मंगलवार, 18 अगस्त 2015

बाल कविताएँ

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सुधा शर्मा                        

                   स्वर्णिम  काल
नहीं नहीं  नहीं  हो  सकता
इससे  मधुर  समय  जीवन  का।
रो-रोकर  बातें   मनवाना
सुख  लेना  आलिंगन  का ।।   


                माँ  की  गोद  सिंहासन  मेरा
                स्वर्ग   से  प्यारा  उसका  अंक ।
                नहीं   भूल  सकती  क्षणभर
                उस  म्रदु  स्म्रति का  एक अंश ।


छुआछूत  का  ज्ञान  नहीं  था
उँच  नीच  का  नहीं  था  दंभ ।
माँ  का  प्रफुल्लित  आनन  था
मेरे   जीवन   का   आलम्ब ।।


                  मैं  हँसती   तो   माँ   हँसती
                  रोने   पर    माँ   मुरझाती ।
                  मेरी  हँसी  अटल  रखने  केा
                  माँ  जाने  क्या-क्या  हर  जाती ।।


छोटे -छोटे  साधन  में  भी
बडी-बडी  खुशियाँ  मेरी ।
नहीं  चाहिए  हीरे  मोती
बस  प्यारी   गुडिया  मेरी ।।


                     माँ की  मधुर  कहानी  में मैं
                      परिलोक   में   हो   आती ।
                       माँ की मधुर-मधुर  लोरी में
                       मीठे  स्वप्न  में  खो  जाती ।।
                                                 
-----                          

 

लता सुमन्त

 

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बालकविता चूहा और टोपी

डॅा. लता सुमन्त

एक था चूहा

फुदकते रेंगते

उसे मिली चिन्दी

 

चिन्दी लेकर वो गया

धोबी दादा के पास

उससे कहा धोबी दादा.धोबी दादा

मेरी चिन्दी को धो दो

उसने कहा मैं नी धोता .

 

चूहा बोला - चावडी में जाऊँगा

चार सिपाही लाऊँगा

तुझको मार पीटवाऊँगा

और मैं तमाशा देखूँगा

धोबी दादा घबराया

उसने उसकी चिन्दी धो दी.

 

चिन्दी लेकर वो गया

रंगरेज के यहाँ

रंगरेज दादा ..रंगरेज दादा

मेरी चिन्दी को रंग दो

उसने कहा - मैं नी रंगता

चूहा बोला चावडी में जाऊँगा

चार सिपाही लाऊँगा

तुझको मार पीटवाऊँगा

और मैं तमाशा देखूँगा

 

रंगरेज घबराया

उसने फट से उसकी चिन्दी रंग दी.

बाद में वो गया दरजी दादा के पास

दरजी दादा .दरजी दादा

मेरी चिन्दी को सी दो

उसने कहा - मै नी सीता

चूहा फिर बोला - चावडी में जाऊँगा

चार सिपाही लाऊँगा

तुझको मार पीटवाऊँगा

और मै तमाशा देखूँगा

दरजी घबराया उसने टोपी सिल दी.

 

टोपी लेकर वो गया गोटे दादा के पास

गोटे दादा गोटे दादा

मेरी टोपी को गोटा लगा दो

गोटे दादा तुरन्त बोला

मै नी लगाता

चूहे ने फट से कहा - चावडी में जाऊँगा

चार सिपाही लाऊँगा

तुझको मार पीटवाऊँगा

और मै तमाशा देखूँगा

 

गोटे दादा घबराया

उसने टोपी को तुरन्त गोटा लगा दिया.

टोपी पहनकर चूहा

जा बैठा ऊँचे पेड़ पर

वहाँ से निकली राजा की स्वारी

वह देख चूहा बोला -

राजा - - - - - -राजा उपर ,छोटे - - - - -छोटे नीचे

 

सुनकर राजा को आया गुस्सा

चूहे को देख वह बोला

मुझे छोटा बोलता है

सिपाहियों से कहा - जाओ उसकी टोपी ले आओ

सिपाही टोपी ले आया

चूहा तुरंत बोला - राजा भिखारी

हमारी टोपी ले ली

 

राजा को फिर आया क्रोध

उसने टोपी फेंक दी

टोपी उठाकर चूहा फिर बोला -

राजा हमसे डर गया - - - - -

हमारी टोपी दे दी .

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