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प्राची - अगस्त 2015 : कहानी - दासी

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हमारी विरासत

हमारी विरासत स्‍तम्‍भ के अंतर्गत हम हिन्‍दी कहानी के उद्‌भव और विकास के दौर की कहानियों को देने का प्रयास करेंगे. आरम्‍भ हम जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘दासी’ से कर रहे हैं. जयशंकर का नाम किसी भी पाठक के लिए अपरिचित नहीं है. शिक्षा के किसी न किसी चरण में हमने उनकी कोई कहानी, उपन्‍यास, गीत या नाटक अवश्‍य पढ़ा होगा.

महाकवि के रूप में सुविख्‍यात जयशंकर प्रसाद (1889-1937) हिन्‍दी साहित्‍य में विशिष्‍ट स्‍थान रखते हैं. इनका जीवन कड़े संघर्षों में बीता. तितली, कंकाल और इरावती जैसे उपन्‍यास एवं आकाशदीप, पुरस्‍कार व ममता जैसी कहानियां उनके कथा लेखन की अपूर्व ऊंचाइयां हैं.

कामायनी जैसे महाकाव्‍य के अमर रचयिता जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में अन्‍तर्द्वंद्व का जो रूप दिखाई पड़ता है, वह इनकी लेखनी का मौलिक गुण है. इनकी कहानियों में भी यह अन्‍तर्द्वंद्व गहन संवेदना के स्‍तर पर मौजूद है. इनकी अधिकांश कहानियां भावना प्रधान होने के साथ-साथ इतिहास तथा कल्‍पना के समन्‍वय पर आधारित हैं. इन कहानियों में शिल्‍प के स्‍तर पर भी मौलिकता के दर्शन होते हैं. भाषा की संस्‍कृतनिष्‍ठता तथा प्रांजलता विशिष्‍ट गुण हैं.

दासी

जयशंकर प्रसाद

यह खेल किसको दिखा रहे हो बलराज? कहते हुए फिरोजा ने युवक की कलाई पकड़ ली. युवक की मुट्ठी में एक भयानक छुरा चमक रहा था. उसने झुंझलाकर फिरोजा की तरफ देखा. वह खिलाखिलाकर हंस पड़ी. फिरोजा युवती से अधिक बालिका थी. अल्‍हड़पन, चंचलता और हंसी से बनी हुई वह तुर्क बाला सब हृदयों के स्‍नेह के समीप थी. नीली नसों से जकड़ी हुई बलराज की पुष्‍ट कलाई उन कोमल उंगलियों के बीच में शिथिल हो गई. उसने कहा फिरोजा, तुम मेरे सुख में बाधा दे रही हो.

सुख जीने में है बलराज! ऐसी हरी-भरी दुनिया, फूल-बेलों से सजे हुए नदियों के सुंदर किनारे, सुनहला सवेरा, चांदी की रातें इन सबों से मुंह मोड़कर आंखें बन्‍द कर लेना! कभी नहीं! सबसे बढ़कर तो इसमें हम लोगों की उलछकूद का तमाशा है. मैं तुम्‍हें मरने न दूंगी.

क्‍यों?

यों ही बेकार मर जाना! वाह, ऐसा कभी नहीं हो सकता. जिहून के किनारे तुकोंर् से लड़ते हुए मर जाना दूसरी बात थी. तब मैं तुम्‍हारी कब्र बनवाती, उस पर फूल चढ़ाती, पर इस गजनी नदी के किनारे अपना छुरा अपने कलेजे में झोंककर मर जाना बचपना भी तो नहीं है.

बलराज ने देखा, सुल्‍तान मसऊद के शिल्‍पकला-प्रेम की गम्‍भीर प्रतिमा, गजनी नदी पर एक कमानी वाला पुल अपनी उदास छाया जलधारा पर डाल रहा है. उसने कहा - वही तो, न जाने क्‍यों मैं उसी दिन नहीं मरा, जिस दिन मेरे इतने वीर साथी कटार से लिपटकर इसी गजनी की गोद में सोने चले गए. फिरोजा! उन वीर आत्‍माओं का वह शोचनीय अंत! तुम उस अपमान को नहीं समझ सकती हो.

सुल्‍तान ने सिल्‍जूको से हारे हुए तुर्क और हिंदू दोनों को ही नौकरी से अलग कर दिया. पर तुर्कों ने तो मरने की बात नहीं सोची?

कुछ भी हो, तुर्क सुल्‍तान के अपने लोगों में हैं और हिन्‍दू बेगाने ही हैं. फिरोजा! यह अपमान मरने से बढ़कर है.

और आज किसलिए मरने जा रहे थे?

वह सुनकर क्‍या करोगी? - कहकर बलराज छुरा फेंककर एक लम्‍बी सांस लेकर चुप हो रहा. फिरोजा ने उसका कंधा पकड़कर हिलाते हुए कहा - सुनूंगी क्‍यों नहीं. अपनी...हां, उसी के लिए! कौन है वह! कैसी है? बलराज! गोरी-सी है, मेरी तरह वह भी पतली-दुबली है न? कानों में कुछ पहनती है? और गले में?

कुछ नहीं फिरोजा, मेरी ही तरह वह भी कंगाल है. मैंने उससे कहा था कि लड़ाई पर जाऊंगा और सुल्‍तान की लूट में मुझे भी चांदी-सोने की ढेरी मिलेगी, जब अमीर हो जाऊंगा और तब आकर तुमसे ब्‍याह करूंगा.

तब भी मरने जा रहे थे! खाली ही लौटकर उससे भेंट करने की, उसे एक बार देख लेने की, तुम्‍हारी इच्‍छा न हुई! तुम बड़े पाजी हो. जाओ, मरो या जियो, मैं तुमसे न बोलूंगी.

सचमुच फिरोजा ने मुंह फेर लिया. वह जैसे रूठ गई थी. बलराज को उसके इस भोलेपन पर हंसी न आ सकी. वह सोचने लगा, फिरोजा के हृदय में कितना स्‍नेह है! कितना उल्‍लास है? उसने पूछा - फिरोजा, तुम भी तो लड़ाई में पकड़ी हुई गुलामी भुगत रही हो. क्‍या तुमने कभी अपने जीवन पर विचार किया है? किस बात का उल्‍लास है तुम्‍हें?

मैं अब गुलामी में नहीं रह सकूंगी. अहमद जब हिंदुस्‍तान जाने लगा था, तभी उसने राजा साहब से कहा था कि मैं एक हजार सोने के सिक्‍के भेजूंगा. भाई तिलक! तू उसे लेकर फिरोजा को छोड़ देना और वह हिंदुस्‍तान आना चाहे तो उसे भेज देना. अब वह थैली आती ही होगी. मैं छुटकारा पा जाऊंगी और गुलाम ही रहने पर रोने की कौन सी बात है? मर जाने की इतनी जल्‍दी क्‍यों? तुम देख नहीं रहे हो कि तुर्कों में एक नई लहर आई है. दुनिया ने उसके लिए जैसे छाती खोल दी है. जो आज गुलाम है, वही कल सुल्‍तान हो सकता है. फिर रोना किस बात का, जितनी देर हंस सकती हूं, उस समय को रोने में क्‍यों बिताऊं?

तुम्‍हारा सुखमय जीवन और भी लम्‍बा हो, फिरोजा, किंतु आज तुमने जो मुझे मरने से रोक दिया, यह अच्‍छा नहीं किया.

कहती तो हूं, बेकार न मरो. क्‍या तुम्‍हारे मरने के लिए कोई...?

कुछ भी नहीं, फिरोजा! हमारी धार्मिक भावनाएं बंटी हुई हैं, सामाजिक जीवन दम्‍भ से और राजनीतिक क्षेत्र कलह और स्‍वार्थ से जकड़ा हुआ है. शक्‍तियां हैं, पर उनका कोई केंद्र नहीं. किस पर अभिमान हो, किसके लिए प्राण दूं?

दूत, चले जाओ हिंदुस्‍तान में मरने के लिए कुछ खोजो. मिल ही जाएगा, जाओ न...कहीं वहां तुम्‍हारी...मिल जाय तो किसी झोंपड़ी ही में काट लेना. न सही अमीरी, किसी तरह तो कटेगी. जितने दिन जीने के हों, उन पर भरोसा रखना.

बलराज! न जाने क्‍यों मैं तुम्‍हें मरने देना नहीं चाहती. वह तुम्‍हारी राह देखती हुई कहीं जी रही हो, तब! आह कभी उसे देख पाती तो उसका मुंह चूम लेती. कितना प्‍यार होगा उसके छोटे-से हृदय में? लो, ये पांच दिहम, मुझे कल राजा साहब ने इनाम के दिए हैं. इन्‍हें लेते जाओ! देखो, उससे जाकर भेंट करना.

फिरोजा की आंखों में आंसू भरे थे, तब भी वह जैसे हंस रही थी. सहसा वह पांच धातु के टुकड़ों को बलराज के हाथ पर रखकर झाड़ियों में घुस गई. बलराज चुपचाप अपने हाथ पर के चमकीले टुकड़ों को देख रहा था. हाथ कुछ झुक रहा था. धीरे-
धीरे टुकड़े उसके हाथ से खिसक पड़े. वह बैठ गया - सामने एक पुरुष खड़ा हुआ मुस्‍करा रहा था.

बलराज!

राजा साहब. - जैसे आंख खोलते हुए बलराज ने कहा, और उठकर खड़ा हो गया.

मैं सब सुन रहा था. तुम हिन्‍दुस्‍तान चले जाओ. मैं भी तुमको यही सलाह दूंगा. किंतु, वह एक बात है.

वह क्‍या राजा साहब?

मैं तुम्‍हारे दुःख का अनुभव कर रहा हूं. जो बातें तुमने अभी फिरोजा से कही हैं, उन्‍हें सुनकर मेरा हृदय विचलित हो उठा है. किंतु क्‍या करूं? मैंने आकांक्षा का नशा पी लिया है. वही मुझे बेबस किए है. जिस दुःख से मनुष्‍य छाती फाड़कर चिल्‍लाने लगता हो, सिर पीटने लगता हो, वैसी प्रतिफल परिस्‍थितियों में भी मैं केवल सिर-नीचा कर चुप रहना अच्‍छा समझता हूं. क्‍या यह अच्‍छा होता है कि जिस सुख में आनन्‍दातिरेक से मनुष्‍य उन्‍मत्त हो जाता है, उसे भी मुस्‍कराकर टाल दिया करूं. सो नहीं होता. एक साधारण स्‍थिति से मैं सुल्‍तान के सलाहकारों के पद तक तो पहुंच गया हूं. मैं भी हिंदुस्‍तान का ही एक कंगाल था. प्रतिदिन की मर्यादा-वृद्धि, राजकीय विश्‍वास और उसमें सुख की अनुभूति से मेरे जीवन को पहेली बनाकर...जाने दो. मैंने सुल्‍तान के दरबार से जितना सीखा है, वही मेरे लिए बहुत है. एक बनावटी गम्‍भीरता! छल-पूर्ण विनय! ओह, कितना भीषण है, यह विचार! मैं धीरे-धीरे इतना बन गया हूं कि मेरी सहृदयता घूंघट उलटने नहीं पाती. लोगों को मेरी छाती में हृदय होने का संदेह हो चला है. फिर मैं तुमसे अपनी सहृदयता क्‍यों प्रकट करूं? तब भी आज तुमने मेरे स्‍वभाव की धारा का बांध तोड़ दिया है. आज मैं...

बस राजा साहब, और कुछ न कहिए. मैं जाता हूं. मैं समझ गया कि...

ठहरो, मुझे अधिक अवकाश नहीं है. कल यहां से कुछ विद्रोही गुलाम, अहमद नियाल्‍तगीन के पास लाहौर जानेवाले हैं, उन्‍हीं के साथ तुम चले जाओ. यह लो - कहते हुए सुल्‍तान के विश्‍वासी राजा तिलक ने बलराज के हाथों में थैली रख दी. अलराज वहां से चुपचाप चल पड़ा.

तिलक सुल्‍तान अहमद का अत्‍यंत विश्‍वासपात्र हिंदू कर्मचारी था. अपने बुद्धि-बल से कट्टर यवनों के बीच में अपनी प्रतिष्‍ठा दृढ़ रखने के कारण सुल्‍तान मसऊद के शासन काल में भी वह उपेक्षा का पात्र नहीं था. फिर भी वह अपने को हिंदू ही समझता था, चाहे अन्‍य लोग उसे कुछ समझते रहे हों. बलराज की बातें वह सुन चुका था. आज उसकी मनोवृत्तियों में भयानक हलचल थी. सहसा उसने पुकारा-फिरोजा!

झाड़ियों से निकलकर फिरोजा ने उसके सामने सिर झुका दिया. तिलक ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कोमल स्‍वर में पूछा - फिरोजा, तुम अहमद के पास हिंदुस्‍तान जाना चाहती हो?

फिरोजा के हृदय में कम्‍पन होने लगा. वह कुछ न बोली. तिलक ने कहा - डरो मत, साफ-साफ कहो.

क्‍या अहमद ने आपके पास दीनारें भेज दीं - कहकर फिरोजा ने अपनी उत्‍कण्‍ठा-भरी आंखें उठाईं. तिलक ने हंसकर कहा - सो तो उसने नहीं भेजीं, तब भी तुम जाना चाहती हो, तो मुझसे कहो.

मैं क्‍या कह सकती हूं? जैसी मेरी...कहते-कहते उसकी आंखों में आंसू छलछला उठे. तिलक ने कहा - फिरोजा, तुम जा सकती हो. कुछ सोने के टुकड़ों के लिये मैं तुम्‍हारा हृदय नहीं कुचलना चाहता.

सच! आश्‍चर्य-भरी कृतज्ञता उसकी वाणी में थी.

सच फिरोजा! अहमद मेरा मित्र है, और भी एक काम के लिए तुमको भेज रहा हूं. उसे जाकर समझाओ कि वह अपनी सेना लेकर पंजाब के बाहर इधर-उधर हिंदुस्‍तान में लूट-मार न किया करे. मैं कुछ ही दिनों में सुल्‍तान से कहकर खजाने और मालगुजारी का अधिकार भी उसी को दिला दूंगा. थोड़ा समझकर धीरे-धीरे काम करने से सब हो जायगा. समझी न, दरबार में इस पर गर्मा-गर्मी है कि अहमद की नीयत खराब है. कहीं ऐसा न हो कि मुझी को सुल्‍तान इस काम के लिए भेजें!

फिरोजा, मैं हिंदुस्‍तान नहीं जाना चाहता. मेरी एक छोटी बहन थी, वह वहां है? क्‍या दुःख उसने पाया? मरी या जीती है, इन कई बरसों से मैंने इसे जानने की चेष्‍टा भी नहीं की. और भी...मैं हिंदू हूं, फिरोजा! आज तक अपनी आकांक्षा में भूला हुआ, अपने आराम में मस्‍त, अपनी उन्‍नति में विस्‍मृत, गजनी में बैठा हुआ हिंदुस्‍तान को, अपनी जन्‍मभूमि को और उसके दुःख -दर्द को भूल गया हूं. सुल्‍तान महमूद के लूटों की गिनती करना, उस रक्‍त-रंजित धन की तालिका बनाना, हिंदुस्‍तान के ही शोषण के लिए सुल्‍तान को नई-नई तरकीबें बताना, यही तो मेरा काम था, जिससे आज मेरी इतनी प्रतिष्‍ठा है. दूर रहकर मैं सबकुछ कर सकता था, पर हिंदुस्‍तान कहीं मुझे जाना पड़ा -उसकी गोद में फिर रहना पड़ा - तो मैं क्‍या करूंगा. फिरोजा, मैं वहां जाकर पागल हो जाऊंगा. मैं चिर-निर्वासित, विस्‍मृत अपराधी, इरावती मेरी बहन! आह, मैं उसे क्‍या मुंह दिखाऊंगा. वह कितने कष्‍टों में जीती होगी. और मर गई हो तो...फिरोजा. अहमद से कहना, मेरी मित्रता के नाते मुझे इस दुःख से बचा ले.

मैं जाऊंगी और इरावती को खोज निकालूंगी - राजा साहब. आपके हृदय में इतनी टीस है, आज तक मैं न जानती थी. मुझे यही मालूम था कि अनेक अन्‍य तुर्क सरदारों के समान आप भी रंग-रलियों में समय बिता रहे हैं, किंतु बरफ से ढकी हुई चोटियों के नीचे भी ज्‍वालामुखी होता है.

तो जाओ फिरोजा. मुझे बचाने के लिए, उस भयानक आग से, जिससे मेरा हृदय जल उठता है, मेरी रक्षा करो -कहते हुए राजा तिलक उसी जगह बैठ गए. फिरोजा खड़ी थी. धीरे-धीरे राजा के मुख पर एक स्‍निग्‍धता आ चली. अब अंधकार हो चला. गजनी के लहरों पर से शीतल पवन उन झोपड़ियों में भरने लगा था. सामने ही राजा साहब का महल था. उसका शुभ गुम्‍बद उस अंधकार में अभी अपनी उज्‍ज्‍वलता से सिर ऊंचा किए था. तिलक ने कहा - फिरोजा, जाने के पहले अपना वह गाना सुनाती जाओ.

फिरोजा गाने लगी. उसके गीत की ध्‍वनि थी - मैं जलती हुई दीपशिखा हूं और तुम हृदय-रन्‍जन प्रभात हो. जब तक देखती नहीं, जला करती हूं और जब तुम्‍हें देख लेती हूं, तभी मेरे अस्‍तित्‍व का अंत हो जाता है - मेरे प्रियतम. संध्‍या की अंधेरी झाड़ियों में गीत की गुंजार घूमने लगी.

यदि एक बार उसे फिर देख पाता पर यह होने का नहीं. निष्‍ठुर नियति, उसकी पवित्रता पंकिल हो गई होगी. उसकी उज्‍ज्‍वलता पर संसार के काले हाथों ने अपनी छाप लगा दी होगी. तब उससे भेंट करके क्‍या करूंगा? क्‍या करूंगा? अपने कल्‍पना के स्‍वर्ण-मंदिर का खंडहर देखकर. कहते-कहते बलराज ने अपने बलिष्‍ठ पंजों को पत्‍थरों से जकड़े हुए मंदिर के प्राचीर पर दे मारा. वह शब्‍द एक क्षण में विलीन हो गया. युवक ने आरक्‍त आंखों से उस विशाल मंदिर को देखा और वह पागल सा उठ खड़ा हुआ. परिक्रमा के ऊंचे-ऊंचे खंभों से धक्‍के खाता हुआ घूमने लगा.

गर्भ-गृह के द्वारपालों पर उसकी दृष्‍टि पड़ी. वे तेल से चुपड़े हुए काले-काले दूत अपने भीषण त्रिशूल से जैसे युवक की ओर संकेत कर रहे थे. वह ठिठक गया. सामने देवगृह के समीप घृत का अखण्‍ड-दीप जल रहा था. केशर, कस्‍तूरी और अगर से मिश्रित फूलों की दिव्‍य सुगंध की झकोर रह-रह कर भीतर से आ रही थी. विद्रोही हृदय प्रणत होना नहीं चाहता था, परंतु सिर सम्‍मान से झुक ही गया.

देव! मैंने अपने जीवन में जान-बूझकर कोई पाप नहीं किया है. मैं किसके लिए क्षमा मांगूं? गजनी के सुल्‍तान की नौकरी, वह मेरी वश की नहीं, किंतु मैं मांगता हूं...एक बार उस, अपनी प्रेम प्रतिमा का दर्शन! कृपा करो. बचा लो.

प्रार्थना करके युवक ने सिर उठाया ही था कि उसे किसी को अपने पास से खिसकने का संदेह हुआ. वह घूमकर देखने लगा. एक स्‍त्री कौशेय वसन पहने हाथ में फूलों से सजी डाली लिए चली जा रही थी. युवक पीछे-पीछे चला. परिक्रमा में एक स्‍थान पर पहुंचकर उसने संदिग्‍ध स्‍वर से पुकारा - इरावती वह स्‍त्री घूमकर खड़ी हो गई. बलराज अपने दोनों हाथ पसारकर उसे आलिंगन करने के लिए दौड़ा. इरावती ने कहा - ठहरो. बलराज ठिठककर उसकी गम्‍भीर मुखाकृति को देखने लगा. उसने पूछा - क्‍यों इरा! क्‍या तुम मेरी वाग्‍दत्ता पत्‍नी नहीं हो? क्‍या हम लोगों का यज्ञवेदी के सामने परिणय नहीं होने वाला था? क्‍या...?

हां, होने वाला था किंतु हुआ नहीं, और बलराज. तुम मेरी रक्षा नहीं कर सके. मैं आतताई के हाथ से कलंकित की गई. फिर तुम मुझे पत्‍नी के रूप में कैसे ग्रहण करोगे? तुम वीर हो! पुरुष हो! तुम्‍हारे पुरुषार्थ के लिए बहुत-सी महत्‍वाकांक्षाएं हैं उन्‍हें खोज लो, मुझे भगवान्‌ की शरण में छोड़ दो. मेरा जीवन अनुताप की ज्‍वाला में झुलसा हुआ. मेरा मन, अब स्‍नेह के योग्‍य नहीं.

प्रेम की, पवित्रता की, परिभाषा अलग है इरा! मैं तुमको प्‍यार करता हूं. तुम्‍हारी पवित्रता से मेरे मन का अधिक संबंध नहीं भी हो सकता है. चलो, हम...और कुछ भी हों, मेरे प्रेम की ज्‍योति तुम्‍हारी पवित्रता को अधिक उज्‍ज्‍वल कर देगी.

भाग चलूं, क्‍यों? सो नहीं हो सकता. मैं क्रीत दासी हूं. म्‍लेच्‍छों ने मुझे मुलतान की लूट में पकड़ लिया. मैं उनकी कठोरता में जीवित रहकर बराबर उनका विरोध ही करती रही. नित्‍य कोड़े लगते. बांधकर मैं लटकाई जाती. फिर भी मैं अपने हठ से न डिगी. एक दिन कन्‍नौज के चतुष्‍पथ पर घोड़ों के साथ ही बेचने के लिए उन आततायियों ने मुझे खड़ा किया. मैं बिकी पांच सौ दिरहम पर, काशी के ही एक महाजन ने मुझे दासी बना लिया. बलराज! तुमने न सुना होगा, कि मैं किन नियमों के साथ बिकी हूं. मैंने लिखकर स्‍वीकार किया है, इस घर का कुत्‍सित से भी कुत्‍सित कर्म करूंगी और विद्रोह न करूंगी, - न कभी भागने की चेष्‍टा करूंगी, न किसी के कहने से अपने स्‍वामी का अहित सोचूंगी. यदि मैं आत्‍महत्‍या भी कर डालूं, तो मेरे स्‍वामी या उनके कुटुम्‍ब पर कोई दोष न लगा सकेगा. वे गंगा-स्‍नान किए से पवित्र हैं.

मेरे संबंध में वे सदा ही शुद्ध और निष्‍पाप हैं. मेरे शरीर पर उनका आजीवन अधिकार रहेगा. वे मेरे नियम विरुद्ध आचरण पर जब चाहें राजपथ पर मेरे बालों को पकड़कर मुझे दण्‍ड दे सकते हैं. मैं तो मर चुकी हूं. मेरा शरीर पांच सौ दिरहम पर जी कर जब तक सहेगा, खटेगा. वे चाहें तो मुझे कौड़ी के मोल भी किसी दूसरे के हाथ बेच सकते हैं. समझे! सिर पर तृण रखकर मैंने स्‍वयं अपने को बेचने में स्‍वीकृति दी है. उस सत्‍य को कैसे तोड़ दूं?

बलराज ने लाल होकर कहा - इरावती, यह असत्‍य है, सत्‍य नहीं. पशुओं के समान मनुष्‍य भी बिक सकते हैं! मैं यह सोच भी नहीं सकता. यह पाखण्‍ड तुर्की घोड़ों के व्‍यापारिक ने फैलाया है. तुमने अनजान में जो प्रतिज्ञा कर ली है, वह ऐसा सत्‍य नहीं कि पालन किया जाए. तुम नहीं जानती हो कि तुमको खोजने के लिए ही मैंने यवनों की सेवा की.

क्षमा करो बलराज, मैं तुम्‍हारा तर्क नहीं समझ सकी. मेरी स्‍वामिनी का रथ दूर चला गया होगा, तो मुझे बातें सुननी पड़ेंगी क्‍योंकि आज-कल मेरे स्‍वामी नगर से दूर स्‍वास्‍थ्‍य के लिए उपवन में रहते हैं. स्‍वामिनी देव-दर्शन के लिए आई थीं.

तब मेरा इतना परिश्रम व्‍यर्थ हैं. फिरोजा ने व्‍यर्थ ही आशा दी थी. मैं इतने दिनों भटकता फिरा. इरावती! मुझ पर दया करो.

फिरोजा कौन? फिर सहसा रुककर इरावती ने कहा - क्‍या करूं? यदि मैं वैसा करती, तो मुझे इस जीवन की सबसे बड़ी प्रसन्‍नता मिलती, किंतु वह मेरे भाग्‍य में है कि नहीं, इसे भगवान ही जानते होंगे? मुझे अब जाने दो. बलराज इस उत्तर से खिन्‍न और चकराया हुआ काठ के किवाड़ की तरह इरावती के सामने से अलग होकर मंदिर के प्राचीर से लग गया. इरावती चली गई. बलराज कुछ समय तक स्‍तब्‍ध और शून्‍य-सा वहीं खड़ा रहा. फिर सहसा जिस ओर इरावती गई थी, उसी ओर चला पड़ा.

युवक बलराज कई दिन तक पागलों-सा धनदत्त के उपवन से नगर तक चक्‍कर लगाता रहा. भूख-प्‍यास भूलकर वह इरावती को एक बार फिर देखने के लिए विकल था, किंतु वह सफल न हो सका. आज उसने निश्‍चय किया था कि वह काशी छोड़कर चला जाएगा. वह जीवन से हताश होकर काशी से प्रतिष्‍ठान लाने वाले पथ पर चलने लगा. उसकी पहाड़ के ढोके सी काया, जिसमें असुर-सा बल होने का लोग अनुमान करते, निर्जीव-सी हो रही थी. अनाहार से उसका मुख विवर्ण था. यह सोच रहा था - उस दिन, विश्‍वनाथ के मंदिर में न जाकर मैंने आत्‍महत्‍या क्‍यों न कर ली! वह अपनी उधेड़-बुन में चल रहा था. न जाने कब तक चलता रहा. वह चौंक उठा - जब किसी के डांटने का शब्‍द सुनाई पड़ा - देखकर नहीं चलता! बलराज ने चौंककर देखा, अश्‍वारोहियों की लम्‍बी पंक्‍ति, जिसमें अधिकतर अपने घोड़ों को पकड़े हुए पैदल ही चल रहे थे. वे सब तुर्क थे. घोड़ों के व्‍यापारी-से जान पड़ते थे. गजनी के प्रसिद्ध महमूद के आक्रमणों का अन्‍त हो चुका था. मसऊद सिंहासन पर था. पंजाब तो गजनी के सेनापति नियाल्‍तगीन के शासन में था. मध्‍य-प्रदेश में भी तुर्क व्‍यापारी
अधिकतर व्‍यापारिक प्रभुत्‍व स्‍थापित करने के लिए प्रयत्‍न कर रहे थे. वह राह छोड़़कर हट गया. अश्‍वारोही ने पूछा- बनारस कितनी दूर होगा? बलराज ने कहा- मुझे नहीं मालूम.

तुम अभी उधर से चले आ रहे हो और कहते हो, नहीं मालूम! ठीक-ठीक बताओ, नहीं तो...

नहीं तो क्‍या? मैं तुम्‍हारा नौकर हूं. कहकर वह आगे बढ़ने लगा. अकस्‍मात्‌ पहले अश्‍वारोही ने कहा- पकड़ लो इसको.

कौन! नियाल्‍तगीन! सहसा बलराज चिल्‍ला उठा.

अच्‍छा, यह तुम्‍हीं हो बलराज! यह तुम्‍हारा क्‍या हाल है, क्‍या सुल्‍तान की सरकार में अब तुम काम नहीं करते हो?

नहीं सुल्‍तान मसऊद का मुझ पर विश्‍वास नहीं है. मैं ऐसा काम नहीं करता, जिसमें संदेह मेरी परीक्षा लेता रहे? किंतु इधर तुम लोग क्‍यों?

सुना है, बनारस एक सुंदर और धनी नगर है. और...

और क्‍या?

कुछ नहीं, देखने चला आया हूं. काजी नहीं चाहता कि कन्‍नौज के पूरब भी कुछ हाथ-पांव बढ़ाया जाय. तुम चलो न मेरे साथ. मैं तुम्‍हारी तलवार की कीमत जानता हूं. बहादुर लोग इस तरह नहीं रह सकते. तुम अभी तक हिंदू बने हो. पुरानी लकीर पीटने वाले, जगह-जगह झुकने वाले, सबसे दबते हुए, बनते हुए, कतराकर चलनेवाले हिंदू! क्‍यों! तुम्‍हारे पास बहुत-सा कूड़ा-कचड़ा इकट्ठा हो गया है, उनका पुरानेपन का लोभ तुमको फेंकने नहीं देता? मन में नयापन तथा दुनिया का उल्‍लास नहीं आने पाता. इतने दिन हम लोगों के साथ रहे, फिर भी...

बलराज सोच रहा था, इरावती का वह सूखा व्‍यवहार.
सीधा-सीधा उत्तर. क्रोध से वह अपना ओंठ चबाने लगा. नियाल्‍तगीन बलराज को परख रहा था. उसने कहा-तुम कहां हो? बातें क्‍या है? ऐसा बुझा हुआ मन क्‍यों?

बलराज ने प्रकृतिस्‍थ होकर कहा- कहीं तो नहीं. अब मुझे छुट्टी दो, मैं जाऊं. तुम्‍हारा बनारस देखने का मन है- इस पर मुझे विश्‍वास नहीं होता, तो भी मुझे इससे क्‍या? जो चाहो करो. संसार-भर में किसी पर दया करने की आवश्‍यकता नहीं-लूटो, काटो, मारो. जाओ, नियाल्‍तगीन.

नियाल्‍तगीन ने हंसकर कहा- पागल तो नहीं हो. इन थोड़े से आदमियों से भला क्‍या हो सकता है. मैं तो एक बहाने से
इधर आया हूं. फिरोजा का बनारसी जरी के कपड़ों का...

क्‍या फिरोजा भी तुम्‍हारे साथ है?

चलो, पड़ाव पर सब आप ही मालूम हो जायगा. कहकर नियाल्‍तगीन ने संकेत किया. बलराज के मन में न जाने कैसी प्रसन्‍नता उमड़ी. वह एक तुर्की घोड़े पर सवार हो गया.

दोनों ओर जवाहरात, जरी कपड़े, बर्तन तथा सुगंधित द्रव्‍यों की सजी हुई दुकानों से देश-विदेश के व्‍यापारियों की भीड़ और बीच-बीच में एक घोड़े के रथों से बनारस की पत्‍थर से बनी हुई चौड़ी गलियां अपने ढंग की निराली दिखती थीं. प्राचीरों से घिरा हुआ नगर का प्रधान भाग त्रिलोचन से लेकर राजघाट तक विस्‍तृत था. तोरणों पर गांगेय देव के सैनिकों का जमाव था. कन्‍नौज के प्रतिहार सम्राट से काशी छीन ली गई थी. त्रिपुरी उस पर शासन करती थी. ध्‍यान से देखने पर यह तो प्रकट हो जाता था कि नागरिकों में अव्‍यवस्‍था थी. फिर भी ऊपरी काम-काज, क्रय-विक्रय, यात्रियों का आवागमन चल रहा था.

फिरोजा कमख्‍वाब देख रही थी और नियाल्‍तगीन मणि-मुक्‍ताओं की ढेरी से अपने लिए अच्‍छे नग चुन रहा था. पास ही दोनों दूकानें थीं. बलराज बीच में खड़ा था. अन्‍यमनस्‍क फिरोजा ने कई थान छांट लिये थे. उसने कहा- बलराज! देखो तो, इन्‍हें तुम कैसा समझते हो, हैं न अच्‍छे? उधर से नियाल्‍तगीन ने पूछा- कपड़े देख चुकी हो, तो इधर आओ. इन्‍हें भी देख लो न! फिरोजा उधर जाने लगी थी कि दूकानदार ने कहा- लेना न देना, झूठ-मूठ तंग करना. कभी देखा तो नहीं. कंगालों की तरह जैसे आंखों से देखकर ही खा जायगी. फिरोजा घूमकर खड़ी हो गई. उसने पूछा- क्‍या बकते हो? जा-जा तुर्किस्‍तान के जंगलों में भेड़ चरा. इन कपड़ों का लेना तेरा काम नहीं. सटी हुई दूकानों से जौहरी अभी कुछ बोलना ही चाहता था कि बलराज ने कहा- चुप रह, नहीं तो जीभ खींच लूंगा.

ओहो! तुर्की गुलाम का दास, तू भी...अभी इतना ही कपड़े वाले के मुंह से निकला था कि नियाल्‍तगीन की तलवार उसके गले तक पहुंच गई. बाजार में हलचल मची. नियाल्‍तगीन के साथी
इधर-उधर बिखरे ही थे. कुछ तो वहीं आ गए. औरों को समाचार मिल गया. झगड़ा बढ़ने लगा, नियाल्‍तगीन को कुछ लोगों ने घेर लिया था, किंतु तुर्कों ने उसे छीन लेना चाहा. राजकीय सैनिक पहुंच गए. नियाल्‍तगीन को यह मालूम हो गया कि पड़ाव पर समाचार पहुंच गया है. उसने निर्भीकता से अपनी तलवार घुमाते हुए कहा- अच्‍छा होता कि झगड़ा यहीं तक रहता, नहीं तो हम लोग तुर्क हैं.

तुर्कों का आतंक उत्तरी भारत में फैल चुका था. क्षण-भर के लिए सन्‍नाटा तो हुआ, परंतु वणिक के प्रतिरोध के लिए नागरिकों का रोष उबल रहा था. राजकीय सैनिकों का सहयोग मिलते ही युद्ध आरम्‍भ हो गया, अब और भी तुर्क आ पहुंचे थे. नियाल्‍तगीन हंसने लगा. उसने तुर्की में संकेत किया बनारस का राजपथ तुर्कों की तलवार से पहली बार आलोकित हो उठा.

नियाल्‍तगीन के साथी संघटित हो गए थे. वे केवल युद्ध और आत्‍मरक्षा ही नहीं कर रहे थे, बहुमूल्‍य पदार्थों की लूट भी करने लगे. बलराज स्‍तब्‍ध था. वह जैसे एक स्‍वप्‍न देख रहा था. अकस्‍मात्‌ उसके कानों में एक परिचित स्‍वर सुनाई पड़ा. उसने घूमकर देखा- जौहरी के गले पर तलवार पड़ा ही चाहती है और इरावती ‘इन्‍हें छोड़ दो, न मारो’ कहती हुई तलवार के सामने आ गई थी. बलराज ने कहा- ठहरो, नियाल्‍तगीन. दूसरे ही क्षण नियाल्‍तगीन की कलाई बलराज की मुट्ठी में थी. नियाल्‍तगीन ने कहा- धोखेबाज काफिर, यह क्‍या? कई तुर्क पास आ गए थे! फिरोजा का भी मुख तमतमा गया था. बलराज ने सबल होने पर भी बड़ी दीनता से कहा- फिरोजा, यही इरावती है. फिरोजा हंसने लगी. इरावती को पकड़कर उसने कहा- नियाल्‍तगीन! बलराज को इसके साथ लेकर मैं चलती हूं, तुम आना. और इस जौहरी से तुम्‍हारा नुकसान न हो, तो न मारो! देखो, बहुत-से घुड़सवार आ रहे हैं. हम सबों का चलना ही अच्‍छा हैं.

नियाल्‍तगीन ने परिस्‍थिति एक क्षण में ही समझ ली. उसने जौहरी से पूछा- तुम्‍हारे घर में दूसरी ओर से बाहर जाया जा सकता है?

हां! - कांपते कण्‍ठ से उत्तर मिला.

अच्‍छा चलो, तुम्‍हारी जान बच रही है. मैं इरावती को ले जाता हूं. कहकर नियाल्‍तगीन ने एक तुर्क के कान में कुछ कहा! और बलराज को आगे चलने का संकेत करके इरावती और फिरोजा के पीछे धनदत्त के घर में घुसा. इधर तुर्क एकत्र होकर प्रत्‍यावर्तन कर रहे थे. नगर की राजकीय सेना पास आ रही थी.

चन्‍द्र्रभागा के तट पर शिविरों की एक श्रेणी थी. उसके समीप ही घने वृक्षों के झुरमुट में इरावती और फिरोजा बैठी हुई सायंकालीन गम्‍भीरता की छाया में एक-दूसरे का मुंह देख रही हैं. फिरोजा ने कहा- बलराज को तुम प्‍यार करती हो?

मैं नहीं जानती. एक आकस्‍मिक उत्तर मिला!

और वह तो तुम्‍हारे ही लिए गजनी से हिंदुस्‍तान चला आया.

तो क्‍यों आने दिया, वहीं रोक रखती.

तुमको क्‍या हो गया है?

मैं-मैं नहीं, मैं हूं दासी, कुछ धातु के टुकड़ों पर बिकी हुई हाड़-मांस का समूह, जिसके भीतर एक सूखा हृदय-पिण्‍ड है.

इरा! वह मर जायगा-पागल हो जायगा.

और मैं क्‍या हो जाऊं, फिरोजा?

अच्‍छा होता, तुम भी मर जाती! तीखेपन से फिरोजा ने कहा.

इरावती चौंक उठी. उसने कहा- बलराज ने वह भी न होने दिया. उस दिन नियाल्‍तगीन की तलवार ने यही कर दिया होता, किंतु मनुष्‍य बड़ा स्‍वार्थी है. अपने सुख की आशा में वह कितनों को दुखी बनाया करता है. अपनी साध पूरी करने में दूसरों की आवश्‍यकता ठुकरा दी जाती है. तुम ठीक कह रही हो फिरोजा, मुझे...

ठहरो, इरा! तुमने मन को कड़वा बनाकर मेरी बात सुनी है. उतनी ही तेजी से उसे बाहर कर देना चाहती हो.

मेरे दुखी होने पर जो मेरे साथ रोने आता है, उसे मैं अपना मित्र नहीं जान सकती, फिरोजा. मैं तो देखूंगी कि वह मेरे दुःख को कितना कम कर सका है. मुझे दुःख सहने के लिए जो छोड़ जाता है, केवल अपने अभिमान और आकांक्षा की तुष्‍टि के लिए. मेरे दुःख में हाथ बंटाने का जिसका साहस नहीं, जो मेरी परिस्‍थिति में साथी नहीं बन सकता, जो पहले अमीर बनना चाहता है, फिर अपने प्रेम का दान करना चाहता है, वह मुझसे हृदय मांगे, इससे बढ़कर धृष्‍टता और क्‍या होगी?

मैं तुम्‍हारी बहुत-सी बातें समझ नहीं सकी, लेकिन मैं इतना तो कहूंगी कि दुःखों ने तुम्‍हारे जीवन की कोमलता छीन ली है.

फिरोजा...मैं तुमसे बहस नहीं करना चाहती. तुमने मेरा प्राण बचाया है सही, किंतु हृदय नहीं बचा सकती. उसे अपनी खोज-खबर आप ही लेनी पड़ेगी तुम चाहे जो मुझे कह लो. मैं तो समझती हूं कि मनुष्‍य दूसरों की दृष्‍टि में कभी पूर्ण नहीं हो सकता. पर उसे अपनी आंखों से तो नहीं ही गिरना चाहिए.

फिरोजा ने संदेह से पीछे की ओर देखा. बलराज वृक्ष की आड़ से निकल आया. उसने कहा- फिरोजा, मैं जब गजनी के किनारे मरना चाहता था, तो क्‍या भूल कर रहा था? अच्‍छा, जाता हूं.

इरावती सोच रही थी, अब भी कुछ बोलूं-

फिरोजा सोच रही थी, दोनों को मरने से बचाकर क्‍या सचमुच मैंने कोई बुरा काम किया?

बलराज की ओर किसी ने न देखा. वह चला गया.

रावी के किनारे एक सुंदर महल में अहमद नियाल्‍तगीन पंजाब के सेनानी का आवास है. उस महल के चारों ओर वृक्षों की दूर तक फैली हुई हरियाली है, जिसमें शिविरों की श्रेणी में तुर्क सैनिकों का निवास है.

वसंत की चांदनी रात अपनी मतवाली उज्‍ज्‍वलता में महल के मीनारों और गुम्‍बदों तथा वृक्षों की छाया में लड़खड़ा रही है, अब जैसे सोना चाहती हो. चन्‍द्रमा पश्‍चिम में धीरे-धीरे झुक रहा था. रावी की ओर एक संगमरमर की दालान में खाली सेज बिछी थी. जरी के परदे ऊपर की ओर बंधे थे. दालान की सीढ़ी पर बैठी हुई इरावती रावी का प्रवाह देखते-देखते सोने लगी थी - उस महल की जैसे सजावट गुलाबी पत्‍थर की अचल प्रतिमा हो.

शयन-कक्ष की सेवा का भार आज उसी पर था. वह अहमद के आगमन की प्रतीक्षा करते-करते सो गई थी. अहमद इन दिनों गजनी से मिले हुए समाचार के कारण अधिक व्‍यस्‍त था. सुल्‍तान के रोष का समाचार उसे मिल चुका था.

वह फिरोजा से छिपाकर, अपने अंतरंग साथियों से, जिन पर उसे विश्‍वास था, निस्‍तब्‍ध रात्रि में मंत्रणा किया करता. पंजाब का स्‍वतंत्र शासक बनने की अभिलाषा उसके मन में जग गई थी, फिरोजा ने उसे मना किया था, किंतु एक साधारण तुर्क दासी के विचार राजकीय कामों में कितने मूल्‍य के हैं, इसे वह अपनी महत्‍वाकांक्षा की दृष्‍टि से परखता था. फिरोजा कुछ तो रूठी थी और कुछ उसकी तबीयत भी अच्‍छी न थी. वह बंद कमरे में जाकर सो रही थी. अनेक दासियों के रहते भी आज इरावती को ही वहां ठहरने के लिए उसने कह दिया था. अहमद सीढ़ियों से चढ़कर दालान के पास आया. उसने देखा एक वेदना-विमण्‍डित सुप्‍त सौंदर्य! वह और भी समीप आया. गुम्‍बद के बगल चंद्रमा की किरणें ठीक इरावती के मुख पर पड़ रही थीं. अहमद ने वारुणी विलसित नेत्रों से देखा, उस रूपमाधुरी को, जिसमें स्‍वाभाविकता थी, बनावट नहीं. तरावट थी, प्रसाद की गर्मी नहीं. एक बार सशंक दृष्‍टि से उसने चारों ओर देखा- सामने अहमद! इरावती खड़ी होकर अपने वस्‍त्र संभालने लगी. अहमद ने संकोच-भरी ढिठाई से कहा- तुम यहां क्‍यों सो रही हो, इरा?

थक गई थी. कहिए, क्‍या लाऊं?

थोड़ी शीराजी- कहते हुए वह पलंग पर जाकर बैठ गया और इरावती का स्‍फटिक-पात्र में शीराजी उंड़ेलना देखने लगा.
इरा ने जब पात्र भरकर अहमद को दिया, तो अहमद ने सतृष्‍ण नेत्रों से उसकी ओर देखकर पूछा- फिरोजा कहां है?

सिर में दर्द है, भीतर सो रही है.

अहमद की आंखों में पशुता नाच उठी. शरीर में एक सनसनी का अनुभव करते हए उसने इरावती का हाथ पकड़कर कहा- बैठो न, इरा! तुम थक गई हो.

आप शर्बत लीजिए. मैं जाकर फिरोजा को जगा दूं.

फिरोजा! फिरोजा के हाथ मैं बिक गया हूं क्‍या, इरावती! तुम - आह! इरावती हाथ छुड़ाकर हटनेवाली ही थी कि सामने फिरोजा खड़ी थी. उसकी आंखों में तीव्र ज्‍वाला थी. उसने कहा- मैं बिकी हूं, अहमद! तुम भला मेरे हाल क्‍यों बिकने लगे? लेकिन तुमको मालूम है कि तुमने अभी राजतिलक को मेरा दाम नहीं चुकाया, इसलिए मैं जाती हूं.

अहमद हत-बुद्धि! निष्‍प्रभ! और फिरोजा चली. इरावती ने गिड़गिड़ाकर कहा- बहन, मुझे भी न लेती चलोगी...?

फिरोजा ने घूमकर एक बार स्‍थिर दृष्‍टि से इरावती की ओर देखा और कहा- तो फिर चलो. दोनों हाथ पकड़े सीढी से उतर गईं.

बहुत दिनों तक विदेश में इधर-उधर भटकने पर बलराज जब से लौट आया है, तब से चंद्रभागा-तट के जाटों में एक नई लहर आ गई है. बलराज ने अपने सजातीय लोगों को पराधीनता से मुक्‍त होने का संदेश सुनाकर उन्‍हें सुल्‍तान-सरकार का अबाध्‍य बना दिया है. वीर जाटों को अपने वश में रखना, उन पर सदा फौजी शासन करना, सुल्‍तान के कर्मचारियों के लिए भी बड़ा कठिन हो रहा था.

इधर फिरोजा के जाते ही अहमद अपनी कोमल वृत्तियों को भी खो बैठा. एक ओर उसके पास मसऊद के रोश के समाचार आते थे, दूसरी ओर वह जाटों की हलचल से खजाना भी नहीं भेज सकता था. वह झुंझला गया. दिखावे में तो अहमद ने जाटों को एक बार ही नष्‍ट करने का निश्‍चय कर लिया, और अपनी दृढ़ सेना के साथ वह जाटों को घेरे में डालते हुए बढ़ने लगा, किंतु उसके हृदय में एक दूसरी ही बात थी. उसे मालूम हो गया था कि गजनी की सेना तिलक के साथ आ रही है, उसकी कल्‍पना का साम्राज्‍य छिन्‍न-भिन्‍न कर देने के लिए! उसने अंतिम प्रयत्‍न करने का निश्‍चय किया. अंतरंग साथियों की सम्‍मति हुई कि यदि विद्रोही जाटों को इस समय मिला लिया जाए, तो गजनी से पंजाब आज ही अलग हो सकता है. इस चढ़ाई में दोनों मतलब थे.

घने जंगल का आरम्‍भ था. वृक्षों के हरे अंचल की छाया में थकी हुई दो युवतियां उनकी जड़ों पर सिर धरे हुए लेटी थीं. पथरीले टीलों पर पड़ती हुई घोड़ों की टोपी के शब्‍द ने उन्‍हें चौंका दिया. वे अभी उठकर बैठ भी नहीं पाई थीं कि उनके सामने अश्‍वारोहियों का एक झुण्‍ड आ गया. भयानक भालों की नोंक
सीधे किए हुए स्‍वास्‍थ्‍य के तरुण तेज से उदीप्‍त जाट-युवकों का वह वीर दल था. स्‍त्रियों को देखते ही उनके सरदार ने कहा- मां, तुम लोग कहां जाओगी?

अब फिरोजा और इरावती सामने खड़ी हो गई. सरदार ने घोड़े पर से उतरते हुए पूछा- फिरोजा, यह तुम हो बहन!

हां भाई, बलराज! मैं हूं- और यह है इरावती! पूरी बात जैसे न सुनते हुए बलराज ने कहा- फिरोजा, अहमद से युद्ध होगा. इस जंगल को पार कर लेने पर तुर्क सेना जाटों का नाश कर देगी, इसलिए यहीं उन्‍हें रोकना होगा. तुम लोग इस समय कहां जाओगी?

जहां कहो, बलराज. अहमद की छाया से तो मुझे भी बचना है. फिरोजा ने अधीर होकर कहा.

डरो मत फिरोजा, यह हिन्‍दुस्‍तान है, और यह हम हिंदुओं का धर्म-युद्ध है. गुलाम बनने का भय नहीं. बलराज अभी यह कह ही रहा था कि वह चौंककर पीछे देखता हुआ बोल उठा- अच्‍छा, वे लोग आ ही गए हैं. समय नहीं है. बलराज दूसरे ही क्षण में अपने घोड़े की पीठ पर था. अहमद की सेना सामने आ गई. बलराज को देखते ही उसने चिल्‍लाकर कहा- बलराज! यह तुम्‍हीं हो.

हां, अहमद.

तो हम लोग दोस्‍त भी बन सकते हैं. अभी समय है- कहते-कहते सहसा उसकी दृष्‍टि फिरोजा और इरावती पर पड़ी. उसने समस्‍त व्‍यवस्‍था भूलकर, तुरंत ललकारा- पकड़ लो इन औरतों को? उसी समय बलराज का भाला हिल उठा. युद्ध का आरम्‍भ था.

जाटों की विजय के साथ युद्ध का अंत होने ही वाला था कि एक नया परिवर्तन हुआ. दूसरी ओर से तुर्क-सेना जाटों की पीठ पर थी. घायल बलराज का भीषण भाला अहमद की छाती में पार हो रहा था. निराश जाटों की रण-प्रतिज्ञा अपनी पूर्ति करा रही थी. मरते हुए अहमद ने देखा कि गजनी की सेना के साथ तिलक सामने खड़े थे. सबके अस्‍त्र तो रुक गए. परंतु अहमद के प्राण न रुके. फिरोजा उसके शव पर झुकी हुई रो रही थी और इरावती मू‍र्छित हो रहे बलराज का सिर अपनी गोद में लिये थी. तिलक ने विस्‍मित होकर यह दृश्‍य देखा.

बलराज ने जल का संकेत किया. इरावती के हाथों में तिलक ने जल का पात्र दिया. जल पीते ही बलराज ने आंखें खोलकर कहा- इरावती, अब मैं न मरूंगा?

तिलक ने आश्‍चर्य से पूछा- इरावती?

फिरोजा ने रोते हुए कहा- हां राजा साहब, इरावती.

मेरी दुखिया इरावती? मुझे क्षमा कर, मैं तुझे भूल गया था. तिलक ने विनीत शब्‍दों में कहा.

भाई! इरावती आगे कुछ न कह सकी, उसका गला भर आया था. उसने तिलक के पैर पकड़ लिये.

बलराज जाटों का सरदार है, इरावती रानी. चिनाब का वह प्रांत इरावती की करुणा से हरा-भरा हो रहा है, किंतु फिरोजा की प्रसन्‍न्‍ता की वहीं समाधि बन गई- और वहीं झाडू देती, फूल चढ़ाती ओर दीप जलाती रही. उस समाधि की वह आजीवन दासी बनी रही.

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