 प्रतिशत से अधिक अशिक्षित महिलाएं और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध से समाज में महिलाओं की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। महिलाओं के प्रति समाज की बेपरवाह स्थिति के चलते सन 1970 के बाद महिला आंदोलनों ने जोर पकड़ा और एक सार्थक बदलाव की तस्वीर दिखाई पड़ने लगी। आश्चर्य की बात तो यह है कि 45 वर्षों के बाद भी भेदभाव की खाई कम नहीं हुई है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि एक ओर महिलाएं ओहदेदार पदों पर काबिज है, तो दूसरी ओर महिलाआों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दोयम दर्जे की जिंदगी जीने मजबूर है। महिलाओं के पिछड़ेपन का अनुमान हम इसी बात से लगा सकते है कि इतना परिवर्तन होने के बाद भी हमारे देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में महज 10 प्रतिशत के बराबर है। सामाजिक जड़ता में फंसी महिलाओं के उबार में अभी काफी वक्त लग सकता है। कारण यह कि महिलाओं से भेदभाव की जड़े भारत वर्ष के सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ी हुई है। धीरे-धीरे समाज में बदलाव की बयार ज्वाला बनने की प्रयास में दिख रही है।

हमारे भारतीय सभ्य समाज में भी यूरोपीय हवा का अनुसरण करते हुए बेटियों को पेट में ही मारना शुरू कर दिया। पहले तो इस मामले में कानून भी चुप रहा और नर्सिंग होम के संचालकों ने भी अवैध गर्भपात के नाम पर खूब कमाई की। जैसे जैसे समय बीतता गया लड़कियों की कम होती संख्या ने समाज में हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया। सन 2001 की जनगणना के आंकड़ों को देखे तो हमारे देश में प्रति हजारा लड़कों पर लड़कियों का संख्या 972 थी, जो सन 2011 में गिरकर 918 रह गई। ग्रामीण भारत में आज भी 60 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पूर्व हो जाती है, जो 19 वर्ष तक मां बन जाती है। यही कारण है कि मातृत्व मृत्यु दर भारत वर्ष में विश्व में दूसरे पायदान पर है। 1 लाख से अधिक नवविवाहिताओं की मौत गर्भावस्था और इससे संबंधित जटिलताओं के कारण हो जाती है। इन सारी विडंबनाओं के साथ ही घर अथवा घर से बाहर महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध आज भी एक कड़वी सच्चाई है। बलात्कार, हिंसा, तस्करी और वेश्यावृत्ति जैसी असामाजिक दल-दल से महिलाएं अब तक उबर नहीं पाई है। इन्हीं सारी पीड़ाओं से महिलाओं एवं युवतियों को बचाने दहेज, बलात्कार, उत्पीड़न सहित और कई अपराधों से निपटने कानून बनाये गये, किंतु वे अभी बहुत अधिक सुधार करते नहीं दिख रहे है।

बालक-बालिकाओं के जनसंख्या अनुपात को नियंत्रित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरूआत एक अच्छा कदम मानी जा सकती है। केंद्रीय सरकार द्वारा उक्त अहम योजना को सबसे पहले उन 100 जिलों में शुरू किये जाने की तैयारी है, जहां बालक-बालिकाओं का अनुपात काफी कम है। इस मामले में हरियाणा राज्य का नंबर सबसे पहले है, जहां यह अनुपात पूरे भारत वर्ष में कम पाया गया है। हरियाणा में 1000 पुरूष के पीछे महिलाओं का अनुपात मात्र 877 है, जबकि इस मामले में केरल सबसे अधिक अनुपात 1000 अनुपात 1084 रखता है। भ्रूण हत्या को रोकने अथवा कम करने के साथ ही यह योजना बालिकाओं और महिलाओं के अधिकारों के का सम्मान करने एवं उन्हें सुरक्षा देने पर भी केंद्रित है। इसी योजना के तहत ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ येाजना को मजबूती देने के लिए ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ की शुरूआत की गई। इस योजना के तहत बेटियों के लिए लघु बचत योजना का शुभारंभ किया गया है। ऐसे बचतों पर बैंक 9.1 प्रतिशत ब्याज देगी। साथ ही वह आयकर से पूर्ण मुक्त होगी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य बेटी के जन्म के साथ ही 1000 रूपये से खाता खोलकर कम से कम 10 वर्ष तक राशि जमा कराई जा सकती है। एक वर्ष में अधिकतम डेढ़ लाख रूपये योजना में जमा कराये जा सकते है। बेटी की उम्र 18 वर्ष होने के पश्चात उच्च शिक्षा के लिए जमा राशि में से 50 प्रतिशत राशि निकाले जाने का प्रावधान भी है।

बेटियों को बचाने किये जा रहे सरकारी प्रयास जहां अच्छा संदेश समाज को दे सकते है, वहीं दूसरी ओर अब प्रत्येक माता-पिता इस बात को भी समझने का प्रयास कर रहे है कि बेटा हो या बेटी सब के लिए सामान अवसर उपलब्ध कराना उनका प्रथम कर्तव्य है। मानवीय समाज की बदल रही विचारधारा ने अब बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए अथवा शिक्षित होने के बाद सेवा के क्षेत्र में देश के बड़े शहरों में जाने की पाबंदी हटाने के साथ ही साथ विदेशी सेवा का अवसर देना भी शुरू किया है। यह एक अच्छी पहल है जो बेटियों को महज चूल्हा चौकों तक सीमित न रखते हुए विकास का सामान अवसर दे रही है। हम सकारात्मक दृष्टि का विचार कर यह मान सकते है कि आने वाला समय बेटे-बेटियों के लिए सुनहरा भविष्य तय करेगा और कानून का भयभीत करने वाला डंडा अपराधियों के हौसलों को नेस्तनाबूद कर एक अच्छा वातावरण बनाने में कारगर होगा।

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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