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स्किल 'डेवलपमेन्ट' में बेहतर 'प्लेसमेंट' को समझें

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


बढ़ रही युवा जनसंख्या को रोजगार के अच्छे अवसर प्रदान करने के लिए उन्नत प्रशिक्षण एवं कौशल विकास महत्वपूर्ण है और उन्नति की गति को तीव्र बनाए रखने के लिए यह आवश्यक भी है। राष्ट्रीय कौशल विकास नीति का लक्ष्य, सभी व्यक्तियों को अच्छे रोजगार सुलभ कराने तथा विश्व बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें उन्नत कौशल, ज्ञान तथा योग्यताओं के माध्यम से सक्षम बनाना है। यही कारण है कि भारत ने बाकायदा कौशल विकास कार्यक्रम का एक अभियान की शक्ल में आरम्भ किया है। हुनर की बढ़ती अहमियत से भला कौन इंकार कर सकता है ?

यह नीति, सभी को, विशेष रूप से युवा, महिलाओं तथा वंचित वर्गों को कौशल प्रदान/ प्राप्त करने के अवसरों का सृजन करने, सभी स्टेकधारियों द्वारा अपनी कौशल विकास पहल की वचनबद्धता को बढ़ावा देने और सबसे महत्वपूर्ण रूप में बाजार की वर्तमान तथा बढ़ रही रोजगार आवश्यकताओं से संबद्ध उच्च स्तर के कुशल कार्य-बल/उद्यमियों के विकास पर बल देती है।

राष्ट्रीय कौशल विकास नीति

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राट्रीय कौशल विकास नीति में आई.टी.आई. (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों)/आई.टी.सी. (औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्रों)/व्यावसायिक स्कूलों/तकनीकी स्कूलों/ पोलिटेक्निक/ व्यावसायिक कॉलेज आदि; विभिन्न मंत्रालयों/ विभागों द्वारा आयोजित प्रांतीय कौशल विकास के अध्ययन प्रवर्तन; उद्यमों द्वारा औपचारिक तथा अनौपचारिक प्रशिक्षुता एवं अन्य प्रकार के प्रशिक्षण; स्व-रोजगार/उद्यम विकास के लिए प्रशिक्षण; अनौपचारिक प्रशिक्षण; ई-लर्निंग; वेब-आधारित अध्ययन तथा दूरस्थ अध्ययन सहित संस्था आधारित कौशल विकास शामिल है।

कौशल विकास के लाभ औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के छात्रों के प्लेसमेंट में देखे जा सकते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अनिश्चित आर्थिक परिदृश्य के बावजूद, अधिकांश औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के लगभग सभी 100% छात्रों का प्लेसमेंट होता है। यदि आप पूरे देश के आई.टी.आई. के किसी प्रतिनिधि वर्ग से पूछें तो वे भी इसी तथ्य को दोहराएंगे। एक रिपोर्ट के अनुसार, आई.टी.आई., अन्धेरी, मुंबई अथवा भीमावरम, आन्ध्रप्रदेश अपना प्लेसमेंट 100% बताते हैं। आई.टी.आई. भीमावरम में, प्लेसमेंट के लिए कैम्पस में 9 कंपनियां आईं, जिनमें अशोक लेलैण्ड, कोरोमंडल इंटरनेशनल, हिन्दुस्तान नेशनल ग्लास एवं कई उद्योग शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्लेसमेंट में सुधार के लिए उन्नत कौशल के अतिरिक्त कंपनियों तथा विभिन्न आई.टी.आई. के बीच संपर्क में वृद्धि की भी अहम भूमिका है। रिपोर्ट बताती है कि कजरत, महाराष्ट्र के एक दूरस्थ क्षेत्र के एक छात्र, जिसने स्थानीय आई.टी.आई. से दो वर्षीय आतिथ्य प्रबंधन पाठ्यक्रम पूरा किया था, को मुंबई के एक प्रतिष्ठित होटल के खाद्य प्रसंस्करण विभाग ने 8000/- रु. प्रतिमाह की मासिक आय पर रोजगार के लिए चुना है।

यद्यपि सांस्थानिक संरचना/सुविधाओं का निर्माण किया गया है, किंतु अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। जहां एक ओर कौशल प्रशिक्षण को दसवीं कक्षा से औपचारिक शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जाना है, वहीं दूसरी ओर औपचारिक शिक्षा से पूरे कौशल सृजन के लिए समन्वित कार्य एवं नवप्रवर्तित सोच की आवश्यकता है। ग्यारहवीं योजना में चलाए गए राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन ने कौशल विकास कार्यक्रमों में एक उदाहरण स्थापित किया है और कौशल विकास के लिए एक समन्वित कार्य योजना को स्थान दिया है। इस उद्देश्य के लिए एक तीन आयामी सांस्थानिक ढांचा पहले से ही विद्यमान है। यह व्यवस्था देश में कौशल विकास प्रणाली के लिए एक ठोस आधार निर्धारित करती है।

बारहवीं योजना के दौरान, कौशल में अंतराल का पता लगा कर उसे दूर करना होगा, जबकि बुनियाद को मजबूत किया जा चुका है। कौशल विकास के लिए समन्वित कार्य योजना के एक मुख्य घटक राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एन.एस.डी.सी.) ने महत्वपूर्ण प्रगति की है और विशेष रूप से बडे़ अनियोजित क्षेत्रों में लक्षित ऐसे अधिकांश कौशल प्रशिक्षण राज्य स्तर पर एन.डी.एस.सी। के हस्तक्षेप तथा नेतृत्व के माध्यम से आएंगे। इसके लिए एन.डी.एस.सी। को दिए जाने वाले समर्थन में पर्याप्त वृद्धि करनी होगी और बारहवीं योजना के दौरान सभी राज्यों में राज्य कौशल विकास मिशनों को पूर्ण कार्यात्मक एवं प्रभावी बनाना होगा।

मांग आधारित कौशल विकास

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यह सुनिश्चित करने के लिए कि कौशल प्रशिक्षण एक मांग आधारित रूप में चलाया जाता है, कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ठोस कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है। कौशल विकास के लिए पाठ्यक्रम को, नियोक्ताओं/उद्योग की आवश्यकता को पूरा करने के लिए एक अनवरत आधार पर स्थिति के अनुरूप पुनः निर्धारित करना होगा और स्व-रोजगार के उपलब्ध अवसरों के अनुसार ढ़ालना होगा। मान्यता तथा प्रमाणन प्रणाली को सुधारना होगा। कौशल-सूची एवं कौशल योजनाओं पर सूचना समयबद्ध आधार पर उपलब्ध कराने के लिए एक सांस्थानिक व्यवस्था स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए, उन क्षेत्रों पर विशेष बल देने सहित एक क्षेत्रीय अभिगम की आवश्यकता है, जहां रोजगार की अत्यधिक संभावना है। 

मानक उद्योग - प्रेरित क्षेत्र कौशल परिषदों-जिन्हें बारहवीं योजना के दौरान प्रभावी बनाया जाना चाहिए, द्वारा निर्धारित किए जा सकते हैं, जबकि प्रमाणन के प्रत्यायन (मान्यता) की प्रक्रिया स्वतंत्र, विशेषज्ञ एजेंसियों द्वारा की जा सकती है और प्रमाणन संस्थाओं पर छोड़ दिया जाए। वर्तमान शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थाओं में कौशल विकास केन्द्र स्थापित किए जा सकते हैं। इससे लागत तथा समय की भारी बचत सुनिश्चित होगी। कौशल विकास के लिए निर्धन व्यक्तियों को, प्रत्यक्ष वित्तीय अनुदान या ऋण के माध्यम से वित्तीय सहायता देने की भी एक व्यवस्था होनी चाहिए। कार्य-कालीन प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षुता प्रशिक्षण को एक अन्य पद्धति के रूप में पुनः तैयार करना होगा, ताकि इसे अधिक प्रभावी बनाया जा सके और पर्याप्त रूप से उन्नत किया जा सके।

रोजगार दफ्तर आउटरीच केंद्र बनें

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स्कूल स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा तथा आई.टी.आई. (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों)/ तथा आईटी.सी। (औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्रों) के माध्यम से व्यावसायिक प्रशिक्षण का व्यापक विस्तार एवं सुधार किए जाने की आवश्यकता है। सरकारी आई.टी.आई. के उन्नयन की परियोजना को बारहवीं पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान अधिक प्रभावी रूप में कार्यान्वित करने के लिए सार्वजनिक- निजी सहभागिता (पी.पी.पी.) के माध्यम से उत्कृष्टता के केन्द्र के रूप में पुनः समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है। एक तरफ स्कूलिंग में एकीकृत तथा दूसरी ओर राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा योग्यता ढांचे (एन.वी.ई.क्यू.एफ.) के माध्यम से लचीले अध्ययन साधन के रूप में स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। वित्त पोषण, सेवा प्रदान करने तथा कार्य-स्थलों के प्रावधान एवं प्रशिक्षकों के लिए प्रशिक्षण में सार्वजनिक निजी सहभागिता को बढ़ाया जाना चाहिए।

रोजगार कार्यालयों को आउटरिच प्वाइंट्स के रूप में पुनः स्थापित किया जा सकता है। निजी सहभागियों के कार्य-तंत्र में समन्वय लाने के लिए तथा विभिन्न कार्यक्रमों के परिणामों की निगरानी, मूल्यांकन एवं विश्लेषण करने के लिए एक प्रभावी विनियामक ढांचे की स्थापना करने के समय निजी सहभागिता की प्रवेश संबंधी बाधा को हटाए जाने की आवश्यकता है। इन सभी मामलों पर ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान पर्याप्त विचारपूर्ण ध्यान दिया गया है और अब बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कार्यात्मक विवरण तैयार किए जाने हैं और विशिष्ट पहल की जानी है।

व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण के माध्यम से औपचारिक कौशल प्राप्त कार्यबल की प्रतिशतता को बारहवीं योजना के अंत तक 12.0 प्रतिशत से बढ़ाकर 25.0 प्रतिशत करने का होना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग 70 मिलियन और व्यक्तियों को अगले पांच वर्षों में औपचारिक कौशल प्रदान करना होगा। लिहाज़ा, दो मत नहीं कि आने वाला कल हुनरमंद लोगों की मुट्ठी में होगा। 

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प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, शासकीय दिग्विजय

स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,राजनांदगांव

मो.9301054300

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