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तनावमुक्त रखना सबसे बड़ी सेवा

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डॉ. दीपक आचार्य

 

इंसान अपनी पूरी क्षमताओं के साथ तभी काम कर सकता है जबकि वह पूरी तरह से तनावों से मुक्त हो। यह तनाव वैयक्तिक, घरेलू, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और परिवेशीय किसी भी प्रकार के हो सकते हैं।

बहुधा देखा यह गया है कि संवेदनशीलता के अनुपात में तनावों का अनुभव ज्यादा होता है। जो इंसान जितना अधिक संवेदनशील होगा, उसे तनावों की अनुभूति और पीड़ाएं उतनी ही अधिक होंगी। संवेदनहीन लोगों पर तनावों का कोई खास असर नहीं होता क्योंकि किसी भी प्रकार की बाहरी हलचल का इन पर कोई असर नहीं पड़ता।

दो तरह के लोगोें को तनाव छू नहीं पाते। एक तो हद दर्जे के संवेदनहीन लोगों को किसी भी प्रकार का तनाव व्याप्त नहीं होता क्योंंकि ऎसे लोग या तो आंशिक, आधे या पूरे पागल होते हैं अथवा इनका दिमाग हर क्षण किसी न किसी प्रकार के नशे में डूबा हुआ होता है और उसे अपनी मस्ती के सिवा और कुछ सूझता ही नहीं है। इसलिए वह बेपरवाह होता है।

दूसरे प्रकार में वे लोग आते हैं जो असाधारण होते हैं। ये लोग या तो स्थितप्रज्ञ, आत्मस्थिति में रमण करने वाले या योगी होते हैं जिन्हें संसार की किसी भी हलचल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऎसे अधिकांश लोग आध्यात्मिक शक्तियों से भरे-पूरे होते हैं और इसलिए उनका अर्थिंग पॉवर ही इतना अधिक होता है कि दुनियावी कोई सी तरंग इनके हृदयाकाश या दिमाग तक पहुँच ही नहीं पाती।

ये लोग पूरी तरह ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और भगवान की हर क्रिया के प्रति इनकी अगाध आस्था होती है। इनका मानना है कि जो कुछ होता है वह भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लेने से जीवन निर्वाह की सारी विपदाएं अनुभवित नहीं होती और  आसानी से जीवन निर्वाह हो जाता है। 

पर वर्तमान समय में दुनिया के अधिकांश लोगों की मानसिक, शारीरिक और तमाम प्रकार की भौतिक समस्याओं का मूल कारण तनाव है। बहुत सारे लोग तनावों की वजह से भावावेश में आकर आपराधिक चरित्र का प्रकटीकरण कर दिया करते हैं अथवा अपना आपा खो देते हैं। काफी सारे लोग जिन्दगी भर इन्हीं तनावों में गुजार देते हैं और जीवन के अन्त तक इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं ये दुनिया तनाव देने के लिए ही पैदा हुई है, तनाव खत्म करने की कोई नहीं सोचता।

तनाव के लिए आदमी खुद इतना जिम्मेदार नहीं होता जितनी की सम सामयिक परिस्थितियाँ। अधिकतर मामलों में आम आदमी तनाव का सर्जक नहीं होता, वह अपनी मस्ती के साथ जीने के सभी प्रबन्ध करता है। तनाव देने वालों में बड़े लोग जिम्मेदार होते हैं जिन्हें चाहे-अनचाहे, भाग्य या दुर्भाग्य से कुछ शक्तियाँ हासिल हो जाती हैं जो बाद में महा अहंकार और संप्रभुता में परिवर्तित हो जाती हैं जहाँ जाकर इन लोगों को भ्रम हो जाता है कि दुनिया में वे ही हैं बस, और यह दुनिया उन्हीं के लिए रची गई है। यहीं से तनावों की शुरूआत होती है।

अपने मनचाहे और दूसरों के अनचाहे कामों को कराना तथा दूसरों से उनके स्वभाव व परंपराओं के विरूद्ध काम या व्यवहार कराना ही दुनिया के सारे तनावों का मूल कारण है। कई बार अपनी आँखों के सामने अमर्यादित कार्यों का निर्बाध रूप से होते रहना, चुपचाप देखते रहने की विवशताएं, भरोसेमंद लोगों द्वारा अविश्वसनीय कामों को करना-करवाना तथा इंसान के मौलिक चरित्र की अवहेलना से जुड़े हुए तमाम कारकों की वजह से तनावों का सृजन होता है।

तनाव कोई बाहरी वस्तु नहीं है जो कि समुद्र फेन की तरह अपना अस्तित्व दिखाकर हलचल मचाता रहे। तनाव अपने आप में मन-मस्तिष्क और शरीर की वह समेकित प्रतिक्रिया है जिसका असर प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाव, कार्य क्षमता और व्यवहार पर पड़ता ही है। समुदाय और देश की सबसे बड़ी समस्या तनाव ही है जिसके चलते मानसिक और शारीरिक समस्याओं का प्रभाव हर तरफ बढ़ता ही जा रहा है।

समाजसेवा के विभिन्न क्षेत्रों और मानव संसाधन की उन्नति की अपार संभावनाओं के बावजूद लोक जीवन की कोई सबसे बड़ी समस्या है तो वह है कारण-अकारण तनाव। कई बार हम भ्रम और एकतरफा आशंकाओें को लेकर तनाव पाल लेते हैं। इस स्थिति का निराकरण समय के सिवाय कोई नहीं कर सकता।

लेकिन जिन तनावों के पीछे कारण निहित होते हैं उनके लिए कारणों की तलाश कर हमेशा के लिए निराकरण किया जाकर इंसान को तनाव मुक्त रखा जा सकता है। आज उन कारणों को खोजने और ईमानदारी तथा पूरी उदारता के साथ इनका निराकरण करने की जरूरत है और यह कार्य हमारे ही माध्यम से हो सकता है।

जो दूसरों को तनाव देता है वह इंसान अपने आप में हैवान से कम नहीं होता। तनाव देना अपने आप में हिंसा ही हीै जिसका पाप सभी को लगता है। लेकिन जिन तनावों के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं उनके लिए किसी और को दोष नहीं दिया जा सकता।

इनसे मुक्ति पाने के लिए हमें ही धर्म, सत्य और आत्मविश्वास पैदा करने के लिए कुछ न कुछ करने की जरूरत है। अक्सर हम दूसरों को तनाव देते और महसूस करते हुए देखते रहते हैं लेकिन अपनी ओर से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर मूक प्राणियों की तरह व्यवहार करते हुए इन सभी स्थितियों की अनदेखी कर आगे बढ़ जाते हैं।

यह कायरता, नपुंसकता दिखाना और तटस्थता ओढ़े रखना भी अपने आप में हिंसा और पाप है। कोई भी इंसान जानते-बूझते हुए जो कुछ चुपचाप रहकर देखता, करता और सुनता है वह भी अपराध में उतना ही सहभागी माना जाता है।

इंसानियत के तमाम पहलुओं पर अपने आपको तौलें तथा यह प्रयास करें कि हम स्वयं भी हमेशा तनाव मुक्त रहें, किसी और को तनाव न दें, सभी को तनावों से मुक्ति के लिए सार्थक प्रयास करें, यह समाज की सच्ची और सबसे बड़ी सेवा है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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