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प्राची - अगस्त 2015 - हास्‍य कहानी : तमन्‍ना

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हास्‍य कहानी

तमन्‍ना

शफीक-उर-रहमान

तमन्‍ना वह लड़की थी जिसे दक्षिण ईरान में पहले मैंने देखा और जब शैतान ने उसे उत्तरी हिन्‍दुस्‍तान में देखा तो फौरन आसक्‍त हो गए.

जब शैतान ने मुझे तार देकर चाय पर बुलाया तो मैं समझ गया कि उन्‍हें किसी से प्‍यार हो गया है. ऐसे समय पर वह हमेशा तार देकर बुलाया करते हैं. तीसरे पहर मैं वहां पहुंचा, वह मुझे स्‍टेशन पर नहीं मिले. उनके घर पहुंचकर मैंने उन्‍हें हर जगह ढूंढा-सिवाय उस जगह के जहां वे थे. कुछ देर के बाद मुझे ख्‍याल आया कि छत पर देखूं क्‍योंकि आशिक बनने के बाद शैतान प्रायः छत पर टहला करते थे. ऊपर पहुंचकर मैंने देखा कि वे फर्श पर बैठे हैं. शायद इसका एक कारण यह भी था कि वहां कुछ और बैठने के लिए नहीं था.

जब वे अपनी प्‍यारी की दास्‍तान सुना रहे थे तो मैं खामोश बैठा अखबार पढ़ रहा था. मेरे ख्‍याल में उनकी यह हरकत बिल्‍कुल फिजूल थी और उनकी बातों का न सिर था न पैर. लेकिन मैंने अपनी कोमल भावनाओं को प्रकट न किया.

जब उन्‍होंने असफलता की सूरत में अपने आपको इस नश्‍वर संसार से डिसमिस कर देने की धमकी दी तो मैं चौंका.

‘‘आखिर तुम चाहते क्‍या हो?’’ मैंने अखबार की तह करते हुए पूछा.

‘‘मुझे मुद्दत से ऐसी लड़की की तलाश थी जो पढ़ी-लिखी हो. सुघड़ हो और खूबसूरत हो.’’

‘‘तो यह क्‍यों नहीं कहते कि तीन लड़कियों की तलाश थी.’’

‘‘अचानक मुझे वह लड़की मिल गई. मैं मोटरसाइकिल पर जा रहा था. रास्‍ते में मैंने उसकी पीठ देखी जो निःसंदेह दुनिया की सबसे ज्‍यादा खूबसूरत पीठ थी. मैंने करीब जाकर लिफ्‍ट के लिए पूछा और कहा कि मैं आपके रास्‍ते जा रहा हूं. उसने मेरी तरफ देखा और मैं बेहाश होते-होते बचा. मैंने कहा- मैं इस जगह अजनबी हूं. क्‍या आप अपने मकान तक मुझे रास्‍ता दिखा सकती हैं? उसने अपने घर का पता बता दिया और बोली-खबरदार जो मेरा पीछा किया...इसके बाद जो कुछ हुआ वह शेर से प्रकट है. उन्‍होंने यह शेर बिल्‍कुल बेमौका पढ़ा था- शायद उन्‍हें उसके अर्थ भी नहीं आते थे. केवल इसलिए पढ़ दिया कि फारसी का शेर था और इसमें तमन्‍ना का जिक्र था.

उन्‍होंने मुझे तमन्‍ना की तस्‍वीर दिखाई. मैंने बताया कि मैं इसे अच्‍छी तरह जानता हूं और वह खूबसूरत बिल्‍कुल नहीं है.

‘‘वह खूबसूरत जरूर है. अगर उसे एक खास अंदाज से देखा जाए.’’

‘‘वह अंदाज कौन-सा है?’’

‘‘उसके सिर्फ कुछ पोज अच्‍छे नहीं आते, एक सामने का, एक साइड का और एक तिरछे रुख से लिया हुआ. इनके अतिरिक्‍त सब पोज बड़े खूबसूरत आते हैं.’’

इतने में एक बुजुर्ग तशरीफ लाए जो पुलिस में नौकर थे. उन्‍होंने अपने थाने के बड़े दरवाजे पर स्‍वागतम्‌ लिख रखा था. ‘कभी थाने में तशरीफ लाइए’ वह हर वाक्‍य के बाद कहते थे. उनके आने पर विषय बदल गया और घरेलू किस्‍म की बातचीत शुरू हो गई. मिल्‍टन, गोर्की और शेक्‍सपियर का जिक्र छिड़ गया. अगले दिन शैतान मुझे तल्‍ख साहब के यहां ले गये. रास्‍ते में मुझे मालूम हुआ कि सौभाग्‍य से शैतान की मुलाकात दुनिया के महानतम व्‍यक्‍ति से हो गई है. तल्‍ख साहब समाज के सबसे बड़े विद्रोही हैं. देश के सबसे बड़े इंसान हैं. उनके लेखों में जादू है. उनकी कलम में जहर है.

पेंचदार रास्‍तों से और तंग गलियों से गुजरकर हम एक पुराने से अंधेरे मकान में पहुंचे. जहां एक छोटे कद के पीले चेहरे वाले सैकिण्‍ड हैंड साहब, ऐनक लगाए कुछ लिख रहे थे. सामने कुछ लोग बैठे उन्‍हें ध्‍यान से देख रहे थे. एक कोने में एक मरियल-सा कुत्ता बैठा दुम हिला रहा था. शैतान ने मेरा परिचय करवाया. ‘‘आप नेशनलिस्‍ट हैं या सोशलिस्‍ट?’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘तो फिर इम्‍पीरियलिस्‍ट होंगे.’’

‘‘जी नहीं.’’

‘‘तो फिर आप हैं क्‍या?’’

‘‘इन्‍सान हूं.’’

‘‘आप इन्‍सान बिल्‍कुल नहीं हैं. जब तक आप कम-से-कम कम्‍युनिस्‍ट न हों.’’

‘‘इन सबमें भेद क्‍या है?’’

‘‘तो गोया आपको भेद भी मालूम नहीं, गजब खुदा का!’’

‘‘सचमुच, मैं आज तक नहीं समझ सका कि एक रायलिस्‍ट, एक मार्कसिस्‍ट से क्‍यों खफा है? फासिस्‍ट एक एनार्किस्‍ट से अच्‍छी तरह क्‍यों नहीं पेश आता? रायलिस्‍ट क्‍यों अलहदा रहते हैं?’’

‘‘च्‌ च्‌ च्‌ च्‌! हमारे नौजवान किस कदर अपरिचित हैं? कितने अफसोस की बात है.’’

‘‘तल्‍ख साहब इन्‍हें छोड़िये. अपना लेख सुनाइये.’’ एक साहब बोले.

तल्‍ख साहब ने अपना लेख शुरू किया- ‘‘दुनिया की सबसे बड़ी बुराई ब्‍यूरोक्रेसी है जो किसी बीमार दिमाग को बीमार स्‍वप्‍न मालूम होती है. यद्यपि डेमोक्रेसी इससे भी बड़ी आफत है. मेरा ख्‍याल है कि यदि आज डिप्‍लोमेसी खत्‍म हो जाए तो दुनिया में शांति फैल जाए. सच पूछिये कि दुनिया की सबसे बुरी चीज अरिस्‍टोक्रेसी है.’’

‘‘लेकिन आपकी कोई पॉलिसी होनी चाहिए.’’ मैं डरते-डरते बोला.

मैं पालिसी के भी विरुद्ध हूं. पालिसी भी बुरी है. मैं विद्रोही हूं. मैं समाज का विरोधी हूं. इस जीर्ण सत्ता का विरोधी हूं. मैं हर प्रकार के बंधन का विरोधी हूं. लोग मुझे नास्‍तिक समझते हैं. हां! मैं नास्‍तिक हूं. खुदा का शुक्र है कि मैं नास्‍तिक हूं. जरा सोचिए किसने मेरी जिन्‍दगी का रस छीन लिया? किसने मेरी नाक पर ऐनक लगा दी? किसने मेरा हाजमा खराब कर दिया? किसने इस कमरे में मकड़ी के जाले लगा दिए? किसने मेरे मासूम कुत्ते का यह हाल कर दिया कि वह कई बार मुझे पहचानता भी नहीं? अजनबी समझता है. जरूर यह किसी का दोष है. इस जीर्ण संसार का दोष है.’’

वापसी पर शैतान ने बताया कि वह तल्‍ख साहब से मिलकर एक पत्रिका निकाल रहे हैं जिसका नाम ‘तमन्‍ना’ रखेंगे.

बड्‌डी अपनी बेहूदा-सी मोटर में आया जिसकी हर चीज शोर मचाती थी-सिवाय हार्न के. स्‍पीडोमीटर अर्से से काम नहीं कर रहा था. रफ्‍तार यों मालूम की जाती थी कि बीस मील फ्री घंटे पर दाहिना मडगार्ड हिलता था. पच्‍चीस मील पर बायां उसका साथ देता था. तीस मील पर फुट-बोर्ड थरथराने लगता. पैंतीस पर सब कुछ. इससे ज्‍यादा तेज हम उसे चलाने नहीं देते थे.

मोटर में इस कदर भीड़ होती कि यह मालूम करना भी कठिन हो जाता कि इसे चला कौन रहा है? व्‍हील पर कोई बैठा है, ब्रेक पर किसी का पांव है तो क्‍लच पर किसी का. थोड़ी-थोड़ी देर के बाद शोर मचाता. मैं गियर बदलूंगा, तुम जरा क्‍लच दबाना, जरा ब्रेक दबाना, मैं मोड़ने लगा हूं. तल्‍ख साहब के सम्‍मान में पार्टी हो रही थी, जिसमें तमन्‍ना खानम को भी निमंत्रित किया गया था. हम वहां पहुंचे तो केवल कुछ प्रगतिशील कवि और साहित्‍यकार शैतान के पुराने सहपाठी निकले. इन्‍हें देखते ही उछल पड़े- इन कुछ सालों में तुम कितने बदल गये हो- मैंने सिर्फ तुम्‍हारे हैट से पहचाना.- यह हैट बड़ा मजबूत है. कई बार खोया गया, बदला गया, टूट गया, फिर भी वैसे का वैसा रहा.

पत्रिका की बात होने लगी. शैतान बोले- ‘‘पत्रिका के मुख्‍य पृष्‍ठ पर जरूर लिखा जाये- तमन्‍ना खानम की स्‍मृति में.’’

मैंने उन्‍हें बताया कि स्‍मृति में तो तब लिखते हैं जब कोई मर जाये.

‘‘इससे बुजुर्गी टपकती है. यों मालूम होता है जैसे तमन्‍ना खानम साठ-सत्तर वर्ष की हों.’’

‘‘पत्रिका का नाम सिर्फ ‘तमन्‍ना’ रखा जाये’’ बड्‌डी ने सलाह दी.

एक साहब जो पत्रिका के होने वाले मैनेजर थे, फाइल खोलने लगे, ‘‘मित्रों मैंने पत्रिका के कुछ कायदे-कानून बनाये हैं. सुनियेः ये मासिक हर महीने की आखिरी तारीख को प्रकाशित होगा. लेखकों से प्रार्थना है कि अभी लेख भेजने की आवश्‍यकता नहीं है. केवल प्रगतिशील विज्ञापन छापे जायेंगे. दफ्‍तर रात के तीन बजे बंद कर दिया जायेगा. इसके बाद कोई साहब तशरीफ न लायें. दुःख पहुंचाने वाली आलोचनायें और दिल तोड़ने वाले लेख प्रायः प्रकाशित हुआ करेंगे.’’

‘‘और नुकसान की सूरत में लाभ बराबर-बराबर बांटा जायेगा.’’ एक साहब जो आर्थिक सहायता दे रहे थे बोले.

‘‘यह फैसला बाकी है कि इसे सचित्र बनाया जाये या नहीं यह देखिए मैं कुछ तस्‍वीरें लाया हूं.

एक प्रगतिशील तस्‍वीर पर शैतान चौंक पड़े, ‘‘चित्रकार कौन है?’’

‘‘रैम्‍ब्रा.’’

‘‘यह तस्‍वीर जरूर छापी जाये. आप रैम्‍ब्रा साहब से इसका सौदा कर लीजिये.’’

‘‘उनकी तो मृत्‍यु हो चुकी है.’’

‘‘ओह! परमात्‍मा उनकी आत्‍मा को शान्‍ति दे. बात यह है कि मैं इन दिनों अखबार नहीं पढ़ता.’’

‘‘उनकी मृत्‍यु को तो दो सदियां गुजर गयी हैं.’’

बड्‌डी ने मशविरा दिया कि, ‘‘नई तरह की पत्रिका निकाली जाये जिसमें हर प्रकार के लेख हों. कहानियों का अलग भाग हो. ठोस लेखों का अलग. गजलें और कविताएं अलग हों. इसी तरह नारी-जगत के लिए भी कोई जगह छोड़ी जाये...’’ सबने इस प्रस्‍ताव को पसंद किया. तय हुआ कि अलग भाग का अलग एडिटर नियुक्‍त हो.

अमरीका की बातें होने लगीं. एक बुजुर्ग बड्‌डी से बोले, ‘‘भई तुम्‍हारी फिल्‍मों से तो यूं मालूम होता है कि यहां तो काऊ-ब्‍वाय होते हैं या गैंगस्‍टर.’’

वहां भी हिन्‍दुस्‍तान के बारे में तरह-तरह की बातें मशहूर हैं कि यहां या तो राजे-महराजे होेते हैं या साधु और फकीर. लोग उड़नखटोलों पर सफर करते हैं और बीन बजाते हैं. हाथी, शेर, चीते गलियों में चहलकदमी करते हें. मैं स्‍वयं यहां आने से पहले सिर्फ दो हिन्‍दुस्‍तानियों को जानता था. महात्‍मा गांधी को और साबू को. क्‍या वास्‍तव में यहां हरम होते हैं? लोग कई-कई बीवियां रखते हैं.’’

‘‘आपके यहां एक मामूली हैसियत का आदमी कितनी बीवियां रख सकता है?’’

‘‘एक, वह भी मुश्‍किल से.’’

‘‘यहां तो फिर भी निस्‍बतन गरीबी है. आप तो स्‍वयं शादीशुदा होंगे. आपको तजुर्बा होगा...?’’

‘‘जी नहीं मै क्‍वारां हूं.’’ बड्‌डी बोला.

‘‘वास्‍तव में मुझे अभी तक किसी से मुहब्‍बत नहीं हुई. इसलिए शादी नहीं की. भला आप दोनों क्‍यों बैरंग हैं?’’

‘‘तुम्‍हारे देश में मुहब्‍बत करना जितना आसान है उतना ही यहां मुश्‍किल है. हिन्‍दुस्‍तान में मुहब्‍बत करते समय सबसे पहले धर्म आयेगा. अगर दोनों तरफ के लोग एक ही धर्म के हैं तो मुहब्‍बत हो सकेगी वर्ना बिल्‍कुल नहीं. आप सिर पटकिये, अपनी छाती कूटिये, आत्‍महत्‍या कर लीजिये लेकिन आप किसी दूसरे

धर्मवाले से मुहब्‍बत नहीं कर सकते. धर्म के बाद जातिपाति आयेगी और फिर आर्थिक समस्‍याएं. यानी आपकी आर्थिक हालत, फिर ऊंचे घराने का सवाल होगा और आखिर में सबसे महत्‍वपूर्ण बात आयेगी- अब्‍बाजान. हिन्‍दुस्‍तान में अब्‍बाजान की मर्जी के बगैर कुछ नहीं हो सकता. अगर इतनी रुकावटों के बावजूद आपमें मुहब्‍बत करने को हौसला है तो....’

‘‘ऊंचे घराने से तुम्‍हारा मतलब वे लोग तो नहीं जो दूसरी मंजिल में रहते हैं.’’

‘‘नहीं! बल्‍कि वे लोग जिनकी आर्थिक दशा अच्‍छी है.’’

‘‘मैंने हिन्‍दुस्‍तानी फिल्‍में देखी हैं. मेरे ख्‍याल में यहां परिन्‍दों को देखकर हीरो को हीरोइन की याद आ जाती है और हीरोइन को कोई और. परिन्‍दे चाहें तो कहानी का रुख बदल सकते हैं. हालांकि हकीकत यह है कि परिन्‍दों को इन्‍सानों में जरा-सी भी दिलचस्‍पी नहीं. और ये हमारी इतनी-सी भी परवाह नहीं करते.

‘‘तुम्‍हारे यहां जलवायु किस प्रकार की है? वहां के यातायात के साधन, आयात-निर्यात और जीविका कमाने के साधन बयान करो.’’

एक साहब जो जुगराफिये के उस्‍ताद थे, बोले, ‘‘जलवायु ऐसी अजीब है कि न जल को यकीन है न वायु को भरोसा है. सुबह लू चल रही है तो शाम को बर्फ पड़ रही है. एक रात इतनी सर्दी पड़ी कि सड़कों पर लोहे के बुत कांपने लगे और उन्‍होंने अपने हाथ अपनी जेबों में छुपा लिये. बर्फ की बनी हुई एक मूर्ति भागकर सामने के मकान में जा छुपी. अगले दिन मैं अपने भाई के साथ बाहर गया. इतनी तेज धूप निकली कि हम बारी-बारी एक-दूसरे के साये में बैठते थे. एक घटना मशहूर है कि हमारे गांव के बाहर एक झील है. एक तैराक ने ऊंची चोटी से उसमें छलांग लगाई. थोड़ी दूर आकर उसे पता चला कि नीचे पानी नहीं था. पत्‍थर नजर आ रहे थे. वह बड़ा सटपटाया, देखतेे-देखते एक बादल आया, बरसा और झील में पानी भर गया. लेकिन इतनी सर्दी हो गई कि पानी बर्फ बन गया. छलांग लगाई. लेकिन जब वह किनारे पर पहुंचा तो इतनी गर्मी हो गई थी कि उसे सरसाम हो गया.’’

‘‘आप अमरीकन जिन्‍दगी के बारे में लेख लिखिए.’’ इस पत्रिका के होने वाले मैनेजर बोले.

‘‘वहां के स्‍कूलों की जिंदगी के बारे में भी कुछ बताइये.’’ वहीं उस्‍ताद बोले.

‘‘हमारा स्‍कूल नदी के किनारे था. सर्दियों में नदी जम जाती. हम लोहे के जूते पहनकर बाजुओं से बादबान बांधकर बर्फ पर हवा के जोर से फिसलते और दूर-दूर चले जाते. गर्मियों में एक छोटी-सी किश्‍ती लेकर निकल जाते और कई-कई दिनों के बाद लौटते. दरिया के किनारे-किनारे लखपति सेठों की कोठियां थीं. उनके सामने हम बड़ी हिफाजत से हिचकोले देकर किश्‍ती को स्‍वयं ही डुबा देते. वे लोग हमें नदी से निकालते. अपने यहां ले जाते. बड़ी आवभगत होती. एक बार गलती से हमने किसानों के मकान के सामने किश्‍ती उलट दी. उन्‍होंने हमें निकाला तो सही लेकिन खूब कान मरोड़े, डराया, धमकाया कि अगर किश्‍ती चलानी नहीं आती तो बाहर क्‍यों निकलते हो. जब मौसम सुहाना होता तो हड़तालों का मौसम शुरू हो जाता. खुफिया जलसे होते. यह तय किया जाता कि किस बहाने हड़ताल की जाये. कई बार होस्‍टल के ऊपर की मंजिल आग के शोलों और धुएं से भर जाती, ऊंचे मंडेरों पर नन्‍हे बच्‍चे चहलकदमी करते. एकाएक आग, धुआं, बच्‍चे सब गायब हो जाते. आग और धुंआ विज्ञान के छात्र दवाइयों से पैदा करते थे. स्‍कूल के छोटे लड़कों को बच्‍चों के कपड़े पहनाकर ऊपर भेज दिया जाता. नीचे से वे बिल्‍कुल नन्‍हें-मुन्‍ने मालूम होते. स्‍कूल के बड़े कमरे में झूठ बोलने का मुकाबला होता. एक बार मैने यह मुकाबला सिर्फ एक वाक्‍य से जीत लिया. मैंने कहा कि मैंने आज तक कभी झूठ नहीं बोला.’’

‘‘और आपके उस्‍ताद, वे किस किस्‍म के थे?’’

‘‘खूब थे. एक उस्‍ताद अपने साथ हर सुबह कोई दो मन किताबें लाते. हर शाम वापस ले जाते. स्‍कूल में ड्रामा हुआ, नकल उतारी गयी. तीन लड़के पीले कपड़े पहनकर ऊंट बने और एक ऊंटवाला बना. ऊंटवाले को किसी ने बुलाया और सामान उठाने को कहा. सौदा तय हो गया तो ऊंटवाले ने पूछा कि सामान कहां है? जवाब मिला कि हमारे उत्‍साद की किताबें हैं. इस पर ऊंट वाला मचल गया. सिर हिलाकर बोला, हर्गिज नहीं और भाग गया. एक और उस्‍ताद शाकाहारी थे. वे हमेशा सब्‍जियों की प्रशंसा किया करते और गोश्‍त की बुराइयां. एक दिन लैक्‍चर दे रहे थेः सब्‍जियां पौष्‍टिक आहार हैं. सब्‍जियां संपूर्ण आहार हैं. मिसाल के तौर पर जरा घोड़े की तरफ तो देखो जो कि शाकाहारी है. एक लड़का उठकर बोला- और मिसाल के तौर पर जरा शेर की तरफ देखो जो मांसाहारी है. हमारे दर्जे को एक अधेड़ आयु की खातून भी पढ़ाती थीं. नाक पर ऐनक, बालों को इकट्ठा करके गुम्‍बद-सा बनाया हुआ, बात-बात पर आंखें मटक रही हैं, उंगलियां थिरक रही हैं. हाथ हिल रहे हैं. बाजू हिल रहे हैं. बड़ी खुश्‍क बातेें करती. एक दिन क्‍लास में आईं तो उन्‍होंने देखा कि एक लड़का वैसी ही ऐनक लगााये, वैसे ही जनाना कपड़े पहने, वैसे ही बाल सिर पर रखे हुए दाखिल हुआ. उसके पीछे दूसरा आया उसी हुलिये में. फिर तीसरा-चौथा, सारी क्‍लास उन्‍हीं की तरह बनी हुई थी. उन्‍होंने बात करते हाथ मटकाया. सब लड़कों ने उसी तरह हाथ मटकाया. उन्‍होंने आंखें घुमाइंर्, सबने आंखें घुमाईं. उन्‍होंने अंगुली से छत की तरफ इशारा किया. दूसरा हाथ फर्श की तरफ गया. सबने नकल की. उनका लैक्‍चर बहुत जल्‍दी खत्‍म हो गया. उसके बाद उन्‍होंने हमें कभी नहीं पढ़ाया.’’

‘‘आपने वहां की सोशल जिन्‍दगी के बारे में कुछ नहीं बतलाया.’’ एक लेखक बोले.

‘‘सोशल जिन्‍दगी मैंने वहां कभी नहीं देखी. मैं देहाती हूं.देहात में बेतकल्‍लुफी की चरम सीमा समझी जाती है. घरेलू किस्‍म की पार्टियां होती हैं जिनमें शामिल होने की शर्त यह है कि आप जिस तरह हों उसी तरह आना पड़ता है. कोई रात के लिबास में आता है, कोई तैरने के लिबास में, किसी ने वर्कशाप के कपड़े पहने होते हैं.’’

‘‘आपने अपना रोमांस नहीं सुनाया- निजी रोमांस.’’ एक कवि बोले. सबने अनुरोध किया कि जरूर सुनेंगे.

बड्‌डी कुछ देर शरमाता रहा, फिर बोला- ‘‘हालीवुड का जिक्र है. चांदनी रात थी. मैं बाग के एक कोने में खड़ा था. मेरे सामने गार्बो थी. सुगंधित फूलों की खुशबू, हवा के ठंडे झोंके, चांद की रोशनी, बस चारों ओर रोमांस बरस रहा था. मैंने बढ़कर गार्बो के होंठ चूम लिये. गाल चूमे, माथा चूमा, गर्दन चूमी. उसे इस कदर चूमा कि मेरा चेहरा फ्रेम के दूसरी तरफ निकल गया और तस्‍वीर फट गई.’’

तल्‍ख साहब आये-आते ही बोले- ‘‘खुदा के लिए रऔफी साहब आप इस तरह मत मुस्‍कराइये. आपका चेहरा मुस्‍कराहट के बगैर अच्‍छा मालूम होता है.’’

‘‘आप भूलते हैं इंसान ही ऐसा जानवर है जेा समझता हें और हंसता ह ै.’’ रऔफी ने कहा.

‘‘मैं केवल इतना जानता हूं कि इंसान जानवर है बस.’’ तल्‍ख साहब बोले. कागज निकाले गये और कार्यवाही शुरू हो गई. बड्‌डी की सलाह को स्‍वीकार कर लिया गया. पत्रिका को कई भागों में बांट दिया गया. शैतान ने अनुरोध किया कि उन्‍हें नारी-जगत के पृष्‍ठों को एडिटर बनाया जाए, वे एक नारी पत्रिका के एडिटर को जानते हैं, उससे काफी चीजें ले आयेंगे. दूसरे यह कि पत्रिका के मुखपृष्‍ठ पर एक शेर लिखा जाए. तल्‍ख साहब ने पहली बात मान ली लेकिन दूसरी के लिए इन्‍कार कर दिया.

‘‘मैं हर रोज चौबीस घंटे काम किया करूंगा. अगर हो सका तो इससे भी ज्‍यादा.’’ शैतान जोश भरे स्‍वर में बोले- ‘‘यह सब काम आप हजरात के जिम्‍में है. वर्ना मैं तो बेहद व्‍यस्‍त आदमी हूं. यहां तक कि जब मौत का बुलावा आयेगा तो भी यही कहुंगा कि दस मिनट रुक जाओ.’’ तल्‍ख साहब ने अपना थैला उठाया और चले गये.

बड्‌डी ने तल्‍ख साहब को बिल्‍कुल पसंद नहीं किया और बोला- ‘‘इस आदमी को हर समय यही ख्‍याल रहता है कि इस समय कहीं और होता तो बेहतर था. और यह अपने आप को उस समय बेहद व्‍यस्‍त समझता हे जब उसे कोई काम न हो.’’

तमन्‍ना खानम आईं मगर बड़ी देर के बाद. उनके साथ और औरतें भी थीं. चाय दुबारा शुरू हुई. बड्‌डी हमेशा औरतों के करीब बैठा करता था. कहता है कि खुशबू का मजा आ जाता है. तमन्‍ना से मेरा परिचय कराया गया.

‘‘मैंने आपको पहले कभी देखा है- आपके साथ एक लड़़की हुआ करती थी, उसकी नीली आंखें थीं और बाल सुनहरे. उसका लिबास शोख होता था और जूते हमेशा नये फैशन के. उसके कानों में हमेशा लम्‍बे-लम्‍बे चांदी के बंदे होते थे, और गले में जड़ाऊ हार. उसकी दाहिनी कलाई में चार चूड़ियां होतीं और बाईं में तीन. वह हर समय मुस्‍कराती रहती थी.’’

‘‘आप उसे जानती हैं?’’

‘‘जी नीं.’’

‘‘मैंने तेा उससे कभी बात तक नहीं की.’’ शैतान तमन्‍ना को एक ओर ले गया. ‘‘और तुमने मुझसे कुछ नहीं कहा- मुझे देखकर तुम्‍हें खुशी हुई, अफसोस हुआ या क्‍या हुआ.’’ तमन्‍ना बोली.

‘‘आह! ईरान. मेरे सपनों को देश. जों पहाड़ों पर लोग कालीन बिछाकर फूल सूंघते हैं और मर्तबानों में चाय पीते हैं. जों का एग्रीकल्‍चर दुनिया के प्राचीनतम एग्रीकल्‍चरों में से है. जों का ब्‍यूटी कल्‍चर सर्वश्रेष्‍ठ है. जहां कल्‍चर ही कल्‍चर है.’’

‘‘अच्‍छा मैं आपसे कल मिलूंगी.’’

‘‘तुम मुझसे अभी क्‍यों नहीं मिलतीं? काश कि तुम मेरी भावनाओं का अंदाजा लगा सकतीं. तुमहारे लिए मेरे दिल में किस किस्‍म की भावनाएं हैं. काश कि मैं बता सकता.’’ शैतान ने अचानक एक घुटनाजमीन पर टेक दिया और एक हाथ हवा में उठा दिया, शायद वे फिसल गये थे. उन्‍होंने एक कलाबाजी खाई. एक टहनी पकड़कर उठे और हवा में झूल गये. ‘‘समझ लो कि कुछ इस किस्‍म की भावनाएं हैं.’’

‘‘मगर आप मुझे सिर्फ तीन हफ्‍ते नहीं हैं. इस अर्से  हम दस घंटे रोजाना मिलते रहे हैं. यानी हमने करीब 200 घंटे इकट्ठे गुजारे हैं. वैसे आमतौर पर मुहब्‍बत करने वाले हफ्‍ते में दो या तीन बार मिल सकते हैं- वह भी सिर्फ एकआध घंटे के लिए. फिर लोगों का दखल भी होता है. और मौसम भी अच्‍छा नहीं हाता. इन तीन हफ्‍तों में मौसम भी सुहावना राह और लोगों ने भी तंग नहीं किया. इस हाल में जबकि हम शुरू-शुरू में हर हफ्‍ते तीन घंटे के लिए मिल सकते हों तो हिसाब से मैं तुम्‍हें सत्तर हफ्‍तों से जानता हूं यानी करीब डेढ़ साल से.’’

‘‘खुदा के लिए आप यों मत मुस्‍कराइये.’’

‘‘मुझे ईरान बहुत पसंद है. मेरे एक दोस्‍त के बुजुर्ग ईरान से आये थे. मैं फिर वहीं वापस जाना चाहता हूं. कालीनों और मर्तबानों की भूमिका. जहां सुबह से शाम तक चाय पी जाती हे और फारसी बोली जाती है. आह ईरान!’’

जिस स्‍वास्‍थ्‍यप्रद स्‍थान पर शैतान छुट्टियां गुजारने आये थे उसके बारे में लोगों की यह राय थी कि वह समुन्‍दर की सतह से कई हजार फुट नीचे है. वहां गर्मियों में तो क्‍या सर्दियों में भी सर्दी नहीं होती थी. एक वर्ष पहले शैतान क्रिसमस की छुटि्‌टयों में वहीं आए थे. एक होटल में ठहरे. मैनेजर से कहा- ‘‘मैं यहां सर्दियां गुजारने आया हूं.’’

‘‘मुझे अफसोस है कि हमारे यहां सर्दियां नहीं होतीं.’’ जवाब मिला.

इस बार फिर उसी होटल में ठहरे जो बिल्‍कुल स्‍टेशन के साथ है. इंजनों का शोर, सीटियां, आती-जाती ट्रेनों की गड़गड़ाहट. शैतान ने रात को खिड़की से झांककर मैनेजर से पूछा, ‘‘क्‍यों जनाब, ये होटल अगले स्‍टेशन कितने बजे पहुंचेगा?’’

होटल महंगा भी बहुत है. वैसे ही अधिक चार्ज कर लेते थे. एक दिन हम मैनेजर साहब से बातें कर रहे थे. एक आदमी ने छींक मारी. शैतान फौरन बोले- ‘‘हजरत यहां छींक मत मारिये. ये लोग इसका भी चार्ज कर लेंगे.’’

चलते समय शैतान ने एक आना मैनेजर के हाथ पर रख दिया, बोले- ‘‘मैंने आपका एक अंगूर कुचल दिया.’’ कुछ दिनों में तंग आ गये. होटल छोड़कर एक मकान किराये पर लिया. मैं और बड्‌डी हर शनि को शैतान से मिलने जाते और इतवार की शाम लौट आते.

शैतान नाश्‍ते पर शिकंजवी के साथ टोस्‍ट खाते. टोस्‍ट शिकंजवी में भिगो-भिगोकर. कभी-कभी अंडे भी होते. लेकिन इतने हल्‍के उबले हुए कि बस नौकर अंडे लेकर एक बार गर्म किचन से गुजर जाता. कभी बाहर जाते तो बच्‍चों की दूध की एक बोतल भरकर साथ ले जाते. उसे यूं पीते जैसे सिगार पी रहे हों. वहीं बोतल निकाली, थोड़ा-सा दूध पिया फिर जेब में रख ली.

दोपहर फर्श पर चौपड़ खेली जाती जिसे शैतान इनडोर गेम कहा करते थे.

बड्‌डी की मोटर के पीछे अनगिनत कुत्ते लग जाते. बड्‌डी का ख्‍याल था कि मोटर के लिए कुत्तों में हमेशा उत्‍सुकता रहती है. कुत्ता साइकिल या मोटर के पीछे केवल मनोरंजन के लिए नहीं दौड़ता. वह वास्‍तव में यह मालूम करना चाहता है कि ये लोग कहां जा रहे हैं? अगर ऐसे मौके पर कुत्ते को साफ-साफ बता दिया जाय कि वे कहां जा रहे हैं और कितनी देर के लिए जा रहे हैं तो वह फौरन पीछे हट जाता है और कुछ नहीं कहता. बड्‌डी यह नुस्‍खा प्रायः इस्‍तेमाल किया करता. एक बार कुत्तों से बातचीत करते-करते दुर्घटना हो गई. सिपाही ने पूछा मोटर कौन चला रहा था. हमने अज्ञानता प्रकट की कि हम सब तो पिछली सीट पर बैठे थे.

शैतान के मकान के सामने किसी थोकफरोश का बोर्ड लगा हुआ था जिसे वह हमेशा थूकफरोश पढ़ते. दुकान में असेम्‍बली हाल की एक लम्‍बी-चौड़ी तस्‍वीर लटकी हुई थी जिसे देखकर बड्‌डी हमेशा सवाल करता. शैतान बताते कि इस बिल्‍डिंग में मुद्दतों से वाद-विवाद हो रहा है.

वह पूछता- ‘‘अब तक कोई फैसला हुआ.’’ शैतान सिर हिलाकर कहते- ‘‘जरा ठहरना.’’ वह गरीब रिसीवर पकड़े खड़ा रहता. शैतान मोटर साइकिल पर उसके घर जा पहुंचते. दरवाजे में दाखिल होते हुए कहते कि हां तो बात यह थी-

हमने फैसला कर रखा था कि अखबार बिल्‍कुल नहीं पढेंगे. बड्‌डी का ख्‍याल था कि वही पुरानी घटनायें, वही पुरानी बातें- सब कुछ वहीं बार-बार होता है. अन्‍तर सिर्फ इतना है कि हर बार भिन्‍न जगहों पर होता है और भिन्‍न व्‍यक्‍तियों के साथ पेश आता हैं. बहुत दिन गुजर जाते तो बड्‌डी अखबार खरीदता और कहीं-कहीं की सुर्खियां मिलाकर पढ़ता. मिसाल के तौर पर अमुक लीडर की अमुक लीडर से मुलाकात, अमुक प्रान्‍त मेें महामारी फैल गयी. अमुक मशहूर राजनीतिज्ञ का बयान, अमुक शहर में अनगिनत कुत्ते पागल हो गये.

थोकफरोश साहब के बराबर एक बेहूदा-सा होटल था जिसमें खूब शोर मचता. हम भी वहां जाते. बड्‌डी की राय थी वहीं बड़े रसज्ञ लोग आते हैं. किसी मेज पर कहकहा पड़ता तो बड्‌डी दौड़कर जाता और पूछता कि लतीफा क्‍या था? क्‍योंकि उसकी राय के मुताबिक लतीफा किसी की निजी जायदाद नहीं होता. जो कोई अच्‍छा-सा लतीफा सुने उसे चाहिए कि आगे चलता कर दे.

जब किसी मेज पर दो आदमी सरगोशी में बातें करते और बार-बार हाथ मिलाते तो बड्‌डी को शक हो जाता कि यह किसी बेहूदा विषय पर बातचीत कर रहे हैं. प्रायः उसकी राय सही होती थी.

अगले हफ्‍ते तल्‍ख साहब के यहां बैठक हुई. तय हुआ कि उन्‍हें सब कुछ सुनाया जाये. प्रकाशित सिर्फ वही होगा जिसे वे पसंद फरमायेंगे. सबसे पहले शैतान ने फाइल निकाली- ‘‘हजरात ये चीजें एक मशहूर नारी पत्रिका के दफ्‍तर से लाया हूं. ये सब अप्रकाशित हैं और मौलिक हैं. एक लेख जादू और टोनों के महत्‍व पर है. एक औरत और पर्दे पर है. दूसरा पर्दे और औरत पर. एक कहानी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें करीब सभी किस्‍म के खानों के नाम हैं. करीब हर तरह के जेवरों और कपड़ों का जिक्र है. शादी की पूरी रस्‍में बयान की गई हैं.’’

‘‘ये सब पुरानी चीजें हैं.’’ तल्‍ख साहब बोले. ‘‘अच्‍छा, नारी-जगत के नाम से जो कुछ छपेगा उसका एक अंश सुनाता हूं - एक महिला ने लिखा है कि उनके कान लम्‍बे होते जा रहे हैं और नाक छोटी होती जा रही है. अगर किसी बहन या भाई को कोई नुस्‍खा याद हो तो पत्रिका में छपवा दें. उन्‍हें आपरेशन से डर लगता है. इसलिए कोई दवाई लिखें. एक महिला लिखती हैं- मैं बड़ी खुशी से सूचना देती हूं कि मेरी मंझली मामी की फूफी की लड़की की बहन के यहां एक नन्‍हीं-मुन्‍नी सी पैदा हुई है. बच्‍ची और बच्‍ची की मां दोनों ईश्‍वर की कृपा से कुशल से हैं. बच्‍ची के पिता भी कुशल से हैं. सब बहनें प्रार्थना करें कि परमात्‍मा इस नव पल्‍लवित कली को सही राह दिखायें. इसी खुशी में चार रुपये की तुच्‍छ रकम भेजती हूं और बड़े अफसोस की बात है कि मेरे सौतेले फूफा के सगे भतीजे के दादाजान की मृत्‍यु हो गई है. स्‍वर्गवासी की आयु अस्‍सी साल की थी. इस पत्रिका को खास तौर पर मंगाया करते थे और बडे़ शौक से पढ़ते थे. इस गम में तीन रुपये की तुच्‍छ रकम भेज रही हूं. एक और महिला ने लिखा है कि- मेरे पिताजी राय बहादुर ने अमुक टिकट पर अपने विरोधी राय साहब अमुक को 420 वोट से हरा दिया है और मुझे फिल्‍म ‘शाही डाकू’ का अमुक गीत चाहिए. एक महिला फरमाती हैं कि यहां मच्‍छर बहुत हो गये हैं. क्‍या कोई बहन या भाई इस सिलसिले में कुछ कर सकते हैं और मुझे जलेबियां पकाने का बहुत शौक है. अगर किसी को कोई नई तरकीब मालूम हो तो पत्रिका द्वारा सूचित करें. एक महिला ने लिखा है कि मैं किस मुंह से परमात्‍मा का धन्‍यवाद करूं कि उसने हम सबकी प्रार्थना सुनी. हमारे छोटे भाई की सगाई राय बहादुर अमुक की अमुक पुत्री से हो गई है. और मुझे यह गीत चाहिए जिसके शुरू के बोल हैःं अभी तो मैं जवान हूं.’’

‘‘यह सब कुछ घिसा-पिटा है.’’

‘‘दो विज्ञापन भी हैं- एक उस्‍तानी साहिबा का बैग खो गया है. वे लिखती हैं - पिछले हफ्‍ते मैं सिनेमा से तांगे में जा रही थी, मुझे सिनेमा का इतना शौक तो नहीं है. बस कभी-कभी चली जाती हूं. हवा तेज चल रही थी और मैंने ऐनक नहीं लगा रखी थी. मेरी नजर कमजोर नहीं. बस यूं ही कभी-कभी शौकिया लगा लेती हूं. मैंने ऐनक के लिए बैग खोलना चाहा. बैग में सिर्फ ऐनक रखी थी. मेक-अप की चीजें नहीं थीं. मैं मेक-अप नहीं करती.’’

‘‘ये विज्ञापन प्रगतिशील नहीं है.’’ तल्‍ख साहब बोले.

‘‘मैंने दाढ़ी पर लेख लिखा है.’’ एक लेखक अपनी ऐनक ठीक करते हुए बोले, ‘‘यह अपनी तरह की बिल्‍कुल नयी चीज है. एक बार मैैंने गर्मियों की छुट्टियों में यों ही दाढ़ी रख ली. कॉलेज खुला है. अरबी के प्रोफेसर ने मेरी प्रशंसा की कि बस दाढ़ी से चेहरा ज्‍योतिर्मय मालूम होता है. इंसान मर्द दिखायी देता है. शेर मालूम होता है.’’

‘‘कौन-सा शेर? सर्कस का या जंगल का?’’ शैतान ने पूछा.

‘‘शायद जंगल का. खैर, खूब प्रशंसा हुई. उसी शाम को सिगरेट सुलगाते हुए मैंने दाढ़ी का कुछ हिस्‍सा जला लिया. आईना देखा साफ करनी पड़ी. अगल रोज से वही प्रोफेसर मेरे पीछे पड़े हैं- इस मरदूद की शक्‍ल तो देखो. कैसी नहूसत बरस रही है. बदबख्‍त, बदनसीब, मनहूस. खुदा जाने क्‍या कुछ कहा. वार्षिक इम्‍तहान हुआ. मैं अरबी में फेल था.’’

‘‘तो उस रोज मैंने फैसला कर लिया कि दाढ़ी के बारे में अपने विचार जरूर छपवाऊंगा. कॉलिज में एक दाढ़ी वाले हजरत नये-नये आये थे. सारी दोपहर लायब्रेरी में गुजारते. प्रोग्राम के मुताबिक मैंने पौने दो रुपये की एक नकली दाढ़ी खरीदी और लगाकर उसी मेज पर बैठने लगा. एक दोपहर कुछ दोस्‍त आये. एक बोला-भई गर्मी बहुत है टोपी उतार दो. सबने टोपियां उतार दी. कुछ देर के बाद दूसरा बोला- तौबा-तौबा कितनी गर्मी है. शेरवानियां उतार दो. सबने शेरवानियां उतार दी. फिर तीसरा बोला- पसीने में सराबोर हो रहे हैं. दाढ़ी पहन रखी है, उतारो इसे. इतनी गर्मी है हमसे देखा नहीं जाता. अब उतार भी दीजिये दाढी. मैंने दाढ़ी उतार दी.’’

‘‘बिल्‍कुल पुराने ख्‍याल हैं. भला दाढ़ी से समाज को क्‍या दिलचस्‍पी हो सकती है.’’ तल्‍ख साहब मुंह बनाकर बोले.

अब बड्‌डी की बारी थी. उसने जेब से कागज निकाले, ‘‘मैंने अपने कॉलिज की कुछ घटनायें लिखी हैं- घर से कॉलिज आते समय हमें बस में सफर करना पड़ता था. कोई आध घंटे का सफर होता. मेरा एक दोस्‍त कोने में एक किताब लेकर बैठ जाता और बड़े गौर से पढने लगता. पढ़ते-पढ़ते कहकहा मारकर हंसता. फिर एकदम गम्‍भीर हो जाता. कुछ देर के बाद जोरों से रोने लगता. मुसाफिर उसकी तरफ देखने लगते, वह चुपचाप नजरें झुकाए पन्‍ने पलटने लगता. फिर रोना शुरू कर देता. हर एक मुसाफिर की यही कोशिश होती कि किसी तरह उसे इस अजीबोगरीब किताब का नाम मालूम हो जाये. लेकिन वह उसे छुपाये रखता. सफर के खात्‍मे पर बड़े इत्‍मीनान से किताब सबके सामने खोल देता. किताब के सारे पन्‍ने खाली होते. फिर हम कुछ दोस्‍तों ने एक बैंच खरीदी और कॉलिज के सामने वाले बगीचे में रख दी. जब कोई पुलिस वाला नजर आता हम बैंच उठाकर चोरों की तरह भागते. वह हमारा पीछा करता. बड़ी मुसीबतों के बाद जब हमें पकड़ता तेा हम उसे बैंच की रसीद दिखा देते.’’

‘‘यह भी कुछ नहीं. इसमें न नयापन है न उपयोगिता. ऐसी चीजें पढ़ने वालों को सिवाय एक वक्‍ती मनोरंजन के और क्‍या हासिल हो सकता है. मुझे प्रगतिवादी साहित्‍य चाहिए.’’

‘‘एक प्‍लॉट मेरे जेहन में है.’’ शैतान बोले. ‘‘इसमें चार पात्र हैं. एक किसान, एक पूंजीपति, एक वेश्‍या और एक मरियल-सा नौजवान. जिसे दुनिया-भर की बीमारियां हैं. ये लोग एक खुफिया संस्‍था बनाते हैं फिर उनका मनोविश्‍लेषण होता है. उनके उपचेतन और अवचेतन नष्‍ट हो जाते हैं. दो पात्र तो आत्‍महत्‍या कर लेते हैं, दो एक-दूसरे को मार देते हैं. दो पात्र तो आत्‍महत्‍या कर लेते हैं, दो एक-दूसरे को मार देते हैं. और- ’’

तल्‍ख साहब बोले- ‘‘बस-बस मुझे ऐसी कहानियां चाहिए. इसे तुम अगले अंक के लिए लिखना. पहले अंक में तो सिर्फ मेरी ही चीजें होंगी.’’

मैंने बड्‌डी से सलाह करके एक प्रोग्राम बनाया. तल्‍ख साहब से हमने प्रार्थना की कि वे मेहरबानी करके हर इतवार को हमें अपने यहां रहने की इजाजत दे दें. वे हैरान जरूर हुए लेकिन उन्‍होंने इजाजत दे दी. उनके यहां रहकर हमें मालूम हुआ कि वे हर दो घंटे बाद एक गर्म और मीठी चीज पीते हैं और यह उनकी खुशफहमी है कि वे उसे चाय कहते हैं. दोपहर को भारी-भरकम लंच खाते हैं. सारा दिन ऐनक लगाये एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठे रहते हैं. उनका फर्नीचर खस्‍ता हालत में है. कपड़ों पर प्रेस नहीं होती. दीवारों का रंग उड़ चुका है. बल्‍व फ्‍यूज हो चूके हैं. केवल एक बल्‍व है, वह भी टिमटिमाता हुआ. हर समय उन्‍हें अपने कुत्ते का वहम रहता है जिसे वे कभी दूर से टिकटिकी लगाकर देखते हैं. कभी करीब आकर उसकी आंखों में आंखें डालकर घूरते हैं. उन्‍हें यह विश्‍वास हो चुका है कि कुत्ता उन्‍हें नहीं पहचानता... अजनबी समझता है और कुत्ता सारा दिन सिर झुकाए संसार की निस्‍सारता पर विचार करता है. न उसे खाने को कुछ मिलता है न उसे कभी बाहर निकाला जाता है. कभी तल्‍ख साहब का जिगर खराब हो जाता है, कभी दिल बैठने लगता है, कभी गुर्दे सत्‍याग्रह कर देते हैं. उनके पास डॉक्‍टरी की कुछ किताबें हैं जिनको वे बाकायदा पढ़ते रहते हैं. जो नयी बीमारी पढ़ते हैं वह फौरन उन्‍हें हो जाती है.

बड्‌डी बोला- ‘‘अगर इस आदमी को हम ठीक कर सके तो यह बहुत बड़ी समाज-सेवा होगी. अगर बहुत जल्‍दी कुछ न किया गया तो यह पि़त्रका के द्वारा अपनी बेजारी दूर-दूर तक फैला देगा.’’

सबसे पहले हमने कुत्ते को लिया. हमने तल्‍ख साहब से कहा कि ‘‘कुत्ते की नजर कमजोर है. इसे ऐनक की जरूरत है.’’ तल्‍ख साहब मुस्‍कराने लगे. ‘‘अगर उसकी प्‍यार भरी, प्‍यारी-प्‍यारी वफादार आंखों पर ऐनक लग गयी तो उसकी खूबसूरती में फर्क आ जायेगा.’’

‘‘हम फर्क नहीं आने देंगे. हम उसे बगैर फ्रेम की ऐनक लगाएंगे. जिससे वह और भी खूबसूरत मालूम होगा.’’

‘‘मगर इसकी नजर किस तरह टेस्‍ट होगी. अक्षर तो पढ़ नहीं सकता.’’

‘‘हम उसकी एक आंख बंद करके उसे कई फासलों से हडि्‌डयां दिखायेंगे. जहां तक उसे हड्‌डी नजर आयेगी वह दौड़ेगा. इस फासले को नापकर उसकी दूसरी आंख देखी जाएगी. फिर किसी डॉक्‍टर से ऐनक का नंबर ले आयेंगे.’’

‘‘मगर इसके चेहरे पर ऐनक की जगह है कहां? उसकी नाक बैठी हुई है और कान इतने कोमल हैं कि ऐनक कहां ठहर सकेगी?’’

‘‘आप बेफिक्र रहिए.’’ हमने झूठ-मूठ नजर टेस्‍ट की, फजूल-सी ऐनक बनाकर कुत्ते के मुंह पर लगा दी. ऐनक की कमानियां कानों के गिर्द लपेटकर कस दी गईं. तल्‍ख साहब कुत्ते की तरफ से बिल्‍कुल मुतमइन हो गये. डॉक्‍टरी की सारी किताबें कबाड़ी के यहां पहुंचा दीं. दीवारों पर सफेदी करवा दी गयी. कहीं-कहीं चमकीला वालपेपर भी लगाया गया. फर्नीचर पालिश करवाया गया. खूब तेज बल्‍ब जगह-जगह लगाये गये. एक सेकिंड हैंड पे्रस खरीदकर लाये. नौकर को पे्रस करना सिखाया और उसे ताकीद की गई कि सुबह-शाम दोनों समय कपड़ों पर पे्रस करे और होटल से चाय लाने की बजाय हल्‍की-सी चाय बनाकर तल्‍ख साहब को दिया करे. तल्‍ख साहब की ऐनकें बिल्‍कुल ऐसी रहती थीं. नौकर को एक कोमल-सा कपड़ा दिया गया कि शीशे साफ कर दिया करे. तल्‍ख साहब की हालत पहले से बेहतर हो गयी. लेकिन उनका हाजमा ठीक न हुआ. बड्‌डी बोला- ‘‘दवाइयां खरीदेंगे.’’

लेकिन मैंने सलाह दी कि उनका लंच बन्‍द करवा दिया जाये.

हम उनके पास गये और बड़े दर्द-भरे लहजे में बोले- ‘‘हम समाज के नाम पर एक प्रार्थना करने आये हैं. हमें विश्‍वास है कि हमें निराश न लौटाया जायेगा. समाज, जनता, सोसाइटी इनका तकाजा है कि आप लंच छोड़ दीजिए.’’

‘‘आखिर क्‍यों?’’

‘‘क्‍या आप नहीं जानते कि हिन्‍दुस्‍तान में ऐसे इन्‍सान भी हैं जिन्‍हें एक वक्‍त भी खाना नहीं मिलता. और आप हैं कि तीन बार खाना खाते हैं और सारा दिन चाय पीते रहते हैं.’’

‘‘मगर मेरे लंच छोड़ देने से क्‍या फर्क पड़ेगा?’’

‘‘आप जानते हैं कि छोटे-छोटे इरादों से बड़ी-बड़ी तब्‍दीलियां हो जाती हैं. आप लंच छोड़ेंगे. हम दोनों ने पहले ही छोड़ रखा है. देखा-देखी और लोग भी छोड़ने लगेंगे. संभव है सारा हिंदुस्‍तान लंच खाना छोड़ दे और धीरे-धीरे सारा एशिया और फिर किसी दिन सारी दुनिया.’’ तल्‍ख साहब मान गये.

शैतान का विचार था कि पहले अंक के साथ तमन्‍ना खानम का नाम अमर हो जायेगा लेकिन तमन्‍ना की बेरुखी बढ़ती जा रही थी. शैतान हर रोज उनसे मिलने जाते. एक और लड़की के बारे में सलाह लेते, उसे बताते कि आज इस लड़की ने यह कहा है. मुझे बताओ कि मैं उसे क्‍या कहूं. अगले दिन जाकर बताते हैं कि मेरे यह कहने पर उस लड़की ने यूं कहा, मैंने यह कहा तो वह यह बोली. अब बताओ मैं उसे क्‍या कहूं. कुछ दिन तो यूं होता रहा. फिर एक दिन तमन्‍ना ने साफ-साफ कह दिया, ‘‘लड़की-वड़की कोई भी नहीं है. मुझसे मिलने का बहाना है.’’

शैतान बोले- ‘‘तुम्‍हारा ख्‍याल ठीक है. लेकिन मैं करूं तो क्‍या करूं. पहले तो तुम मिलती नहीं. जब कभी मिलती हो तो तीसरे पहर को मिलती हो. भला गर्मियों में तीसरे पहर को मैं तुम्‍हें क्‍योंकर अपने ऊपर आशिक करवा सकता हूं. काश कि हम ईरान में मिलते. सर्द के दरख्‍तों और कालीनों के अम्‍बार में, मर्तबानों पर बैठकर चाय पीते. आह! ईरान! मेरे एक बूढ़े दोस्‍त की नानी अम्‍मा ईरान की हैं. मुझे उन नानी अम्‍मा से...’’

‘‘नानी कहना काफी है. इसमें अम्‍मा लगने की क्‍या जरूरत है. और फिर आप यह ईरान का जिक्र क्‍यों ले बैठते हैं. सच पूछिये तो ईरान मुझे खुद पसन्‍द नहीं है.’’

‘‘मगर ईरान तो...’’

‘‘बेहतर होगा अगर आप ईरान का जिक्र बिल्‍कुल न किया करें.’’

‘‘मगर पहले तो आपकी मेहरबानियां काफी हैं. आपने जो कुछ किया है उसके लिए शुक्रिया.’’

‘‘मगर मैंने तो अभी कुछ भी नहीं किया. मुझे मालूम न था कि ईरानी ऐसे होते हैं.’’

‘‘खुदा के लिए आप आइन्‍दा मुझसे किसी किस्‍म की बातचीत मत कीजिए.’’

‘‘बहुत बेहतर,’’ शैतान अपनी टोपी उठाकर बोले- ‘‘जो कुछ हुआ इसका मुझे अफसोस है, लेकिन जो कुछ न हो सका उसका तो बहुत ही ज्‍यादा अफसोस है.’’

उसी शाम कैफे में चाय पीते समय बड्‌डी के लिए फोन किया. हम कान लगाकर सुनने लगे. बड्‌डी किसी महिला से गुफ्‍तगू कर रहा था- ‘‘जी हां मैं हूं. जी नहीं. यहां न तल्‍ख साहब हैं न रऔफी मियां. आप फरमाइये. ओफ्‌ आप क्‍या फरमा रही हैं? आपको रऔफी से नफरत है. मैं उन्‍हें बता दूंगा. नहीं माफ फरमाइयेगा. मुझसे यह नहीं हो सकेगा. तल्‍ख साहब आपको मिले थे. वे हर रोज आपसे मिलते हैं. क्‍या फरमाया आपको वे अच्‍छे लगते हैं. आप एक-दूसरे से मुहब्‍बत करते हैं. जी नहीं वह खूबसूरत हर्गिज नहीं. आपने उन्‍हें गौर से नहीं देखा. आप तल्‍ख साहब से शादी करने वाली हैं. बड़ी खुशी की बात है. अच्‍छा तमन्‍ना खानम आदाब अर्ज.’’

इसी किस्‍म के फोन दो-तीन बार और आये.

इसके बाद बहुत कुछ हुआ. पत्रिका की बात तो डांवाडोल हो गई. शैतान और तल्‍ख साहब की दोस्‍ती खत्‍म हो गई. जो साहब पत्रिका के लिए पैसे देने वाले थे वे गायब हो गये. तमन्‍ना का जिक्र कम होते-होते बिल्‍कुल खत्‍म हो गया. तल्‍ख साहब के कमरों में रोशनी रहने लगी. उनका कुत्ता उन्‍हें पहचानने लगा. उनकी सेहत बेहतर होती गई. बड्‌डी का तबादला हो गया. शैतान का कॉलेज खुल गया. मैंने भी तबादला करवा लिया. हम सब तमन्‍ना को भूल गये, लड़की को भी और पत्रिका को भी.

हम होटल के बड़े कमरे में बैठे थे. रात के खाने के बाद कॉफी का दौर चल रहा था. बड़े शोर से कहकहे की आवाज आई. मुड़कर देखा कि एक मोटा-ताजा हृष्‍ट-पुष्‍ट आदमी हंस रहा था. यूं ही वहम-सा हुआ. हमने बैरे को भेजा कि इन साहब से पूछना कि इनका शुभ नाम तल्‍ख साहब तो नहीं. बैरे ने आकर कहा कि तल्‍ख साहब उनका पुराना नाम था. अब उन्‍हें मगरूर साहब कहा जाता है.

मगरूर साहब ने हमें देखा और हंसते हुए आये और हमसे लिपट-लिपटकर मिले. उन्‍होंने बताया कि आजकल वे बिजनेस करते हैं और काफी अमीर हो गये हैं. हमने उनके लेखन-कार्य के बारे में पूछा. बोले- ‘‘मैं तुम दोनों का एहसान उम्र-भर नहीं भूलूंगा. जब से मैंने लंच छोड़ा है मेरा हाजमा ठीक हो गया है. अब लिखने की शिकायत भी जाती रही है. अब खुदा के फजल से बिल्‍कुल तंदुरस्‍त हूं. मुझे कोई बीमारी नहीं रही. न जिगर खराब है न दिल का दौरा पड़ता है और हां वह मासिक तमन्‍ना का साइनबोर्ड मेरे यहां पड़ा है. अपना पता बता दो तो मैं भिजवा दूं.’’

‘‘यह तुमने क्‍या याद दिला दिया.’’ शैतान बोले- ‘‘मुझे तमन्‍ना याद आ गयी. क्‍योंकि उसने मेरे साथ इतना अच्‍छा बर्ताव नहीं किया फिर भी मैंने उसे माफ कर दिया था. ईरानी वाकई हमसे बिल्‍कुल अलग होते हैं, उनकी आदतें, उनके खयाल, उनकी बातें सब अलग होती हैं. मुझे ईरान बहुत अच्‍छा लगता है. मैं बता दूं लेकिन मेरा दिल ईरान में है. ईरान जो मेरी तमन्‍ना का

वतन है.

‘‘लेकिन वह लड़की ईरानी तो नहीं थी.’’ तल्‍ख साहब चौंके.

‘‘सचमुच!’’

‘‘हां सचमुच. वह ऐसे ही ईरानी थी जैसे तुम रूसी या मैं चीनी.’’

‘‘तो फिर उसके पूर्वज ईरान से आए होंगे?’’

‘‘उसके पूर्वज आये जरूर थे लेकिन ईरान से नहीं, बल्‍कि शेखूपुरा से आये थे. वैसे ये लोग बिजनेस के सिलसिले में कभी-कभी ईरान...’’

‘‘आपको शुरू से इस बात का ज्ञान था?’’ शैतान चमककर बोले.

‘‘हां!’’

‘‘तो आपने मुझे पहले क्‍यों नहीं बताया और फिर जब जानते थे कि मैं उसकी तरफ आकर्षित हूं तो आपको आशिक होने की क्‍या जरूरत थी. खैर, मैंने आपको माफ किया.’’

‘‘कौन आशिक और किसका आशिक?’’ तल्‍ख साहब बोले. ‘‘मैं तमन्‍ना पर कभी आशिक नहीं हुआ. अगर दुनिया में तूफान आ जाता और तूफान के बाद जमीन पर सिर्फ मैं और तमन्‍ना रह जाते तब भी मैं उस पर आशिक न होता. मगर यह आशिक होने की उड़ाई किसने थी?’’

‘‘बात असल में यह है.’’ बड्‌डी शर्माते हुए बोला, ‘‘वह जो टेलीफोन पर बातें हुआ करती थीं वे सब बनावटी थीं. तमन्‍ना ने मुझे कभी फोन नहीं किया. मैं उसे रऔफी की बुराइयां भी करता रहा हूं लेकिन....’’

‘‘तो बड्‌डी तुम भी ऐसे ही निकले. खैर जाओ मैंने तुम्‍हें भी माफ किया. मैंने सबको माफ किया. लेकिन वह लड़की खूब थी. क्‍या मजाल जो उससे ऐसी-वैसी बात तो कोई कर ले. बड़े सख्‍त नियम थे उसके. एक बार ऐसे ही मेरी उंगलियां उसकी उंगलियों से छू गईं. इस कदर खफा हुई कि बस...’’

‘‘लेकिन उस रात तुम!’’ शैतान कड़ककर बोले- ‘‘बताओ क्‍या हुआ था उस रात?’’

‘‘बात यह है रऔफी.’’ मैंने सिर झुकाकर बोला, ‘‘ईरानियों के रस्‍म-रिवाज तो तुम जानते हो. रुखसत होते समय चूमने का रिवाज.’’

‘‘वह ईरानी नहीं थी.’’ शैतान चिल्‍लाये. ‘‘खैर, मैंने तुम्‍हें भी माफ किया. खुदाया तेरा लाख शुक्र है कि तूने मुझे ऐसे वफादार और जानिसार दोस्‍त दिये हैं, मैं इनको माफ करता हूं. ये नासमझ हैं. बेसहारा हैं. ये नहीं जानते कि ये क्‍या कर रहे हैं. मैंने इनको माफ किया. तू भी माफ करना.’’

शैतान उठ खड़े हुए और टहलने लगे. टहलते-टहलते बालकनी में जा खड़े हुए. चौदहवीं का चांद बिल्‍कुल उनके सिर के पीछे था. वे अपना पुराना शेर बार-बार पढ़ रहे थे. उनके चेहरे पर अजब शान थी. उनके चेहरे पर वह रोशनी थी जो सिर्फ किसी पहुंचे हुए के चेहरे पर आया करती है. अस्‍थायी तौर पर या थोड़े अर्से के लिए उनके सिर के गिर्द चांद रोशनी का गोला बनाए हुए था. लेकिन हम यही सोच रहे थे कि उनका चेहरा मुस्‍कराहट के बगैर बेहतर मालूम होता है.

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