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मर क्यों नहीं जाते ये पापी, धूर्त, मक्कार, नाकारा लोग...

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

हर तरफ लोग किसी न किसी से परेशान हैं। कोई किसी वाजिब कारण से परेशान है, कोई बिना वजह किसी से परेशान है। और बहुत सारे लोगों की जमात ऎसी है कि जो औरों को परेशान-हैरान करने के लिए ही पैदा हुई है और जब तब इनकी जिन्दगी रहती है तब तक यही काम करते रहते है।

दुनिया के अधिकांश लोग किसी न किसी वजह से औरों से परेशान हैं। बहुत सारे अपने ही कारणों से अपने आप से परेशान हैं। कोई साथ वालों से परेशान हैं कोई आस-पड़ोस वालों से। कुछ खुद की परेशानी मिटाने के लिए औरों को परेशान करते रहने की सनक से ग्रस्त हैं।

मतलब यही है कि हर तरफ परेशान होने और करने तथा परेशान कराने वाले लोगों की भरमार है। लोग अपने कुकर्मों की वजह से परेशान हैं। बहुत सारे बैठे-बैठे खाना-पीना और आरामतलबी होकर जीना चाहते हैं और उनकी वजह से काम न हो पाने के संकट की वजह से दूसरे लोग त्रस्त हैं, कुछ अपने स्वार्थों और जायज-नाजायज कामों को करने-कराने की आपाधापी के कारण दुःखी हैं।

कुछ को लगता है कि उनके दुःखों और पीड़ाओं को कोई समझ नहीं पा रहा है इस कारण से वे दुःखी हैं।  बहुत सारे ऎसे हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि ये लोग न किसी की पीड़ा को समझते हैं, न औरों के दुःखों के बारे में कोई संवेदनशील रवैया रखते हैं और न सामाजिक सरोकारों के बारे में कुछ सोचते-करते हैं। सिर्फ अपने ही अपने बारे में सोचते हैं और स्वार्थों से ऊपर कभी नहीं उठ पाते हैं। खूब सारे भौंदू , खुदगर्ज और चापलूस हैं जिनकी वजह से लोग परेशान हैं।

यह दुनिया विचित्र लोगों से भरी पड़ी है। कोई खाने-पीने वालों, बेवजह कलह करने वालों, शंकाओं और आशंकाओं, ईर्ष्या-द्वेष और प्रतिशोध का मारा है, कोई सब कुछ मुफ्त का मिल जाने की मस्ती मार रहा है और अधिकांश लोग पेट की आग बुझाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हुए अपने जीवन को बचाये हुए हैं।

इन सभी प्रकार के लोगों के बीच सभी श्रेणियों में ऎसे लोगों की भारी भीड़ देखने को मिल जाएगी जिनके पास बाप-दादाओं की अकूत धन-संपदा है,  रईसजादे हैं अथवा हराम की कमाई के सारे प्रबन्ध हैं। इस किस्म के लोगों को न कोई मेहनत करनी पड़ती है, न पढ़ाई-लिखाई करने या हुनर पाने की।

दुनिया में ये ही वे लोग हैं जिनके पास फालतू का बहुत सारा समय है जिसे काटने के लिए इन्हें ऎसे-ऎसे कामों का सहारा लेना पड़ता है जो सज्जनों के लिए वर्ज्य् और हीन माने गए हैं।  और वास्तव में देखा जाए तो सब तरफ इसी किस्म के खूब सारे लोग हैं जो समाज की शांति, शालीनता, गांभीर्य और तरक्की के प्रवाह में बाधक बने हुए हैं।

किसी भी क्षेत्र में हम जाएं हर कहीं ऎसे लोग मिल ही जाते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये किसी का काम नहीं करते, काम को टालते रहते हैं, बिना प्रसन्न हुए कुछ भी करना नहीं चाहते, हरामखोरी की आदत पड़ी र्हु है, इनकी भूख और प्यास का जो आकलन कर लेता है उसी के लिए आशाओं के द्वार खुलते हैं, दूसरों के पास इन तिलस्मी दरवाजों को खोलने का कोई पासवर्ड नहीं है।

अक्सर सुना जाता है कि लोग उन कामों को करने में भी आनाकानी या टालमटोल करते रहते हैं जो काम उन्हीं को करने हैं। बहुत से लोग ऎसे भी होते हैं जो आज का काम आज और अभी करने में विश्वास रखते हैं लेकिन दूसरी किस्म को भी क्यों भूलें, जो आज का काम आज, कल या परसों नहीं, और कभी ...या कभी नहीं करने में विश्वास रखते हैं।

सामाजिक सरोकारों और राष्ट्रीय चरित्र के प्रति समर्पण और राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने की कितनी ही बातें हम कर लें, भारतमाता की जय के गगनभेदी उद्घोष लगाकर अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की कुटिलताएं करते रहें, जब तक हमारी नीयत पाक-साफ नहीं होगी, सब कुछ बेमानी है।

दुनिया में खूब सारे नुगरों की भरमार है जो औरों को परेशान करने को ही अपने जीवन का लक्ष्य और चरम आनंद मानते हैं। देश का कोई कोना ऎसा नहीं है जहां ऎसे लोग न हों।  इस किस्म के लोगों की बहुतायत ने राष्ट्रीय गौरव, गरिमा और अस्मिता को जितनी क्षति पहुंचायी है उतनी पिछले युगों में किसी विदेशी आक्रान्ताओं ने भी नहीं पहुंचायी होगी।

इन्हीं नुगरों के कारण दुनिया त्रस्त है और यही कारण है कि कोई इनके यशस्वी होने या दीर्घायु पाने की कभी कामना नहीं करता बल्कि कहीं अकेले में ईश्वर की मूर्ति के सामने या अपने परिचितों और क्षेत्रवासियों के बीच जब भी मौका आता है इन लोगों के बारे में दुःखी लोगों के मुँह से अनायास यही निकल आता है कि ऎसे लोग मर क्यों नहीं जाते, ये मर जाएं तो जमाना सुधर जाए, भगवान इन नालायकों को यहाँ से उठा क्यों नहीं लेता, इन नरपिशाचों को भगवान ने हमारे लिए ही क्यों इस धरा पर पैदा किया होगा ... आदि-आदि।

हममें से बहुत सारे लोगों को यह मलाल रहता है कि इन पापियों, धूर्तों, मक्कारों और स्वार्थियों पर भगवान का दण्ड क्यों नहीं चलता। हर क्षेत्र में हम ऎसे लोगों को अंगुलियों पर गिन सकते हैं जिनके बारे में लोग साफ-साफ कहते सुने जाते हैं कि इन लोगों को मर जाना चाहिए, ये किसी काम के नहीं हैं बल्कि जितना जियेंगे उतना समाज में गंदगी ही फैलाएंगे, सज्जनों को परेशान ही करते रहेंगे।

यह गंभीर आत्मचिन्तन का विषय है। कोई हमारी दीर्घायु के लिए प्रार्थना करने की बजाय हमारी मौत आने के लिए प्रार्थनाएं क्यों करता है। फिर हर तरफ से परेशान लोग हमारी स्वाभाविक मौत की कामना नहीं करते बल्कि यहाँ तक कह जाते हैं -साला कुत्ते की मौत मरेगा,  सड़-सड़ कर मरेगा,  कीड़े पडेंगे,  एक्सीडेंट में खत्म हो जाएगा या ऎसी जगह मरेगा जहां पीने का पानी तक नसीब नहीं होगा, इसका वंश खत्म हो जाएगा आदि-आदि।

आखिर लोग हमसे इतने परेशान क्यों हैं कि हमारी मौत की कामना करने लगे हैं। दूसरों की बातें न करें, अपनी ही बात करें तो कहीं न कहीं हम पर भी यही सच एकदम सटीक बैठ सकता है।  धीर-गंभीर होकर चिन्तन करें कि हमारे तो कर्म कहीं ऎसे हीन और कामटालू नहीं हैं जिनकी वजह से और लोग परेशान होकर हमारी अकाल मौत की कामना कर रहे हों। कभी निन्यानवें के फेर से ऊपर उठकर एकान्त में बैठकर अपने आप से यह सवाल पूछें। अपनी आत्मा सब कुछ साफ-साफ और सच-सच कह ही देगी। आत्मा की आवाज कभी झूठी नहीं होती।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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