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पूर्वजों के पसीने से अभिसिंचित मिट्टी की महक-''पुरखा के भुइयां''

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वीरेन्द्र 'सरल'
जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बढ़कर माना गया है। मनुष्य जितना अपनी माँ से प्रेम करता है उतना ही अपनी मातृभाषा और मिट्टी अर्थात घर-आँगन और खेत-खलिहान से। मनुष्य चाहे कहीं भी रहे पर अपने उस गाँव को कभी भी नहीं भूल पाता जहाँ उसका जन्म हुआ है, जहाँ की मिट्टी में खेलकर वह पला-बढ़ा और पढ़ा है। वह जीवन पर्यन्त माटी के मोह के मजबूत डोर से बंधा रहता है। गांव की याद उससे हरदम सताती है। अवसर मिलते ही जब वह गांव आता है तो उसे ऐसा लगता है कि जेठ की भरी दोपहरी के बाद माँ की आँचल का घना छाया मिल गया हो। विपन्नता में जीवन यापन करने वाले किसी निर्धन कृषक के लिए तो गाँव में पूर्वजों के द्वारा छोड़ी हुई थोड़ी सी जमीन का महत्त्व कुबेर के खजाने से कम नहीं होता क्योंकि इस जमीन की मिट्टी से पूर्वजों के पसीने की महक महसूस होती है। किसी विषम परिस्थिति के कारण यदि उस जमीन को बेचना या गिरवी रखना पड़ जाय तो वह अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता है और रात दिन परिश्रम करके उस जमीन को पुनः प्राप्त करने का यत्न करता है 


दूसरी ओर आज हम देखते हैं कि भूमाफियाओं की गिद्धदृष्टि हर उस गरीब किसान की कृषि जमीन पर लगी हुई है जो सड़क के किनारे हो और जिसका बेहतर आद्यौगिक उपयोग करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता हो। ऐसे जमीन को हथियाने के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते हैं। साम, दाम, दंड, भेद आदि सभी नीतियों को अपनाकर वे ऐसे जमीन को हड़पना चाहते है। गरीब किसानों के जमीन हथियाने के लिए वे सबसे पहले प्रलोभन अर्थात ऊँची कीमत की नीति अपनाते है। ग्राम्य जीवन और ग्रामीण कृषक की इसी व्यथा-कथा का चित्र समाहित है उपन्यास 'पुरखा के भुइयां' में।


ग्राम्याचंल में घटित होने वाली घटनाओं को लेखक ने इस ताने-बाने के साथ पिरोया है कि कृति को पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी सत्यकथा पर आधारित चलचित्र आंखों के सामने चल रहा हो। राजनीतिक दांव-पेंच में माहिर भ्रष्ट्र विधायक मोटूमन नौटंकी को चुनाव में पराजित कर सीधे-सादे सरल व्यक्ति श्री सरजूदाऊ का विधायक निर्वाचित होना और सदैव अपने क्षेत्र के विकास और उन्नति के लिए तत्पर रहना 'सत्यमेव जयते' की सूक्ति को चरितार्थ करता है। दूसरी ओर गांव का पढ़ा-लिखा युवक देवमन का अपने पूरखे की जमीन पर यत्न पूर्वक खेती कर साधन-सम्पन्न होना 'श्रम मेव जयते' का सदेश देता है। विधुर विधायक सरजूदाऊ का विधवा नर्तकी से विवाहकर उसे पत्नी की प्रतिष्ठा प्रदान करना तथा माता-पिता की सहमति से सिद्धमन का रमला के साथ और देवमन का दुलारी के साथ प्रेमविवाह होना प्रगतिशील चेतना का संवाहक है। गरीबी और मजबूरी में ननकूराम का भ्रष्ट्र नेता नौटकी के हाथों की कठपुतली बनकर उसके इशारे पर नाचना ग्रामीण बेराजगार की व्यथा-कथा है। मोटूमन नौटंकी की गुमनाम मौत और कथा नायक मनसुखा के मौत के बाद भी उसकी समृति में अस्पताल का बनना, उनका जय-जयकार होना जीवन जीने की कला का सार्थक संदेश देता है।


यह कृति साहित्य में उपन्यास की कसौटी पर कितना खरा उतर पायेगी यह तो समीक्षक ही तय करेंगे पर छोटी सी जगह में रहकर बड़ी कृति रचने का परिश्रम साध्य कार्य करने वाले लेखक डॉ मनेश्वर अडिल 'ध्येय' को मेरी हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं-


वीरेन्द्र 'सरल'
बोड़रा (मगरलोड़)
जिला-धमतरी( छत्तीसगढ़)
पिन-493662

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