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गरीबी का मूल कारण स्वकर्म के प्रति आत्महीनता

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डॉ. दीपक आचार्य

 

भगवान किसी भी इंसान को गरीब रहने के लिए पैदा नहीं करता। वह हर किसी को सभी प्रकार का बौद्धिक और शारीरिक साम देकर धरती पर भेजता है। कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं लेकिन शेष सभी को वह सम्पूर्ण ऊर्जा और ताकत के साथ पैदा करता है। वह उसके लिए समझदार होने तक के लिए सभी प्रकार की व्यवस्थाएं भी किसी न किसी के माध्यम से मुहैया कराता है और उसे जीवन प्रदान करता है।

समझदारी के बाद हमेशा के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना अथवा सभी प्रकार की आत्मनिर्भरता पाना उसके हाथ में है। इसके लिए उसे परिश्रम, त्याग और तपस्या की आवश्यकता होती है।

आजकल के फैशनेबल उत्पादों, तरह-तरह की लुभावनी सामग्री और आकर्षक पैकिंग में आने वाली खान-पान की स्वादिष्ट और तलब पैदा कर देने वाली चीजों और दूसरी सभी प्रकार की अतिरेकपूर्ण उपयोग वाली भोग-विलास की सामग्री और संसाधनों की लम्बी सूची को छोड़ दिया जाए तो एक आदमी को बेहतर तरीके से जीने के लिए भगवान की ओर से किसी न किसी माध्यम से सारी व्यवस्थाएं उपलब्ध होती ही हैं।

इंसान के रूप में संतोषी जीवन जीने वाले लोग अपनी जिन्दगी जिस प्रकार जीते हैं, जीवन का भरपूर आनंद लेते हैं और सही मायनों में सुकून का अहसास करते हैं। अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप जीवनयापन करना और हर मामले में मर्यादित रहकर जीवन चलाना बहुत बड़ी कला है जिसे जो अपना लेता है वह संसार की तमाम समस्याओं से मुक्ति पा लेता है।

लेकिन आज की समस्या जरूरतों को पूरा करने की नहीं है बल्कि वह सब कुछ बटोर लेने की है  जो अपने काम का है और नहीं भी। काम का है तब तो उपयोग और उपभोग कर लेंगे और काम का नहीं है तो अपने पास जमा ही कर लेंगे, पता नहीं कब काम में आने लायक हो जाए। और ये भी नहीं तो वह अपने नाम तो कहलाएगा ही, हमें उसके स्वामित्व का सदा बोध तो होगा ही। वही हमारे लिए गर्व करने लायक हो सकता है।

हम आजकल आवश्यकताओं को नहीं देखते, जमाने की फैशन को देखते हैं, हम अपने आपको नहीं देखते, जमाने को देखते हैं और उसी के हिसाब से ढलने के लिए हमेशा उतावले-उद्विग्न रहा करते हैं।

हम वो बनना चाहते हैं जो जमाना बन रहा है। हम सभी अपने आपको भेड़चाल में ढाल दिया करते हैं।  दूसरे सारे लोग जैसे हैं हम भी वैसा ही बनना चाहते हैं, चाहे हम इसके लायक हो या न हों। हम सब लोग हद दर्जे के नकलची और खुदगर्ज होते जा रहे हैं। और इसका खामियाजा न सिर्फ हमें बल्कि पूरे समाज, हमारे क्षेत्र, प्रदेश और देश को भुगतना पड़ रहा है। 

पीढ़ी-दर-पीढ़ी से हमारी पूरे अर्थ तंत्र और आत्मनिर्भर जीवन व्यवस्था के बहुआयामी पक्षों ने हर वर्ग और हर समुदाय, क्षेत्र को किसी न किसी रूप में आत्मनिर्भरता दी और कमाने-खाने लायक बनाते हुए जीवन निर्वाह को आसान किया।

कालान्तर में विदेशी वस्तुओं और तरह-तरह की सामग्री के आकर्षण ने हमारे परंपरागत कर्म, लघु एवं कुटीर उद्योग धंधों पर कहर बरपाया। पूरी की पूरी पीढ़ी अब विदेशी खान-पान की  ओर प्रवृत्त होकर अपनी सेहत और दिमाग का कबाड़ा करने लगी है।

हमें यह तक पता नहीं है कि हमारे कर्तव्य कर्म क्या हैं, हमें कहाँ जाना है और क्या करना है। जो दूसरे लोग कर रहे है। हम भी अंधाधुंध  नकल करते हुए भाग रहे हैं।  जो दूसरे करते हैं वह करना हमें भी अच्छा लगता है। औरों की देखादेखी हम भी अपने जीवन के लक्ष्य तय करने लगे हैं।

हमारे जीवन की सभी समस्याओं की जड़ यही है। इसी की वजह से हम न तो अपने वर्तमान का आनंद प्राप्त कर पा रहे हैं, न जीवन का कोई सुकून। भविष्य की अनिश्चितता और चिन्ताएं हमें हमेशा खाए जा रही हैं।

बच्चों का बचपन से लेकर पचपन तक का पूरा समय आनंदहीन अवस्थाओं से घिर कर रहने लगा है। लगता है सारे के सारे लोग इन्हें पैसा कमाने, बनाने और संग्रह करने की मशीनें बनाने पर तुले हुए हैं।

पढ़ाई करने वाले बच्चों को देख कर लगता है कि जैसे रोबोट्स की नई दुनिया हमारे सामने है जिनसे अपने आयु काल का समस्त आनंद, आमोद-प्रमोद, खेलकूद का मजा और चैन छीन कर हमने दिन-रात उन्हें ऎसे मुकाम पर धकेल दिया है जहाँ न मन की शांति है, न तन का स्वास्थ्य, और न मस्तिष्क की स्थिरता।

सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए मांग और आपूर्ति का सिद्धान्त जरूरी है लेकिन हम सभी लोगों की भेड़चाल ने बच्चों पर पढ़ाई-लिखाई और महानतम आदमी बनने का इतना अधिक बोझ लाद दिया है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

समाज में जिन हुनरों और कामों की जरूरत है उनमें से अधिकांश गायब हैं, उनके लिए हुनरमंदों का अभाव है। बहुत सारे क्षेत्र ऎसे हो गए हैं जहाँ विस्फोटक संख्या में भरमार है और इसी वजह से हमारी नई पीढ़ी बेरोजगारी और अभावों के कारण कुण्ठाओं में जी रही है।

हर कोई बड़ा पद चाहता है लेकिन आजकल पदों के मुकाबले हुनरों का मूल्य है और बड़े-बड़े पद-प्रतिष्ठा वाले लोगों की अपेक्षा ये लोग बहुत ज्यादा कमा भी रहे हैं और नौकरियों के तमाम तनावों से मुक्त भी हैं।

विभिन्न स्थानों पर कई पुरातन परंपराओं और लोकाचार, सामाजिक-साँस्कृतिक और धार्मिक रस्मों, जरूरी कामों से संबंधित ज्ञानी और हुनरमंद लोगों का अकाल हो गया है और इस वजह से उन कई परंपराओं का खात्मा तक हो गया है जो कि समाज-जीवन की मूल्यवत्ता, विकास और उन्नति के लिए जरूरी थी।

इनमें से खूब सारी परंपराएं हमारे जीवन विकास, संस्कार संवहन और ऊर्ध्वगमना व्यक्तित्व के लिए भी जरूरी थीं।  इन परंपराओं से जुड़े हुनरमंद लोगों की कमी आज सभी को अखरती है लेकिन सभी लोग सुरक्षित और विशिष्ट भविष्य तलाशने के फेर में उन पुरातन हुनरों को भुला चुके हैं।

हम सभी लोग यह महसूस भी करते हैं, चिन्तित भी होते हैं लेकिन अपनी ओर से कुछ नहीं करते। जबकि ढेरों पुरातन और विलक्षण हुनर ऎसे हैं जिन्हें आजीविका के तौर पर अपना लिया जाए तो नई पीढ़ी का बहुत बड़ा हिस्सा अपने भविष्य को सँवार सकता है।

आज की सामाजिक व्यवस्था को यह सोचने की आवश्यकता है कि किस प्रकार हम आज की जरूरतों के अनुरूप बच्चों को पुरातन संस्कारों, विलक्षण हुनरों आदि से जोड़कर उनके भविष्य को सुनहरा बनाने में मददगार बनें, उन्हें प्रोत्साहित करें और उन्हें सामाजिक सुरक्षा की गारंटी प्रदान करें। इससे नई पीढ़ी को भी आधार मिलेगा और पुरातन विधाओं का संरक्षण-संवर्धन भी हो सकेगा।  वंश-परंपरा से चले आ रहे अपने हुनरों की रक्षा करना हम सभी का फर्ज है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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