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फहीम अहमद की बाल कविताएँ

 

डॉ फहीम अहमद
 
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   1 खुशबू की सौगात

बैठ हवा के झूले आई
खुशबू की सौगात

बरसा पानी रिमझिम रिमझिम
सोंधी मिट्टी महके
पाकर खुशबू अमराई की
तोता टें टें चहके

खोल रही खुशबू की पुड़िया
फूलों की हर पांत

फैल गई घर भर में खुशबू
मां ने सेंकी रोटी
अम्मा अम्मा मुझको दे दो
बोली मुनिया छोटी

अम्मा बोली आओ मुनिया
हम तुम खाएं साथ

टाफी बिस्कुट लौंग पुदीना
या हो अमिया कच्ची
सबकी खुशबू होती प्यारी
लगती मन को अच्छी

पर माँ की ममता सी- मीठी
खुशबू की क्या बात


 
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2     मैं गुस्सा हूँ

जाओ जी ,मैं गुस्सा हूँ
 
भैया कहते कान न खाओ
उधम मचाना ठीक नहीं
मम्मी कहती बाहर खेलो
करो शरारत और कहीं

मुझे भगाते सभी यहाँ से
मैं भी घर का हिस्सा हूँ

यह मत खाओ ,उसे मत छुओ
हरदम मुझ पर रोक लगे
रूठूँ न तो और क्या करूँ
मेरा मन अब दूर भगे

अपने ही घर में बेगाना
एक निराला किस्सा हूँ

मुनिया रोती शोर मचाती
पाती शीशी ढूध भरी
लेकिन जब मैं करूँ शरारत
मुझको फौरन डांट पड़ी

मुनिया को ही प्यार करें सब
पर मैं भी तो उस- सा हूँ

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3  गरमी की छुट्टी में

नानी जी के गांव चलेंगे
हम गरमी की छुट्टी में

जाने कब से हिरनों जैसा
मन भर रहा कुलाँचें
हरियाले आंगन में जाकर
मोरों जैसा नाचें

दौड़ लगाएं पगडंडी पर
खेलें कूदें मिट्टी में

चढ़ें भैंस पर राजा जैसे
घूमें बाग- बगीचे
बकरी भेड़ गधे की सेना
आए पीछे -पीछे

लगा ठहाके कर लूँ सारी
खुशियाँ अपनी मुट्ठी में

दोना भर- भर के गुड़ खाएँ
पिएँ दही व मट्ठा
तोड़- तोड़ कर आम रसीले
कर लें खूब इकठ्ठा

बड़ा मज़ा है खूब रसीली
इमली खट्टी- मिट्ठी में

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4  नन्ही मुनिया छुई -मुई

नन्ही मुनिया छुई-मुई

दिन भर तितली जैसी उड़ती
घर- आंगन चौबारे में
मुंह बिचकाती, खूब हंसाती
करती बात इशारे में

मम्मी अगर ज़रा भी डांटें
रोने लगती उई- उई

रोज़ सवेरे चार जलेबी
बड़े चाव से खाती है
चीनी वाला दूध गटागट
दो गिलास पी जाती है

दूध जलेबी न हो समझो
आज मुसीबत खड़ी हुई

दादी के कंधे चढ़ जाती
कहती चल रे चल घोड़े
टिकटिक दौड़ लगा दे जल्दी
वरना मारूंगी कोड़े

दादी उसको पुचकारें तब
चल नटखट शैतान ,मुई

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5   मैं जो होता जादूगर

जंतर -मंतर पढता हरदम
मैं जो होता जादूगर

फूंक मारता तो पापाजी
झट बन जाते बच्चे
चुपके से पेड़ों पे चढ़ते
आम तोड़ते कच्चे

फिर पापा -सा बनकर उनको
डांट पिलाता मैं जी भर

छड़ी घुमाता, अंधा कालू
पाता रोशन आँखें
उसके मन में भी उग आतीं
उम्मीदों की पाँखें

उसकी आँखों में बस जाता
रंग-बिरंगा जग सुन्दर

दीदी की सब रूठा रूठी
मैं गायब कर देता
भैया की तीखी बातों में
शरबत मैं भर देता

मम्मी का मिर्ची -सा गुस्सा
कर देता मैं छू- मंतर

 

6    बरगद

इतना हुआ पुराना बरगद
नाना का भी नाना बरगद

तोता चील गिलहरी कोयल
सबका बना ठिकाना बरगद

लम्बी दाढ़ी रोज़ हिलाता
है जाना- पहचाना बरगद

दाढ़ी पकड़ झूलते बंदर
कभी बुरा न माना बरगद

राहगीर को देता छाया
पंखा झले सुहाना ,बरगद

आंधी- पानी तूफानों से
सीख चुका टकराना बरगद

डटा रहा चट्टानों जैसा
हार कभी न माना बरगद

लाख थपेड़े सहकर भी है
जान गया मुस्काना बरगद

 

7    बच्चों का अख़बार

अपने हाथों से लिख- लिख कर
बच्चों ने अख़बार निकाला

खबर छपी, राजू के पापा
ने उसको बेमतलब डांटा
शन्नो की चाची ने उसको
गुस्से में कल मारा चांटा

टूट गया काका का चश्मा
रवि ने जब फुटबाल उछाला

मुन्नू पाता दूध मलाई
मुनिया को बस मिलती टाफी
रसगुल्लों की चोरी करके
सोनू जी मांगी माफ़ी

पिंजड़ा खुला देख उड़ भागा
माँ ने था जो तोता पाला

टीचर से पाई शाबासी
रामू के छोटे भैया ने
तीन बाल्टी दूध दिया है
कल्लू की भूरी गैया ने

चार पदक पाकर राहुल ने
कर डाला है काम निराला

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8  मैं क्या चाहूँ

कोई भी मुझसे न पूछे
कि आखिर मै क्या चाहूँ

मेरे इस नन्हे- से मन में
छिपी हुई हैं बातें खूब
मन करता खरगोश बनूँ मैं
चरता फिरूं मुलायम दूब

पंख लगाकर उड़ने वाला
सुन्दर- सा सपना चाहूँ

पापा कहते हैं वकील बन
तुम्ही बढा सकते हो शान
मम्मी कहें डॉक्टर बनकर
रख लेना तुम मेरा मान

कभी किसी ने यह न पूछा
कि मैं क्या बनना चाहूं

होमवर्क जब करने बैठूं
दीदी बतला देतीं काम
मचल उठे मन दौडूँ -खेलूं
जैसे ही आती है शाम

रोक लगाते हैं सब, पर मै
नदिया -सा बहना चाहूँ

 

9 चन्दा गया कहाँ

अभी अभी हंस रहा वहां था
अम्मा चन्दा गया कहाँ

अम्मा बोलीं आसमान में
फिरते हैं बादल बनजारे
काले बादल ने भालू बन
छिपा लिया तेरा चंदा रे

चन्दा की थाली में रक्खा
भालू चाटे शहद वहाँ

भागा झल्लर- मल्लर भालू
हंसती आई परी अनूठी
गीत सुना कर दूर कर रही
चन्दा की सब रूठा रूठी

उसकी गोदी में छिप सोया
देखो है क्या खूब समां

देख डाइनासोर अचानक
भागी परी, चाँद घबराया
तेज़ हवा ने एक फूंक में
उसको फ़ौरन मार भगाया

चन्दा बोला ,हवा बहन रुक
आ हम खेलें साथ यहाँ

 

10  खा ली मैंने मिर्च ,उई माँ !

खा ली मैंने मिर्च ,उई माँ !

टॉफी केक जलेबी छोड़ी
डलिया में थी मिर्च निगोड़ी
सोचा लाओ चख लूँ थोड़ी

मुझसे तीखी भूल हुई ,माँ

चखी मिर्च मैं लगा उछलने
जीभ लगी उफ़ मेरी जलने
आंसू फ़ौरन लगे निकलने

कान गरम हैं नाक चुई ,माँ

तोता खाए टें -टें बोले
नहीं मिठाई को मुंह खोले
बिना मिर्च पिंजड़े में डोले

कैसी उसकी जीभ मुई ,माँ

गई नहीं अब तक कड़वाहट
अम्मा दे दो मुझे अमावट
कान पकड़ता हूँ मै झटपट

फिर जो मैंने मिर्च छुई,माँ

 

11  मेरी अलमारी

बहुत बड़ी मेरी अलमारी
चीजें इसमें रखीं सारी

सबसे ऊपर प्यारा बस्ता
और बगल में है गुलदस्ता

पास उसी के फोटो मेरा
रसगुल्ले सा दिखता चेहरा

नीचे गाड़ी चाबी वाली
गुड्डा रोज़ बजाए ताली

रखी हंसने वाली गुड़िया
खट मिट्ठे चूरन की पुड़िया

उसके नीचे कई किताबें
कुछ हैं बिलकुल नई किताबें

बैट- बॉल है सब से नीचे
लैपटॉप है उसके पीछे

तुम्हें दिखा दीं चीज़ें सारी
बंद करता हूँ अब अलमारी

 

12  बड़ा मज़ा आए

हर दिन रहे यूँ
शरारत का मौसम
बड़ा मज़ा आए
 
खिलते गुलाबों -सी
चेहरों पे लाली
तोतले धमाल मचे 
पीट रहे ताली

शहद घुली बोली ज्यों
चिड़ियों की सरगम
बड़ा मज़ा आए

मुनमुन ने गुड़िया की
खींची जो चोटी
गुड़िया ने काट ली
मीठी चिकोटी

ख़ुशी उन मुखड़ों से
बरस रही झम- झम
बड़ा मज़ा आए

ऐनक लगा मुन्नू
आज बना बूढ़ा
मम्मी सा बांध लिया
मुन्नी ने जूडा

नटखट उमंगों का
लहराए परचम
बड़ा मज़ा आए

 

13  बातों की रेल

बच्चों के बीच चली
बातों की रेल

एक- एक डिब्बे में
बातों की पुड़िया
होंठों से निकल ज्यों
फुदक रही चिड़िया

चिड़िया उड़ाने का
शुरू हुआ खेल

कोयल की बोली- सी
मीठी है बानी
थोड़ी- सी बुद्धू है
थोड़ी सयानी

मिसरी का चाशनी से
हो गया मेल

लगती है बागों में
भौरों की गुनगुन
बातों के मोती को
जीभ चुगे चुनचुन

बातों की क्लास में
कोई न फेल

 

14 टीवी है या जादू मंतर

मम्मी मुझको बतलाओ यह
टीवी है या जादू मंतर

किस जादूगर ने टीवी में
कर दी सारी दुनिया कैद
सभी नियम से आएं -जाएँ
अपने कामों में मुस्तैद

नहीं पकड़ में आते हैं ये
इनमें हम में क्या है अंतर

इस छोटे डिब्बे में कैसे
भला समाया एक जहान
दांतों तले दबाए उंगली
सोच -सोच मैं हूँ हैरान

नदिया झरने और खेत संग
कैसे इसमें घुसा समंदर

गिनते- गिनते हार गया मै
गिनने में हो जाती भूल
कितने इसमें हाथी, बन्दर,
तितली ,चिड़िया ,भौंरे फूल

कभी नहीं मै गिन पाऊँगा
कितनी चीजें इसके अन्दर

 

15  मिस्टर बड़बड़

इनसे मिलिए अजब अनूठे
यह हैं मिस्टर बड़बड़

चलती है ज़बान इनकी ज्यों
चलती कोई चक्की
बिन बोले रह ही न पाते
लगते पूरे झक्की

गरजा करते शाम सवेरे
जैसे बदल गड़गड़

बातें करते हैं चिल्ला कर
शब्द शब्द हैं नटखट
बातों की पतंग पहुंचाते
दूर गगन तक झटपट

भोंपू जैसे बजते रहते
करें कान में गड़बड़

नमक लगाएं मिर्च लगाएं
बात परोसें पूरी
पिंड छुड़ाना होता मुश्किल
सुनना है मजबूरी

जो भी इनकी बात सुने न
उससे जाते लड़लड़

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16 मैना उडी फुर्र

मैना लाई दही बड़ा
हाथी खाए खड़ा खड़ा

खाकर फूला उसका पेट
सीधा गया खाट पर लेट

खाट बोली चुर्र
मैना उड़ी फुर्र

 

17 गधे के सींग

बकरी लोमड़ और हिरन से
गधा मारता डींग
पहले कभी हुआ करते थे
मेरे सर पे सींग

बकरी बोली, बात गधे जी
भूल गए तुम खास
साथ सींग के तब रहती थी
अक्ल तुम्हारे पास

 

18  गैस की टंकी

देख भैंस को सरपट जाते
बोला उससे मोर
लाद पीठ पर भारी टंकी
जाती हो किस ओर

पोंछ पसीना माथे का तब
बोली उससे भैंस
चूल्हा फूंक हुई मैं काली
अब लाई हूँ गैस

 

19 मगरमच्छ के आंसू

मगरमच्छ क्यों रोते हो तुम
बोला एक सियार
मम्मी ने मारा या खाई
पापा से फटकार

मगरमच्छ बोला ,सलाद मै
बना रहा था आज
आँखों में आंसू भर आए
ज्यों ही काटा प्याज़

 

20    ढाए हवा कहर

बोली चील अरी सुन कोयल
कहाँ रहेंगे हम
हुई हवा ज़हरीली जब से
घुटता मेरा दम

सांस नहीं लेते बनता है
ढाए हवा कहर
चलो भाग कर जान बचाएं
छोड़ें जल्द शहर

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21   चिड़ियों की आवाज़

चिड़ियों ने आवाज़ उठाई
कहाँ बनाएं नीड़
रोज़ पेड़ कटते जाते हैं
बढती जाती भीड़

रोक कुल्हाड़ी बात हमारी
सुनो भाइयों खास
पेड़ न होंगे तो फिर कैसे
लेंगे हम -तुम सांस

22 मेरा भरो टिफिन

बहुत खा चुका टोस्ट पकौड़े
आलू भरे पराठे
ऊब गया जी मेरा अब तो
इनको खाते-खाते

खीर मलाई ,तिल का लड्डू
हलवा मेवे वाला
दूध -जलेबी,छेना-रबड़ी
का है स्वाद निराला

मूंगफली की पपड़ी खाऊँ
शहद लगाकर रोटी
खूब मलाई वाला मट्ठा
दाल कचौड़ी मोटी

नहीं चाहिए मुझको बर्गर
पिज़्ज़ा,चाऊमिन
मुंहमांगी चीजों से मम्मी
मेरा भरो टिफिन

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डॉ फहीम अहमद

संक्षिप्त परिचय

नाम -डॉ फहीम अहमद

पिता-स्वर्गीय श्री शमीम अहमद

जन्मतिथि-23जून 1977

जन्म स्थान-रुदौली (फैज़ाबाद)

शिक्षा-एम०ए०(हिंदी)बीएड,पीएच०डी०

कृतियाँ-हाथी की बारात(बाल काव्य संग्रह),अनोखी दावत (बाल कथा संग्रह)

लेखन विधाएं-कविता,कहानी,नाटक,पहेलियाँ आदि।

प्रकाशन- देश भर की पत्र पत्रिकाओं में 600 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित।12 से अधिक राष्ट्रीय स्तर के संकलनों में रचनाएँ सम्मिलित। 100 से अधिक शोध आलेख,समीक्षाओं ,पुस्तकों आदि मे रचनाओं का ससम्मान उद्धरण/उल्लेख।

पुरस्कार/सम्मान-उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य का सूर पुरस्कार,बालकन जी बारी इंटर नेशनल ,दिल्ली से राष्ट्रीय युवा कवि अवार्ड ,नागरी बालसाहित्य संस्थान बलिया,भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर,सरिता लोकभारती संस्थान सुल्तानपुर,बाल प्रहरी अल्मोड़ा सहित कई संस्थाओं से बाल साहित्य सेवा के लिए सम्मानित।

सम्प्रति-असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ,हिंदी विभाग,मुमताज पी.जी .कालेज ,लखनऊ

वर्तमान पता-485/301,जेलर्स बिल्डिंग,बब्बू वाली गली,लकड़ मंडी ,डालीगंज,लखनऊ 226020

स्थायी पता-22/79,मखदूमजादा,रुदौली,फैज़ाबाद 225411

 

ई मेल-hadi.faheem@yahoo.com

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