सोमवार, 3 अगस्त 2015

आत्महत्या से कम नहीं निकम्मों के साथ काम करना

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डॉ. दीपक आचार्य

 

जो लोग काम करने में विश्वास रखते हैं वे हमेशा रचनात्मक और सकारात्मक गतिविधियों में रमे रहने के आदी होते हैं। इसके विपरीत जो लोग काम से जी चुराते हैं वे मरते दम तक वैसे ही बने रहते हैं। असल में कर्म के प्रति निष्ठा पारिवारिक और आनुवंशिक गुण होता है। बहुत सारे मामलों में निष्ठुरों और निकम्मों के संग का भी दुष्परिणाम फलीभूत होता है और इस वजह से अच्छे और संस्कारित परिवारों में जन्मे और पले-बढ़े लोग भी निकम्मापन ओढ़ लिया करते हैं। 

तन, मन और मस्तिष्क सभी से पूरी तरह स्वस्थ इंसान हमेशा काम में विश्वास रखता है। यह मनुष्य का मौलिक और स्वाभाविक गुण है कि वह कभी खाली हाथ या चुपचाप नहीं बैठता, हमेशा कुछ न कुछ करने को जी चाहता है।

इस मामले में शिशुओं से लेकर छोटे बच्चों को ही देख लें तो वे हर क्षण चंचलता के साथ कुछ न कुछ हरकत करते ही रहते हैं, चाहे वे इसके लिए क्षमता रखते हों या नहीं। इसी प्रकार जो लोग ईमानदारी से मनुष्य के मौलिक गुणधर्म के साथ पैदा हुए हैं, जिनके रक्त में इंसानियत के कतरे भरे पड़े होते हैं, जिनकी परंपरा कर्मयोग से जुड़ी हुई होती है वे हमेशा कर्मशील रहते हैं। इन लोगों में आगे बढ़ने, नया करने और बहुत कुछ पा जाने की तीव्र लालसा बच्चों की तरह होती है। यही कारण है कि जिज्ञासाओं को शांत करने, दुनिया को जानने, समझने तथा दुनियावी रिश्ते-नातों और ताने-बाने की हकीकत से रूबरू होने के लिए ये हर क्षण प्रयत्नशील रहते हैं। 

दुनिया में ऎसा कोई सा कर्म नहीं है जो मनुष्य न कर सके। यही कारण है कि जिज्ञासुजन निरन्तर परिश्रम और लगन से कुछ न कुछ नया करने, पाने और कर्मयोग को आकार देने में जुटे रहते हैं और एक न एक दिन सफलता का परचम लहरा कर ही मानते हैं।

कर्मयोग कोई ऎसा शब्द नहीं है कि जीवन भर किसी एक ही एक काम के पीछे लगे रहें। इसका सीधा संबंध इंसान की पूरी जिन्दगी से है जिसमें जो कर्म हमारे सामने आते हैं अथवा हमें जरूरत होती है उन सभी के बारे में ज्ञान और अनुभवों से समृद्ध होना हमारा फर्ज है और ऎसा होने पर ही हम पहचान स्थापित कर पा सकते हैं। केवल किताबी ज्ञान या दो-चार क्षेत्रों का अधकचरा ज्ञान पाकर अपने आपको ज्ञानी और अनुभवी कहने वाले लोग जीवन में कुछ नहीं कर पाते हैं।

कुछ कुर्सियों और चंद फीट के बन्द कमरों में जिन्दगी गुजार देने को विवश होेते हैं, और दम भरते हैं अपने आपके सर्वज्ञ होने का। इन लोगों से उनके जीवन भर की उपलब्धियों के बारे में पूछा जाए तो इन कमरों में तीन-चार दशकों तक नज़रबंद होकर किए गए एक ही एक प्रकार के कामों की लम्बी फेहरिश्त गिना देंगे और कुछेेक नाम गिना देंगे जिनके साथ समय गुजारा होता है। साथ में यह भी बता देेंगे कि किन-किन ने तारीफ की। ऎसे लोगों के पास कोई ऎसा ठोस काम नहीं होता जिसे गिना सकें।

पहले कर्मयोग को सभी स्थानों पर महत्व प्राप्त था। आदमी अपने काम से जाना जाता था और सभी लोग दिल से कद्र करते थे। आज आदमी काम-धाम से नहीं नाम से पहचान चाहता है और इस नाम को प्रतिष्ठित करने की खातिर अपने मूल काम तो नहीं करता बल्कि उन सभी प्रकार के कामों का सहारा लेता है जो निकम्मे लोग दूसरों की बराबरी पर आने के लिए अपनाते हैं।

कार्य संस्कृति गायब हो रही है। जब से पैसा और भौतिक संसाधनों की भूख-प्यास आदमी के वजूद और प्रतिष्ठा का पैमाना बन चली है तभी से पुरुषार्थ की बजाय समीकरणों और समझौतों में रमते हुए आगे बढ़ने का दौर परवान पर है।

सभी को दूसरों से शिकायत है कि वे काम नहीं करते। खुद चाहे निकम्मों की तरह ठाले बैठे रहें, काम टालते रहें, मगर निकम्मेपन का दोष औरों के मत्थे मढ़ना हमारी आदत ही हो चला है। हर इंसान के पास रोजाना काम के घण्टे खूब होते हैं और उसके अनुपात में न्यूनाधिक काम होता है। बावजूद इसके कई जगह रोजमर्रा के मामूली काम भी नहीं हो पाते।

कई स्थानों पर यथास्थितिवादियों का जमावड़ा है और कई बाड़ों में दक्षता नही है। लोग न नया सीखना चाहते हैं, न बदलाव लाना। इस कारण चाहते हुए भी परिवर्तन लाना अत्यन्त दुश्कर है। कई जगह बहुत काम होता है, रोजाना का काम रोजाना पूरा होता है, कोई काम लंबित रहता ही नहीं, इन परिसरों की कार्य संस्कृति खुद मुँह बोलती है और प्रशंसा भी पाती है।

इसकी बजाय खूब सारे बाड़ों में कार्य संस्कृति सिर्फ नाम मात्र की है। इनमें कार्मिक आलसी और दरिद्री हैं, कुछ करना चाहते ही नहीं। इन्हें पता है कि एक बार कोई अच्छा सा बाड़ा मिल गया तो फिर गई लम्बे समय तक की, कौन हटाने या छेड़ने वाला है।

ऎसे लोगों के मन से काम करने की प्रवृत्ति मर जाती है और ये जो भी काम करते हैं वे मर-मर कर। यही कारण है कि समाज और राष्ट्र का अपेक्षित विकास नहीं हो पा रहा है। कई बार कर्मवीरों को भी इन बाड़ों में सुधार की गुंजाईश को देखते हुए लगा दिया जाता है मगर देखा यह गया है कि यथास्थितिवादी लोग जरा भी बदलने या परिवर्तन स्वीेकारने को तैयार नहीं होते। इनकी ढीठता और जड़ता के चलते परिवर्तन का हर प्रयास विफल हो जाता है।

इसे विफल करने के लिए कामचोरों, आलसियों और दरिद्रियों का पूरा कुनबा एक हो जाता है। भले ही ये सारे के सारे आपस में लड़ने-भिड़ने वाले ही क्यों न हों, इस मामले में सारे के सारे एक हैं। फिर जहाँ इन्हीं का बहुमत हो तब न तो सुधार की संभावनाएं पूरी हो पाती हैं, न इनके बीच काम करना निरापद ही रह पाता है।

इस किस्म के लोग न तो सुधार या बदलाव को पसंद करते हैं, न बदलाव लाने वालों को। यह स्थिति उन लोगों के लिए  बड़ी ही खतरनाक और आत्मघाती साबित होती है जो लोग पूरे मनोयोग से काम करते हैं, पुरुषार्थ को जीवन का अंग बना कर चलते हैं और अपने काम से अपनी पहचान कायम करते हैंं।

कर्म को ही आदर्श मानकर जीने वालों के लिए यह समय आत्महत्या से कम नहीं होता जहाँ संवेदनहीन,खुदगर्ज और आत्मकेन्दि्रत लोगों के साथ काम करना अपने आप में किश्तों-किश्तों में संघर्ष की वो गाथा लिखता है जिसका कोई अंत नहीं है। समय के साथ ही इसका अंत अपने आप संभव है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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