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हिन्दी नाटक : क्रमिक विकास

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स्वप्न नायर

कोयमबत्तूर कर्पगम

विश्वविद्यालय में डॉ.के.पी. पद्मावती अम्मा

के मार्ग दर्शन में पी.एच.डी केलिए शोधरत

नाटक हमारे साहित्य की एक सशक्त - सबल विधा है । हिन्दी में नाटक के उद्भव के बारे में विद्वानों में मतभेद है । कुछ विद्वान मानते है कि संवत् 1279 में रचित ‘गय सुकुमार रास’ हिन्दी का पहला नाटक है । नाटकीयता, संवाद, शैली, अभिनेता आदि की अभाव होने से इसे नाटक कहने से अच्छा ‘रासक’ कहना उचित है । महाकवि विद्यापति मैथिली भाषा में कृत ‘गोरक्षा विजय’ नामक नाटक, नाटक की श्रेणी में आने वाली उल्लेखनीय रचना है । इसका गद्य संस्कृत और पद्य भाग मैथिली में मिलता है । ‘विद्या विलाप’ (सन्1533), ‘मुद्रित कुवलयाशव’ (सन् 1627), ‘हर गौरी विवाह’ (सन् 1629), सन् 1639 में रचित ‘नल चरित नाटक’, 17वीं शती में रामदास झा रचित ‘आनंद विजय नाटक’, ‘उषा हरण’ (देवानंद), ‘रुक्मिणी हरण’ (रमापति उपाध्याय), ‘पारिजात हरण’ (उमापति उपाध्याय) आदि कृतियाँ हिन्दी नाटक परंपरा की आरंभ काल की रचनाएँ है ।

नन्ददास का ‘गोवर्द्धन लीला’ उल्लेखनीय नाटक है । वृन्दावनदास ने करीब चालीस नाटकों की रचना की । इस काल में ‘नरसिंह लीला’, ‘प्रह्लाद लीला’, ‘भागीरथी लीला’ आदि अनेक ‘लीला नाटकों’ की रचनायें हुई । इसे ‘रास लीला’ के श्रेणी में स्थान देना उचित है । अठारहवीं शती में पद्य नाटकों की प्रमुखता हुई । ऐसे नाटक रंगमंचीय दृष्टि में असफल है । गुरु गोविन्दसिंह कृत ‘चंडी चरित्र’, ह्रदयराम का ‘हनुमन्नाटक’, नेवाज का ‘शकुतला नाटक’, बनारसीदास का ‘समय सार नाटक’ ऐसे नाटकों में कुछ है । उन्नीसवीं शती में भी यह रीति हुई । ‘जानकी रामचरित’, ‘रामायण नाटक, ‘माधव विनोद नाटक’, ‘नहुष नाटक’ आदि पद्य बद्ध नाटकों में कुछ है ।

उन्नीसवीं - बीसवीं शती हिन्दी नाटकों की परिष्करण और विकास का युग है । इस शती में अनेक श्रेष्ठ मौलिक नाटकों की रचना हुई । इस शती के नाटकीय इतिहास को भारतेन्दु युग, प्रसाद युग और प्रसादोत्तर युग के नाम में विभाजित किया जाता है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी नाटक के पितामह के नाम में जाने जाते है । बाबु हरिश्चन्द्र को अंग्रेज़ी, बँगला, संस्कृत, प्राकृत आदि के नाटकों से अच्छा ज्ञान था । वह नाटक रचना करने के साथ अभिनय भी करता था । नाटक के सभी विषयों में उन्हें परिचय था । सरलता, रोचक शैली, स्वाभाविकता आदि भारतेन्दु नाटकों के गुण है । उन्होंने कई मौलिक नाटकों की रचना की । साथ ही साथ अन्य भाषाओं से नाटकों का हिन्दी अनुवाद करने का नायकत्व दिया । लेखकों में नाटक रचना का प्रेरणा दिया । भारतेन्दु ने पौराणिक विषयों के समान राजनैतिक एवं सामाजिक विषयों को नाटकों की कथानक बनाया है । ‘वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति’, ‘धनंजय विजय’, ‘कर्पूर हरिश्चन्द्र’, ‘मुद्रा राक्षस’, ‘विषस्य विषमोषौधम्’, ‘प्रेम योगिनी’, ‘सती प्रताप’, ‘नील देवी’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘अंधेरी नगरी’ आदि भारतेन्दु के नाटक है । उन्होंने ‘पाखण्ड विडम्बन’ सशक्त सामाजिक नाटक है ।

भारतेन्दु युग में उनके मार्ग दर्शन में अनेक नाटककार आगे आये जिनमें राधाकृष्ण दास, श्रीनिवास दास, सीताराम वर्मा, बदरी नारायण चौधरी, राधाचरण गोस्वामी, प्रताप नारायण मिश्र आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है । ‘रणधीर’, ‘प्रेम मोहिनी’, ‘महाराण प्रताप’, ‘दुःखिनी वाला’, ‘भारत ललना’, ‘भारत सौभाग्य’, ‘प्रेमधन’, ‘भारत दुर्दशा रूपक’, ‘तन मन धन श्रीगोसाईजी के अर्पण’, ‘विवाह विडंबना’ आदि उल्लेखनीय नाटक है ।

हिन्दी नाटक के विकास में जयशंकर प्रसाद का स्थान सर्वोपरी है । प्रसाद महाकवि होने समान ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक और राजनैतिक नाटककार के रूप में स्मरणीय है । मेधावी नाटककार प्रसाद ने भाषा, शैली, विषय, संवाद, नाटकीय मुहूर्त आदि सभी में नवीनता लायी । उनके अधिकांश नाटक रंगमंच में सफलता के साथ अभिनय कर सकते है । प्रसाद ने ‘सज्जन’, ‘कल्याणी’, ‘प्रायश्चित्त’, ‘करुणामय’, ‘अजातशत्रु’, ‘राज्य श्री’, ‘विशाल’, ‘कामना’, ‘जनमेजय का नाग यज्ञ’, ‘एक घूँट’, ‘स्कंध गुप्त’, ‘चन्द्र गुप्त’, ‘ध्रुवस्वामिनी’ आदि अनेक प्रौढ़ नाटकों की रचना की । प्रसाद युग के नाटककारों में ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ के रचयिता माखनलाल चतुर्वेदी, ‘महात्मा ईसा’ के रचयिता पांड़ेय बेचन शर्मा उग्र, ‘कर्बला’ के रचयिता प्रेमचन्द, ‘वरमाला’ के रचयिता गोविन्दवल्लभ पंत आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है ।

प्रसादोत्तर युग में नाटक की नाना विधा विकास हुई । इस समय के नाटककारों में उदयशंकर भट्ट, हरिकृष्ण प्रेमी, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, वृन्दावनलाल वर्मा, गोविन्द वल्लभ पंत, सेठ गोविन्ददास आदि के नाम महत्वपूर्ण है । हरिकृष्ण प्रेमी के नाटक ‘रक्षाबंधन’, ‘स्वप्नभंग’, ‘शिव साधना’, ‘आहुति’, ‘उद्धार’, ‘विदा’ आदि मुख्य है । ‘झाँसी की रानी’, ‘पूर्व की और’, ‘बीरबल’, ‘ललित विक्रम’ आदि वृन्दावनलाल वर्मा के नाटकों में कुछ है । ‘अन्त:पुर का छिद्र’ और ‘राजमुकुट’ आदि गोविन्दवल्लभ पंत के नाटक है । ‘अशोक’, ‘रेवा आदि’ चन्द्र गुप्त विद्यांलंकार के नाटकों में कुछ है । ‘मुक्ति पथ’ और ‘दाहर’ उदयशंकर भट्ट के प्रसिद्ध नाटक है । सियारामशरण गुप्त ने ‘पुण्य पर्व’ लिखकर ख्याति पायी । उपेन्द्रनाथ अश्क का ‘जय पराजय’, लक्ष्मीनारायण मिश्र के ‘गरुड़ध्वज’, सत्येन्द्र के ‘मुक्ति यज्ञ’, सुदर्शन कृत ‘सिकंधर’ आदि उल्लेखनीय नाटक है । ‘समुद्र गुप्त’ (वैकुंठनाथ दुगल), ‘मान प्रताप’ (देवराज दिनेश), ‘गौतम नन्द’ (जगन्नाद प्रसाद मिलिन्द), ‘छत्रसाल’ (चतुर्सेन शास्त्री), ‘कवि’ (लक्ष्मीनारायण मिश्र), ‘रहीम’ (सेठ गोविन्ददास) आदि नाटक ऐतिहासिक कोटि में आते है ।

इस युग अनेक मौलिक महत्वपूर्ण पौराणिक नाटकों की रचना हुई । ‘ऊर्मिला’ (पृथ्वीनाथ शर्मा), ‘कर्तव्य’ (सेठ गोविन्ददास), ‘मंझली रानी’ (सद्गुरूशरण अवस्थी), ‘अभिनय’ (गोकुलचन्द्र शर्मा), ‘सीता की माँ’ (रामवृक्ष बेनीपुरी), ‘सुभद्रा परिणय’ (वीरेन्द्र कुमार गुप्त), ‘सुदामा’ (किशोरीदास वाजपेयी), ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ (कैलाशनाथ भटनागर), ‘कर्ण’ (गोविन्ददास), ‘ययाति’ (गोविन्द वल्लभ पंत), ‘नारद की वीणा’ (लक्ष्मीनारायण मिश्र), ‘प्रादुर्भाव’ (जगदीशचन्द्र माथुर), ‘विद्रोहिणी अम्बा’ (उदयशंकर भट्ट) आदि उल्लेखनीय है । इस युग में कई समस्या प्रधान नाटकों की रचना हुई । ऐसे नाटककारों में उपेन्द्रनाथ अश्क, सेठ गोविन्ददास, हरिकृष्ण प्रेमी, वृन्दावनलाल वर्मा आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है । ‘राक्षस का मंदिर’, ‘संन्यासी’, ‘राजयोग’, ‘सिन्दूर की होली’ आदि लक्ष्मीनारायण मिश्र के समस्या प्रधान नाटकों में कुछ है । ‘कुलीनता’, ‘सेवा पथ’, ‘संतोष कहाँ’, ‘दुःख क्यों’ आदि सेठ गोविन्ददास के नाटक है । वृन्दावनलाल वर्मा ने ‘देखा-देखी’, ‘केवट’, ‘बाँस की फाँस’, ‘राखी की लाज’ जैसे नाटक लिखकर इस धारा को समृद्ध किया । पृथ्वीराज शर्मा का ‘साध’, ‘अपराधी’, ‘दुविधा’, गोविन्दवल्लभ पंत का ‘सिन्दूर की बिन्दी’, उदयशंकर भट्ट के ‘कमला’, प्रेमचन्द का ‘प्रेम की वेदी’, हरिकृष्ण प्रेमी कृत ‘छाया’, ‘कर्मपथ’ (दयाराम झा), रघुवीरशरण कृत ‘भारत माता’, शंभूनाथ कृत ‘धरती और आकाश’, तुलसी भाटिया का ‘मर्यादा’ आदि नाटक ध्यान आकर्षित है ।

इस समय गीति नाटकों की प्रचलन भी बड़ी मात्रा में हुई । ‘मत्स्यगंधा’ (उदयशंकर भट्ट), ‘करुणालय’ (जयशंकर प्रसाद), ‘अनघ’ (मैथिलीशरण गुप्त), ‘स्नेह या स्वर्ग’ (सेठ गोविन्ददास), ‘विहान’ (हरिकृष्ण प्रेमी), ‘तारा’ (भगवतीचरण वर्मा), ‘अंधा युग’ (धर्मवीर भारती) आदि गीति नाटक उल्लेखनीय है । प्रसाद का ‘कामना’, भगवती प्रसाद वाजपेयी का ‘छलना’, पंत कृत ‘ज्योत्सना’, सेठ गोविन्ददास कृत ‘नवरस’, लक्ष्मीनारायण लाल का ‘मादा कैक्टस’ आदि प्रतीकवादी नाटकों में कुछ है ।

स्वातंत्र्योत्तर काल में नाटक की विकास अभूतपूर्व गति में हुई । ‘कोणार्क’ (जगदीशचन्द्र माथुर), ‘अंधा कुआँ’ और ‘कर्प्यू’ (लक्ष्मीनारायण लाल), ‘युगे युगे क्रान्ति’ और ‘टूटते परिवेश’ (विष्णु प्रभाकर), ‘सुबह के घंटे’ (नरेश मेहता), ‘बिन बाती के दीप’ (शंकर शेष), ‘आषाढ़ का एक दिन’ (मोहन राकेश), ‘द्रौपदी’ (सुरेन्द् वर्मा), ‘इतिहास चक्र’ (दया प्रकाश सिन्हा), ‘बकरी’ (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना), ‘सिंहासन खाली है’ (सुशील कुमार सिंह), ‘बिना दीवार का घर’ (मन्नू भंडारी), ‘तस्वीर उसकी’ (चिरंजीत), ‘हम लोग’ (अमृतराय), ‘अब और नहीं’ (विष्णु प्रभाकर) आदि नाटक आधुनिक युग का प्रतिनिधित्व करता है ।

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Swappana Nair, Ph.D scholar, Under the guidance of Dr.K.P. Padmavati Ammal, Karpagam University Coimbatore, Tamilnadu .

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