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सिसक रहा लोकतंत्र, बहरी हुई संसद

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डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

० खुशहाल भारत का सपना साकार नहीं

हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र प्रणाली है, जिसका सीधा सीधा तात्पर्य यह है कि शासन चलाने वाली सर्वोच्च संस्था का चयन चुनाव प्रणाली द्वारा जनता करती है और अपने प्रतिनिधियों को संसद में भेजती है। संसदीय लोकतंत्र को एक श्रेष्ठ लोकतांत्रिक प्रणाली माना जाता है। कारण यह कि इस प्रणाली में पारदर्शिता एवं सुशासन की गुंजाईश ज्यादा पाई जाती है, इसी संसदीय प्रणाली में एक जीवंत विपक्ष होता है, जो सत्ता को प्रति-संतुलित करने का काम बखूबी करता है। इन्हीं सारी विशेषताओं के चलते हमारे संविधान निर्माताओं ने संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली को अंगीकार किया, हम पूरे दावे के साथ कह सकते है कि इस प्रकार की सोच के पीछे एक खुशहाल भारत का सपना छिपा रहा होगा, जो वास्तव में साकर रूप नहीं ले पाया हे। आज वही लोकतंत्र की कल्पना न सिर्फ अनेक विषम परिस्थितियां से गुजर रही हे, वरन तमाम तरह के दबावो के कारण चरमरा उठी हे। उसकी गति और लय सुसुप्तावस्था में पहुंचा दी गई है। स्थिति ऐसी हो गयी है कि कभी कभी ऐसा लगने लगता है कि हम एक छद्म संसदीय लोकतंत्र में जीवन यापन कर रहे है।

जिस उत्साह और उम्मीद के साथ हमने स्वतंत्रता के बाद संसदीय लोकतंत्र को आत्मसात किया था, वह अब कहीं दिखाई नहीं पड रही है, अथवा यह कहा जा सकता है कि वह उत्साह धूमिल पड गया हे। अब तो ऐसा भी लगने लगा है कि क्या लोकतंत्र की वर्तमान प्रणाली हमारी जरूरत, आकांक्षाओं एवं बदली हुई पृष्ठभूमि के अनुकूल भी है या नहीं? मानवीय मूल्यों में तेजी से आ रही गिरावट, चारित्रिक पतन एवं सामाजिक तथा सांस्कृतिक मान्यताएं तो गूलर का फूल होकर रह गयी है। अनेक तरह के गैर मानवीय व्यवहारों में क्षेत्रवाद से लेकर प्रादेशित संक्रणता, अलगाववाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, हिसां, आतंकवाद, चुनावों के दौरान बाहुबल और धनबल का प्रयोग, सांसदों द्वारा संसद में प्रश्न उठाने के लिए रिश्वतखोरी, पद का दुरूपयोग आदि ऐसे कलंक है, जिनसे हम 69 वर्ष बाद भी उबर नहीं पाए है। इसे हम एक प्रकार से ‘तंत्र की विफलता’ मान सकते है। हमारे द्वारा जनप्रतिनिधि अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन नहीं कर पा रहे हे और न ही जवाबदेही का स्तर संतोषजनक भूमिका निभा पा रहा हे। मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य ऐसी तस्वीर दिखा रहा है, जिनमें लोकतंत्र की निष्ठा बदल गयी हे। जनता के प्रति निभाया जाने वाला दायित्व हाशिए पर चला गया हे। इसी कारण ऐसा प्रतीत होने लगा है जैसे ‘जन’ से ‘तंत्र’ अलग हो गया हो। ‘तंत्र’ पूरी तरह से अपना हित साध रहा है तो ‘जन’ की स्थिति यतीमों जैसी हो गयी है।

संसदीय लोकतंत्र की स्थापना के साथ जिस संसद को वृहद अधिकार सौंपे गये वहीं संसद अब एक दूसरे की खिल्ली उड़ाने की केंद्र बन चुका हे। संसद चलती कम है, हंगामों में ज्यादा उलझी रहती हे। कार्यपालिक पर नियंत्रण रखने वाली संसद जब स्वयं समस्याओं पर उलझी रहे तब विडंबनाओं को समझा जा सकता है। हमारे सांसदों द्वारा जवाबदारी से भागते ही हुए संसद को ठप करने का चलन नया नहीं है। इतिहास के पन्नो को पलट कर देखे तो 1974 मे ‘मारूती स्केम कांड’ के कारण 19 दिनों तक संसद का कार्य ठप रहा। इसी तरह 1987 मे ‘बोफोर्स घोटाले’ के कारण पूरे डेढ़ माह तक संसद चल नहीं पाई। 1996 में संचार मंत्री ‘सुखराम संचार घोटाला’ के कारण भी 13 दिनों तक संसद में मौन छाया रहा। सन 2010 में ‘टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला’ के कारण 23 दिन, सन 2011 में ‘तहलका कांड’ के कारण 17 दिन संसद में काम न होना कहीं न कहीं हमारे लोकतंत्र पर काला धब्बा ही माना जा सकता है।

हमारे देश में विद्यामान संसदीय लोकतंत्र वास्तव में निराशाजनक स्थ्ज्ञिति में है, किंतु ऐसा भी नहीं कि इन स्थितियों में सुधार लाकर संसदीय गरिमा को वापस नहीं पाया जा सकता है। यह काम थोडा कठिन अवश्य हो सकता है किंतु असंभव नहीं। इसे पटरी पर लाने के लिए लोकतंत्र के ‘पांचवे स्तंभ’ के रूप में पहचान रखने वाला जनमत जनप्रतिनिधियों पर जवाबदेही निर्वहन के लिए दबाव बनाये। यह सर्वविदित है कि लोकतंत्र में जनमत ही शक्तिशाली होता है और इस दिशा में वह प्रभावी भूमिका निभा सकता है।वर्तमान संसद से लेकर पूर्व की संसदों में भी करोड पतियों और अपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े लोगों का बोलबाला रहा है। जब वे स्वयं अपराधों में आकंठ डुबे रहे है तो उनसे उच्च प्रतिमानों की कल्पना करना दिवा स्वप्न से कम नहीं है। इसके लिए दोषी हम स्वयं है किंतु करे भी तो क्या। इनके अलावा हमारे पास विकल्प भी नहीं है। कारण यह कि लडा जाने वाला और जीता जाने वाला चुनाव धन बल और बाहुबल के आधार पर ही जीता जाता हे, जो इन्हीं लोगों के पास है। हमें ‘राइट टू रिजेक्ट’ का विकल्प तो दे दिया गया किंतु इसके साथ ही प्रत्याशी के लिए कोई ऐसा कानून अब तक नहीं बना है कि कुल विधिमान्य वोटों के कितने प्रतिशत वोट संसद या विधानसभा में जाने के लिए जरूरी हे। चुनाव आयोग तो यही देखता है कि किसने अधिक वोट पाए।

इस संबंध में हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा की कार्यवाही समाप्त करते हुए अपने समापन भाषण में कही थी। उन्होने कहा था ‘भारत का संविधान लोकतंत्रात्मक है, किंतु लोकतंत्रात्मक संस्थाओं के सफल कार्यकारण के लिए यह आवश्यक है कि वे जो इसका क्रियान्वयन करें, दूसरे के दृष्टिकोण को भी आदर पूर्वक देखने तथा समझौता और समायोजन के लिए तत्पर हो। बहुत कुछ संविधान में लिखा नहीं जा सकता, उसे स्वस्थ परंपराएं डालकर अभिसमय द्वारा किया जाता है। संविधान में कुछ भी प्रावधान हो या न हो देश का कल्याण इस पर निर्भर करेगा कि उसका शासन कैसा है और शासन निर्भर करेगा, शासकों पर। कहा जाता है कि किसी देश को ऐसी ही सरकार मिलेगा जिसका वह अधिकार होता है। जिन लोगों को चुना गया है वे योग्य, इमानदार तथा चरित्र और निष्ठा रखने वाले हुए तो त्रुटिपूर्ण संविधान को भी सर्वोत्तम बना देंगे। इसके विपरीत यदि उनमें उक्त गुणों का अभाव हुआ तो संविधान देश को नहीं बचा सकता। अंततः संविधान मशीन की तरह एक निर्जीव चीज हे।’ डा. राजेन्द्र प्रसाद के भाषण का यह अंश न सिर्फ देश के नेताओं बल्कि जनता के लिए भी एक बड़ा संदेश है।

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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