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प्राची - अगस्त 2015 - लघुकथाएँ

प्राची अगस्त 2015 लघुकथाएँ

अनोखा-धन

मुकैश जैन ‘पारस’

महात्‍मा-बुद्ध उस बियाबान वन से गुजर रहे थे जहां रात में तो क्‍या, दिन में भी कोई घुसने से घबराता था. ऊपर से दुर्दांत डाकू अंगुलिमाल था. आतंक, जिसका नाम ही हत्‍या के शिकार लोगों की उंगलियों की माला पहनने के कारण अंगुलिमाल पड़ गया था. मगर बुद्ध सारे भय और दुराग्रहों से दूर, गंभीर शांति के साथ चले जा रहे थे. तभी अप्रत्‍याशित रूप से अंगुलिमाल उनके सामने आ धमका और अपनी कटार उनके सामने लहराते हुए बोला-‘अरे रुक

साधु और अपना सारा सामान यहीं रख दे.’ बुद्ध वहीं खड़े हो गए और कहा- ‘लो भाई, मैं तो रुक गया, पर तुम कब रुकोगे.’ डाकू फिर बोला- ‘अरे बातें नहीं, अपना धन मुझे सौंप दो. वरना तुम्‍हारा हाल भी औरों जैसा ही कर दूंगा.’

बुद्ध शांति से बोले- ‘भाई मेरे पास तो शांति, प्रेम और अहिंसा के सिवा और कोई धन नहीं हैं. मैं आज तुम्‍हें यही सब सौंपता हूं, स्‍वीकार करो.’ यह कहकर बुद्ध ने अंगुलिमाल को धर्मोपदेश दिया. अंगुलिमाल ने अपनी अंगुलियों की माला उतारकर फेंक दी और बुद्ध के चरणों में नत-मस्‍तक हो गया. आज लूट में उसे ‘अनोखा-धन’ प्राप्‍त हुआ था.

संपर्कः 19, अबुल फजल रोड,

बंगाली मार्केट, नई दिल्‍ली- 110001

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दो लघुकथाएं

अशोक गुजराती

हो सकता है

उसने पासपोर्ट के लिए अर्ज़ी दी थी. व्‍यक्‍तिगत सत्‍यापन हेतु पुलिसवाला घर पर आया. यहां-वहां हस्‍ताक्षर लिये, परिचय-पत्र आदि देखे और चुप बैठ गया. वह समझ गया कि यह ग़लत रिपोर्ट भेजेगा यदि इसे रिश्वत नहीं दी. उसने पूछ ही लिया-‘कितने?’ पुलिसिए ने बेषर्मी से हज़ार मांगे. उसने दे दिये.

उसका दूसरे ही दिन कहीं जाने का कार्यक्रम बना. आरक्षण करवाने गया. तत्‍काल में उसे पांच सौ रुपए अतिरिक्‍त देकर टिकट मिल गया. लौटकर वह बिजली का बिल सही कराने गया. उसे वहां चार सौ देने पड़े. पानी का पिछला बिल भरने के बावजूद नये बिल में वह रक़म पुनः डाल दी गयी थी. वह जल बोर्ड गया. यहां मात्र दो सौ में काम हो गया.

इन्‍हीं दिनों उसका एसी खराब हो गया. कंपनी को बारह फ़ोन करने के ग्‍यारह दिन बाद एक बंदा आया. बस आउटर को पानी से धोया, फ़िल्‍टर को कपड़े से साफ़ किया और एक फ़ार्म निकालकर बोला, ‘सब ठीक कर दिया साब, साढ़े पांच सौ कंपनी का सर्विसिंग चार्ज़ होता हैकृ’ वह समझ गया कि यह कंपनी को परे हटाकर कम पैसे लेने को आतुर है. इसने विचार किया-चलो इतनी बचत ही सही-उसे तीन सौ देकर रवाना किया.

एसी अगले दिन फिर बन्‍द हो गया. उस बंदे को लगातार पांच दिनों तक फ़ोन करता रहा. वह बहाने बनाकर रह जाता, आया नहीं. मरता क्‍या न करता, उसने एक प्राइवेट मेकैनिक से संपर्क किया. बूढ़े सरदारजी थे. आये. कुछ पार्टस्‌ निकाल कर ले गये. षाम तक कहीं से इलेक्‍ट्रानिक बोर्डों को सुधरवा कर ले भी आये. लगा दिया. बताया कि जिसने सुधारा, साढ़े तेरह सौ लिये और उनकी मज़दूरी हुई ढाई सौ. दे दिये उसने सोलह सौ, सरदारजी के आश्वासन पर कि एसी रुक जाये तो मेरी ज़िम्‍मेदारी.

एसी चलता रहा. कहीं कोई शिकायत न हुई. अभी-अभी हुए कटु अनुभव उसे बार-बार याद आ रहे थे. उसने पत्‍नी से कहा, ‘एसी तो अच्‍छा चल रहा है पर पता नहीं सरदारजी ने वहां साढ़े तेरह सौ दिये भी थे या उसमें भी अपना हिस्‍सा रख लिया. ढाई सौ में आजकल कौन काम करता है’

उसकी पत्‍नी ने थोड़ी देर सोचा, फिर जवाब दिया-‘कदाचित तुम्‍हारा अनुमान सही हो क्‍योंकि सरकार किसी की भी बने, देश में भ्रष्टाचार बेधड़क चल रहा है. लेकिन इसमें से एक मुद्‌दा निकल कर आता है कि चारों तरफ़ हो रही बेईमानी को सहते-सहते हमारा सोच इतना निष्ठुर हो गया है कि हम ईमानदार पर भी शक करने लगे हैं कि शायद उसने भी बेईमानी की होगी - हो सकता है, बूढ़े सरदारजी ने सब कुछ ईमानदारी से किया हो.

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अपना-अपना सच

वे हमेशा के चाक़-चौबंद. सिग्‍नल मिलते ही अपनी स्‍कूटी बढ़ा ले गये. अचानक मोड़ लेकर एक ऑटो उनके सामने आ गया. उन्‍होंने बमुश्‍किल ब्रेक लगाये और बोले, ‘सिग्‍नल तो देख लिया करो !’

उस ऑटो वाले ने उन्‍हें गंदी-सी गाली दी और निकल पड़ा. उनके मुंह से अनचाहे उससे भी भयंकर ग़लीज़ गाली फिसल पड़ी, जो ऑटो वाले ने निश्‍चित ही सुन ली होगी.

ऑटो वाला तो अपना काम निपटा कर- और शायद दारू पीकर -निश्‍चिंत घर जाकर सो गया होगा.

लेकिन वे देर तक अचम्‍भा करते रहे कि मैंने गाली दी. ऐसी अश्‍लील गाली ऐसा कैसे हो गया ?

वे रात भर विकल बने करवटें बदलते रहे.

 

सम्‍पर्कः बी-40, एफ-1, दिलशाद कॉलोनी,

दिल्‍ली-110 095.

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मां की निशानी

केदारनाथ ‘सविता’

विजय अपने माता-पिता का ज्‍येष्‍ठ पुत्र था. उसके चार भाई थे. पिता के स्‍वर्गवास के बाद वही परिवार का मुखिया था. सभी भाई अपने परिश्रम व लगन से सरकारी नौकरियों में लग गये थे. वे सक्षम और संपन्‍न थे. मां भी अपने पुत्रों की तरक्‍की से खुश थी. धीरे-धीरे मां की उम्र अस्‍सी वर्ष के ऊपर हो गयी. वह बीमार रहने लगी थी. डॉक्‍टर की दवा व पथ्‍य के सहारे जीवित थी.

एक दिन पांचों पुत्र मां के पास पहुंचे. चौथे नम्‍बर के पुत्र रामजी ने मां से कहा- ‘‘मां, आप अपनी ओर से मुझे अपनी कोई स्‍मृति भेंट में दे दें. वह यदि सोने-चांदी का होगा तो मैं उसका मूल्‍य भी दूंगा, ताकि अन्‍य भाइयों को बुरा न लगे.’’ मां ने खुशी-खुशी अपने गले से सोने की चेन उतार कर रामजी को दे दी. रामजी ने तुरंत अनुमान के आधार पर उसका मूल्‍य जेब से निकाल कर दे दिया. दूसरे पुत्र कृष्‍ण कुमार ने भी निशानी मांग ली. मां ने अपना संदूक मंगाया. उसमें से एक कीमती शॉल निकाल कर उसको दे दिया. इसी तरह मां अन्‍य पुत्रों को भी स्‍नेहपूर्वक अंगूठी या कपड़ा निशानी के तौर पर निकाल कर देने लगीं. सभी ने उसे सिर नवां कर ले लिया. किन्‍तु विजय की आंखों में आंसू आ गये. वह बोला- ‘‘मां, क्‍या तुम हम सबको छोड़कर जा रही हो?’’

‘‘नहीं, लेकिन इतनी अधिक उम्र हो गयी है. पता नहीं कब ऊपरवाला बुला ले. इसलिए मैं चाहती हूं कि तुम लोगों को अपनी कोई यादगार निशानी दे दूं.’’ मां ने समझाते हुए कहा.

विजय बोला- ‘‘मां, मुझे कोई निशानी नहीं चाहिए. बस, तुम हमेशा हमारी आंखों के सामने बनी रहो.’’ उसने मां का एक फोटो निकाला और उसके नीचे मां से अपना नाम लिखने को कहा. मां साक्षर थी. उन्‍होंने अपना नाम उस पर लिख दिया. विजय उस फोटो को चूमते हुए बोला- ‘‘मां, मैं केवल यही निशानी अपने पास रखूंगा. आपका कपड़ा, जेवर सिर्फ आपका है. वह मुझे नहीं चाहिए.’’

सभी भाइयों को अब अपना-अपना सामान हल्‍का लगने लगा.

 

संपर्कः पुलिस चौकी रोड, लालडिग्‍गी,

सिंहगढ़ गली (चिकाने टोला), मीरजापुर-231001(उ.प्र.)

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लघुकथा

भूकंप

डॉ.गीता गीत

संपत्ति को लेकर दीनदयाल जी के तीनों बेटे हमेशा झमेला करते रहते थे. बेटे चाहते थे पिताजी संपत्ति का बटवारा हंसी-खुशी कर दें. परेशान होकर दीनदयालजी ने अपने लिए एक मकान छोड़कर बाकी सभी कुछ तीनों संतानों में बराबर-बराबर बांट दिया.

एक दिन वह अपने घर में बैठे कुछ लिख-पढ़ रहे थे कि एकाएक भूकम्‍प आ गया. वह कुर्सी से गिर पड़े. उन्‍हें यह समझ में कतई नहीं आया कि आखिरकार यह हुआ कैसे था. तभी उनके तीनों पुत्र आये बोले- पापाजी, अभी-अभी भूकम्‍प आया था, आपको पता चला. दीनदयाल जी बोले- नहीं, मुझे पता नहीं चला. तीनों बेटों ने एक कागज उनके हाथ में थमा दिया. कागज और कुछ नहीं, उनके मकान का विक्रयनामा था. दीनदयाल जी का हाथ कांपने लगा, कांपते हुए बोले- मैं कहां रहूंगा? तीनों एक साथ बोले- वृद्धाश्रम है ना. दीनदयाल जी के पैरों तले जमीन खिसकती महसूस हुई. उनका सिर घूमने लगा. चीखकर बोले- अब बहुत बड़ा भूकंप आ गया है. तीनों बेटे बोले कहा- न जमीन डोल रही है और न मकान हिल रहा है.

दीनदयाल जी सीने पर हाथ रखकर जमीन पर गिर पड़े. तीनों बेटों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्‍या है?

संपर्कः 1050, सरस्‍वती निवास,

शक्‍ति नगर, गुप्‍तेश्‍वर, जबलपुर- 482001

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