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स्वच्छन्दता से मुक्ति ही असली स्वतंत्रता

  डॉ. दीपक आचार्य

 

15 अगस्त को हम सभी स्वतंत्रता दिवस मनाते रहे हैं।

जड़-चेतन हर इकाई अपने आत्म आनंद में तभी रह सकती है जबकि वह अपने हिसाब से मुक्ति के साथ जीने के लिए समर्थ हो, अपने मनमाफिक काम कर सकने के लिए स्वतंत्र हो लेकिन यह स्वतंत्रता भी ऎसी हो जो कि किसी भी तरह की मर्यादा रेखाओं का न उल्लंघन करने वाली हो, न समानान्तर लम्बी लकीर खींचकर या कोई और बड़ा झण्डा गाड़कर स्वतंत्रता के कद को छोटा करने वाली हो। 

स्वतंत्र रहना और स्वतंत्रता पाते हुए जीना प्रत्येक प्राणी चाहता है। इंसान बुद्धिशाली होने के कारण इस मामले में ज्यादा ही संवेदनशील भी है और उतना ही उन्मुक्त स्वभाव का भी।

आज हम सभी लोग गर्व के साथ कह सकते हैं कि हम स्वतंत्र हैं और स्वतंत्र भारत के महान नागरिकों में शुमार हैं लेकिन यह स्वतंत्रता केवल वाणी और दिखावे का विषय नहीं है बल्कि मन-मस्तिष्क से भी स्वतंत्र होना चाहिए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी हमें समाजसुधार के लिए अभियान चलाने पड़ते हैं, नशामुक्ति की बातें करनी पड़ती हैं, अपराधों के उन्मूलन के लिए पूरी की पूरी ताकत लगानी पड़ती है, नारी अत्याचार होते हैं, तरह-तरह का आतंकवाद पाँव पसारता ही जा रहा है, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी अन्य-आय की तरह घर करने लगी है, हद दर्जे की कामचोरी और टाईमपास मनोवृत्ति बढ़ती ही जा रही है, समय पर आने-जाने और काम करने की प्रवृत्ति का अभाव हो रहा है।

पूरा का पूरा समाज पुरुषार्थहीनता और जड़ता के साये में जी रहा है। हमारी पूरी की पूरी शक्तिशाली पीढ़ी सारे ज्ञान और हुनर होने के बावजूद बेकार-बेरोजगार है और कुण्ठाओं में जी रही है।

हर तरफ तनावों, काम के बोझ के मारे जीवनीशक्ति का ह्रास हो रहा है, सभी लोग किसी न किसी से परेशान नज़र आते हैं। कोई खुद के कर्मों और सोच से परेशान है, कोई दूसरों की वजह से।

पूरा का पूरा देश स्वतंत्र होने के इतने सारे साल बीत जाने के बावजूद ढेरों समस्याओं, विपदाओं और विषमताओं से घिरा हुआ है। एक तरफ राष्ट्रीय समस्याओं का दावानल किसी न किसी मुखौटे के साथ सर उठा लेता है दूसरी तरफ हर क्षेत्र और कोने की अपनी कोई न कोई समस्या सामने आ ही जाती है।

और कुछ नहीं तो कभी अकाल, सूखे, अतिवृष्टि और बाढ़, तो कभी भूस्खलन, भूकंप और समुद्री लहरों का भीषण प्रकोप झेलने जैसी विवशताएँ हमारे सामने न्यूनाधिक रूप से सदैव बनी रही हैं। इनमें प्राकृतिक आपदाओं को छोड़ दिया जाए तब भी मानव जनित आपदाओं की संख्या भी कोई कम नहीं है और इन सभी आपदाओं का मूल कारण है हमारी स्वच्छन्दता । हमने स्वतंत्रता का गलत अर्थ लगा लिया है और स्वतंत्रता की जगह मनमाफिक और भरपूर स्वच्छन्दता को अपना लिया है।

स्वतंत्रता मर्यादित होकर आचरण करने और मानवीय आधारों को इंगित करती है जबकि स्वेच्छाचारिता और स्वच्छन्दता अपने आप में अमर्यादित आचरण का दूसरा नाम है जिसमें न कहीं कोई वर्जना है, न मर्यादाओं के पालन की कोई बाध्यता।

अपने-अपने हिसाब से खुद के जायज-नाजायज स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जाने वाला हर प्रकार का स्वेच्छाचारी आचरण करना ही अपने आप में स्वच्छन्दता है। हम लोग स्वतंत्रता को ताक में रखकर आजकल इसी का आचरण करने लगे हैं।

हममें से किसी को भी यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि हम लोग किस प्रकार से उन्मुक्त, निरंकुश और बेफिक्र होकर स्वेच्छाचार कर रहे हैं, कौन लोग हैं जो इसमें आगे हैं और कौन से लोग हैं जो इसमें पीछे हैं। हम इस मामले खुद ही अपना आत्मचिन्तन कर लें यह अच्छा होगा।

आज का यह स्वतंत्रता दिवस हमें इसी बात की याद दिलाता है कि हम स्वतंत्र हैं, स्वतंत्र बने रहें और स्वतंत्रता की मर्यादाओं का पालन करें, कोई भी सीमा रेखा न लांघे, राष्ट्रहित, राष्ट्ररक्षा और राष्ट्रीय चरित्र को जीवन में सर्वोपरि रखें और राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के साथ सर्वमंगल के लिए समर्पित हों। स्वतंत्रता को गौण मानकर स्वच्छन्दता का जो राष्ट्र आचरण करता है वह अपनी स्वतंत्रता खो देता है।

आज का यह पावन दिवस यही कह रहा है। आईये देश के लिए जीने-मरने का ज़ज़्बा पैदा करें और पुण्यधरा भारतभूमि पर जन्म लेना सार्थक करते हुए नया इतिहास रचने में भागीदार बनें।

सभी को आजादी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ ....।

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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