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प्राची - अगस्त 2015 - पाठकीय प्रतिक्रियाएँ - आपने कहा है

समीक्षा

प्राची का माह जुलाई 2015 का अंक अत्‍यंत ही रोचक और आनन्‍ददायक है, क्‍योंकि इसमें उत्कृष्ट साहित्‍यिक सामग्री है. इसकी कहानियां बहुत ही प्रभावित करने वाली हैं. और इसका सम्‍पादकीय तो बहुत ही यथार्थवादी है. ‘क्‍या हम आजाद है?’ एक ऐसा प्रश्‍न है जो हमें यह सोचने के लिए बाध्‍य कर देता है कि क्‍या हम वास्‍तव में आजाद हैं? उत्तर मिलता है हम वास्‍तव में आजाद नहीं हैं. अनादि काल से लेकर आज तक हम पराधीनता का जीवन जी रहे हैं. रूसों ने सच कहा है, ‘‘बच्‍चा स्‍वतंत्र पैदा होता है, परन्‍तु जैसे ही वह बड़ा होता हैै वह सर्वत्र सामाजिक
बन्‍धनों की जंजीरों में जकड़ जाता है.’’ समाज में हम शक्‍तिशाली लोगों के अधीन हैं. हम सभी धनबल, बाहुबल और बुद्धिबल के आगे झुक जाते हैं. जिनके पास सत्ता का बल है वह सबको झुकने के लिए बाध्‍य कर देता है. आतंकवादी देश के राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री तक को झुका देता है. जब तक समाज में बाहुबलियों,
धनकुबेरों, बुद्धिमानों और सत्ताधीशों का बोलबाला है, तब तक हमें अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता नहीं है. हमें स्‍वतंत्र हुए 68 वर्ष हो गए फिर भी हम अपनी बात स्‍वतंत्रतापूर्वक कहने के
अधिकारी नहीं हैं. हम जिसके विरुद्ध बोलना चाहते हैं वह किसी न किसी तरह से हमारी बोलती बन्‍द कर देगा और हमें विवश होकर उसके पक्ष में बोलना होगा.

मई माह के अंक में छपा ‘सावधान! बड़े भाई देख रहे हैं’ व्‍यंग्‍य श्री कुंवर प्रेमिल द्वारा लिखित लेख बहुत ही सारगर्भित है. इसमें व्‍यंग्‍यकार ने बड़े भाई की विशेषताओं पर बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रकाश डाला है. बड़े भाई की विशेषताएं अनुकरणीय हैं और उनकी कर्तव्‍यपरायणता प्रशंसनीय है. वास्‍तव में देश को ऐसे बड़े भाइयों की आवश्‍यकता है.

जुलाई माह के अंक में प्रकाशित कहानियां, गलती, अलाव, अपने लिए और मास्‍टर जी बहुत ही मर्मस्‍पर्शी हैं. गलती में प्रेम की जो दो पात्रों प्रो. मिश्रा और रामकिशन के द्वारा व्‍याख्‍या की गई है वह हमें सोचने के लिए प्रेरित करती है कि आखिर प्रेम की क्‍या परिभाषा है. ऐसा तो नहीं कि हम उसे केवल मनोरंजन और लक्‍जरी समझते हैं. मास्‍टर जी कहानी हमें प्रेरित करती है कि हम भी समाज के लिए कुछ त्‍याग करें. यदि लोग मास्‍टर जी की तरह अपना शरीर मेडिकल कालेज के विद्यार्थियों के लिए दान करें तो चिकित्‍सा विज्ञान अपनी प्रगति के चरमोत्‍कर्ष पर पहुंच जाएगी जिसकी मानव जगत को बहुत आवश्‍यकता है.

प्राची की अन्‍य रचनाएं भी प्रशंसनीय हैं. मैं प्राची की उत्तरोत्तर प्रगति की हार्दिक शुभकामना करता हूं.

शरदचन्‍द्रराय श्रीवास्‍तव

 

प्रजातंत्र है कहां!

17 जुलाई, 2015 को आनंद पर्वत थाना क्षेत्र में अकेली लड़की मीनाक्षी को, उसी के पड़ोस के, दो भाइयों ने, अपनी मां के सहयोग से, खुले-आम गली में दौड़ा कर, उसी के घर के बाहर, लगभग पैंतीस चाकू गोदकर मार डाला. गणतंत्र वहीं खड़ा होकर, भीरु बना सबकुछ देखता रहा. सभी को अपनी फिक्र थी, डर था, चिंता थी. फिर कैसा गणतंत्र है जिसके बहाने लाखों-हजारों महत्‍वपूर्ण और प्रतिष्‍ठित पदों पर आसीन लालची, लड़ाकू और संवेदनहीन प्रतिनिधि अपने निजी पारिवारिक जीवन का निर्वाह कर रहे हैं? क्‍या पानी की व्‍यवस्‍था करना, सीवर डलवाना, सड़कें बनवाना, चीन और पाकिस्‍तान से लड़ाईयां करना मात्र ही सामाजिक प्रबंध की जिम्‍मेदारी है? 68 वर्षों से विश्‍व के सबसे बड़े और मजबूत प्रजातंत्र का ठूंठा गौरव ढोने वाली सरकारों ने क्‍या प्रजातंत्र के विकास और मजबूती के लिए भी कोई एक काम किया है! हम जंगल में अकेले नहीं रहते, बल्‍कि समाज में मिलकर रहते हैं फिर भी हमें एकता से बल और साहस नहीं मिलता, बल्‍कि अपने नुकसान और जान गवाने का डर लगता है. हम समाज में अपने साथ किसी हितैषी को खड़ा नहीं देखते बल्‍कि डरपोक, प्रतिघाती और तंज कसने वाले आलोचक ही मिलते हैं. ऐसे प्रजातंत्र के लिए किसके बेटे और भाई का हृदय देश-भक्‍ति को प्रेरित होगा!

हमारे देश का गणतंत्र विभिन्‍न स्‍तर पर छोटे-बड़े गणतंत्रों का ताना-बाना है. परिवार, पड़ोस, मोहल्‍ला, वार्ड, विधानसभा, लोकसभा, विभिन्‍न औद्योगिक, धार्मिक और सामाजिक संगठन आदि इनके स्‍वरूप हैं. इनकी मजबूती, निडरता और कौशल क्षमता का विकास केवल अच्‍छे जन प्रबंधन से ही होगा- सड़कें और शौचालय बनाने से नहीं. सशक्‍त प्रजातंत्र हमारे देश की सभी छोटी-बड़ी कठिनाइयों से निपटने का एकमात्र और अचूक उपाय है. भारतवर्ष का दुर्भाग्‍य है कि इसके सभी प्रतिनिधि, निजी महत्‍वकांक्षा से हारे हुए हैं और भ्रष्‍टाचार का हाथ पकड़कर, निम्‍न स्‍तर का सामाजिक व्‍यवहार; राजनीति करते हैं. पी.एम., सी.एम. को अवरुद्व करने में अपना हित समझते है, सी.एम. निगम प्रमुखों को तथा सभी सरकारी विभाग नागरिकों को ज्‍यादा-से-ज्‍यादा ठग लेना चाहते हैं. ओछी प्रतिस्‍पर्धा, भ्रष्‍टाचार और परस्‍पर द्वेष के रहते, किसी समाज का, कोई भला नहीं हो सकता, चाहे लाखों कैमरा और महिला/पुरुष कमांडो ही क्‍यों ना तैनात किए गए हो.

उपरोक्‍त घटना, हमारी समाजिक सुरक्षा व्‍यवस्‍था पर ऐसा प्रहार है, जो हमारी आजादी और गणतंत्र के गौरव को कम करता है. इस बार स्‍वतंत्रता दिवस 15 अगस्‍त, 2015 हमें उस निर्दोष बच्‍ची, मीनाक्षी को राज्‍यीय संवेदना स्‍वरूप समर्पित करना चाहिये जिसे, सामाजिक कुप्रबंधन के कारण दिन के उजाले में, भरे समाज में अपनी जान गंवानी पड़ी. पुलिस अब भी है, समाज अब भी है परन्‍तु डर खत्‍म नहीं हुआ है. मनीषा की मृत्‍यु समाज के मुंह पर ताजा कलंक है. हमारे राजनेताओं को स्‍वतंत्रता दिवस के दिन कडे़ संकल्‍प लेने चाहिए कि हमें चाहे भूखे पेट ही क्‍यों ना रहना पड़े, किन्‍तु भविष्‍य में हम मिलकर रहेंगे और एक होकर चुनौतियों का सामना करेंगे. हम अपने साथियों और देशवासियों की कठिनाइयों और विपत्‍तियों के समय चुप नहीं रहेंगे. हमारे प्रतिनिधि इस पवित्र दिन कसम खाएं, कि वे जीते जी प्रजातंत्र को कभी कमजोर नहीं होने देंगे.

जनतंत्र की असीम शक्‍तियों का पूर्ण सदुपयोग ना हो पाने के कारण हमारे प्रजातांत्रिक ढांचे की सभी गांठें ढीली पड़ चुकी हैं. इन्‍हें शक्‍ति प्रदान करने की अवश्‍यक्‍ता है.

राजेश कुमार शर्मा, नई दिल्‍ली

 

कर्मचारी फाइलें सूंघकर काम निबटाते हैं

‘प्राची’ माह मई 2015 का अंक मिला. अमृता प्रीतम की कहानी पढ़ चुका हूं. रूसी कहानी ‘शहरी डौक्‍टर’ रोचक कहानी है. महादेवी वर्मा पर सीताराम पांडेय का लेख काफी श्रम करके लिखा गया है. यशपाल पर राजनारायण का लेख भी वैचारिक लेखन है. यशपाल का ‘झूठा सच’, ‘दिव्‍या’ और ‘मेरी तेरी उसकी बात’ मैं पढ़ चुका हूं. सुषमा श्रीवास्‍तव की ‘सुहागरात’ लम्‍बी कविता सुन्‍दर है. दुल्‍हन को जलाया तो उसने पति को भी लपेट लिया. दोनों साथ जल मरे.

‘प्राची’ जून 2015 में आपका संपादकीय ‘आत्‍महत्‍या’ को लेकर लिखा गया श्रेष्‍ठ संपादकीय में से है. रमेश मनोहरा की रचना ‘चेहरा उतर गया’ साधारण होते हुए भी आज के हालात का वर्णन करता है. आज अनेक सरकारी कर्मचारी फाइलों को सूंघ कर निबटाते हैं. जिनमें रुपयों की सुगंध आती है उन्‍हें पहले निबटाते हैं. बिजली विभाग के कर्मचारी तो बिजली से अधिक करंट मारते हैं. सरकारी अस्‍पताल, पुलिस, कोर्ट आदि में तो आदमी मर जाता है तो भी रिश्‍वत देनी पड़ती है. न्‍यायालय में मेरे सामने एक पत्रकार ने पेशकार को किसी काम के लिए पांच रुपये का एक नोट पकड़ाया. पेशकार ने उसे उठा कर फेंक दिया और कहा कि दस रुपये से कम में काम नहीं होगा. पत्रकार ने उसे उठा लिया और बताया कि मैंने इस नोट पर निशान लगवाकर आपको दिया था और बाहर आपकी गिरफ्‍तारी के लिए लोग टहल रहे हैं. उठकर देख लीजिए. देखने पर बात सही लगी. पत्रकार चूक गया था. उसे उसी नोट में पांच और मिलाकर पेशकार को देना था.

केदारनाथ ‘सविता’ मीरजापुर (उ.प्र.)

 

कहानी का समाधान अच्‍छा है

प्राची का जुलाई 2015 का अंक मिला. ‘क्‍या हम आजाद हैं’, आपकी संपादकीय सोचने को मजबूर करती है. इस अंक में प्रकाशित कहानी मास्‍टर जी, श्री प्रभात दुबे, एक अच्‍छी कहानी है, क्‍योकि कहानी का समाधान अच्‍छा किया वरना साम्‍प्रदायिक दंगे होते जरा भी देर न लगती. एक लंबे अर्से के बाद ओम प्रकाश मेहरा की कहानी ‘अलाव’ पढ़ने को मिली. इस अच्‍छी कहानी के लिए धन्‍यवाद. कविताएं गजलों में रजनी मोरवाल दोहे, देवेन्‍द्र कुमार मिश्रा की कविताएं, कृपा शंकर अचूक के गीत, भगवत दुबे, किशन स्‍वरूप की गजलों ने प्रभावित ही नहीं किया, अंक को उल्‍लेखनीय बना दिया है.

रमेश मनोहरा, जावरा (म.प्र.)

 

संघर्ष करना चाहिए

अंक जून 2015 प्राप्‍त हुआ. अंक गीत, गजल, व्‍यंग्‍य, कहानी आदि से सुसज्‍जित है. अपनी परम्‍परा का पालन ही कर रहा है.

संपादकीय के माध्‍यम से ‘आत्‍महत्‍या’ का व्‍यंग्‍यात्‍मक लेख अच्‍छा है. जो जीवन के संघर्षों से जूझ नहीं पाते. समस्‍याओं का समाधान नहीं कर पाते और आत्‍महत्‍या कर लेते हैं, वे सब कायर की श्रेणी में आते हैं. कठिनाइयों से पलायन नहीं अपितु संघर्ष करना चाहिए. यही सम्‍पादकीय का निहितार्थ है. बधाई.

सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’

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