आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

हास्य-व्यंग्य - निर्दोष होने की सजा

हास्य व्यंग्य निर्दोष होने की सजा

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

                  यम लोक का यातना गृह लगभग खाली हो चला था। यमदूतों को बिना काम के बैठे बिठाये पालना पड़ रहा था। ब्रह्माजी को पता चला , तब चित्रगुप्त को तलब किया। कमरतोड़ महंगाई में बिना काम के इतने लोगों को पालने से मना किया।  वे जानना चाहते थे कि क्या धरती पापमुक्त हो चली है ?  तब चित्रगुप्त ने बताया कि धरती पर सारे सुखों के इंतजाम कर देने के बाद भी अधिकांश जन इन सुखों का लाभ  न लेकर सादा जीवन जीने लगे हैं , उच्च विचारों को अपनाने लगे हैं। पापात्माओं की संख्या बहुत कम हो चली है। ब्रह्मा जी विस्तार से जानना चाहते थे। उन जीवों को देखना चाहते थे।

                  तब चित्रगुप्त ने  उन जीवों को तलब किया। एक एक के बारे में बतलाते हुये कहा - अब इन्हें ही लीजिये।  यह पंचायत स्तर का नेता था। किसी भी अपात्र को राशनकार्ड बनवाने नहीं देता था। किसी सम्पन्न को शासन के कल्याणकारी योजनाओं का मुफ्त लाभ नहीं लेने देता था। किसी अमीर को जमीन आबंटित करने में अड़ंगा  लगाता था । इसके कारण गांव के कई लोगों का बहुत नुकसान हुआ ।  यह प्रदेश स्तर का नेता था। इसने अपनी ही पार्टी के नेताओं के कच्चे चिट्ठे को जनता में उजागर कर दिया। इसके कारण इसकी पार्टी की सरकार गिर गई , देश का बहुत नुकसान हुआ। यह राष्ट्रीय नेता था , जिसे जनता ने ईमानदार होने के कारण जितवा दिया था। इसी गुण के कारण मंत्री भी बन गया , किंतु  इसने  न ही तोप खाया , न चारा खाया , न स्पेक्ट्रम खाया , न कोयला खाया । और तो और , जिनने खाने की कोशिश की , उनके नाम उजागर कर दिया  , बड़ी बदनामी हुई सरकार की। जाने कितने मौके आये , जब इन्हें मुफ्त का माल उड़ाने का सौभाग्य मिला , परंतु  , न खुद खाया , न किसी को खाने दिया। इतने बरस नेतागिरी करने के बाद भी , अंत समय में भीख मांगना पड़ा सड़कों पर । ऐसे लोगों को क्या सजा देंगे हम । हमारी पूरी टीम सकते में है इन लोगों के कारण।  

               ये लोग कौन हैं ? ये लोग भी इसी तरह के हैं। पिछले जन्म में इन्हें कर्मचारी बनाया था हमने। मूर्खों ने , किसी को नहीं लूटा। यह एक पटवारी था। कभी किसी की जमीन को किसी के नाम नहीं किया। कभी नक्शा खसरा के लिये पैसे नहीं मांगा। यह गुरूजी था। बेवकूफ  , रोज पढ़ाता था। मध्याह्न भोजन उतने का ही बनवाता जितने बच्चे उपस्थित रहते। हरेक बच्चे को , इंसान बनाना चाहता था। किसी को पास करने या किसी के नम्बर बढ़ाने के लिये कोई भी गलत काम नहीं करता था। इसे देखिये , यह इंजीनियर था। इसके बनाये मकान धरती पर आज भी पूरी तरह से सुरक्षित है , जबकि इसकी दूसरी पारी शुरू होने वाली है। जो सड़क बनवाया था , आज भी चमक रहा है। बांधों में दरारें नहीं। इसे देखो , यह कलेक्टर था। कभी किसी के काम को अटकाया नहीं। हर समय सेवा के लिये उपस्थित रहता था। जनता को सहजता से उपलब्ध हो जाते थे , इसके कारण क्षेत्र के नेतागण परेशान रहते थे। इसे देखिये , यह डाक्टर था। न किसी की आंख फोड़ी , न किसी का गर्भाशय बेचा , न किडनी। बिना पैसे  के इलाज करने वाले इस शख्स की मौत , पैसे के अभाव में  , इलाज नहीं करवा सकने के कारण हुई। यह पुलिस में था। न किसी को अवैध शराब बनाने दिया , न बेचने। इसकी सक्रियता के कारण क्षेत्र के सारे अवैध धंधे बंद हो गये  , जिसके कारण कई लोगों के भूखे मरने की नौबत आ गयी। 

               और ये लोग ? ये व्यापारी , उद्योगपति लोग थे। जो व्यापारी थे , वे मिलावट से परहेज करते थे। सामान के तौल में कांटा  नहीं मारते थे। स्वयं को फायदा हो , इस पर सोचते ही नहीं थे। इन्हें देखिये ,  ये उद्योगपति थे। इन लोगों ने लाइसेंस के लिये गलत तरीके का कभी इस्तेमाल नहीं किया। कभी टैक्स चोरी नहीं की। अपने कर्मचारियों को अधिक से अधिक फायदा पहुंचाया। पर , इनका अंत भी बहुत बुरा रहा।

               ये लोग न्याय  देने वाले लोग थे। कभी दोषी को बख्शा नहीं , किसी ईमानदार को सजा नहीं होने दी।  किसी के  लालच , बहकावे या दबाव में कभी अपना निर्णय नहीं बदला। हमेशा सत्य  के साथ खड़े रहे।  मरने के पूर्व कई कई अभियोग चलते रहे इन पर। इसलिये , मरते वक्त बिल्कुल अकेले थे ये। इनके जनाजे तक में शामिल होने कोई नहीं पहुंचा था।

               ये लोग लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से जुड़े लोग हैं। हर गलतियों को निर्भीकता से उजागर करना , अच्छे काम की सराहना करना इनका काम था। किसी सरकारी दबाव , या पूंजीपतियों के या किसी बाहुबली के आगे हार नहीं मानी। नतीजतन , अंत समय कब आकर चले गया , पता तक नहीं चला। जिंदगी भर नाम कमाने वाले ये शख्स , गुमनामी के अंधेरे में खो गये।

               अब बताइये ब्रह्मा जी।  इन लोगों को क्या सजा दें ? ऐसे में , यातना गृह का खाली रहना स्वाभाविक है।  ब्रह्मा जी आप ही उपाय बताओ। ब्रह्मा जी ने , खाली बैठे , इन यमदूतों को पृथ्वी पर भेज देने का फरमान जारी कर दिया। विरोध कोई कर नहीं सकता था। फिर भी यमराज ने टूटते बिखरते परिवार को बचाने की अपील करने की सोची। ब्रह्मा का आदेश कभी रद्द नहीं हो सकता। तब यमराज ने एक उपाय सुझाया कि  , सुख पा सकने वाले सारे ओहदे यमदूतों को ही मिले। तथास्तु  कहकर ब्रह्मा जी अंतर्ध्यान हो गये।

                अपनों से बिछुड़ने का गम किसे नहीं सताता। फिर किसी और  के कारण ऐसा दुख  हो , तो और भी अधिक बुरा लगता है। यमराज का गुस्सा जायज भी था। उन्होंने यमदूतों की  बिदाई पर कहा कि – तुम लोगों को धरती पर भी कोई कष्ट नहीं होगा , मैंने सारी व्यवस्था  कर दी है। सारे सुखों के पद पर तुम ही तुम रहोगे और ये मनुष्य , जिसके कारण तुम्हें यमलोक से पृथ्वी लोक जाना पड़ रहा है वे अब से , आम जनता होंगे।  ब्रह्मा  ने ,  इन मनुष्यों को सुख पाने के इतने मौके दिये , पर इन मूर्खों को समझ नहीं आया। मुझे लगता है इनके भाग से सुख पूरी तरह छीन लेना चाहिये। जब ये धरती पर जायें , तब इनका सामना – भूख , गरीबी , बेकारी , लाचारी , तंगहाली से हो ।  रात दिन - शोषण  , अत्याचार , अन्याय , के  शिकार होते रहें। जिसे मौका मिले , वही इनके बदन को नोंच ले। इनके खून का एक एक बूंद भी ,  पसीने की तरह तुम्हारे ही काम आये। जब ये ठीक से जी नहीं पायेंगे , तब जरूर वहां से निकलने के लिये , हाथ पैर मारेंगे। हो सकता है उसी चक्कर में जाने अनजाने में गलतियां कर जायें। तब सजा पाने जरूर पायेंगे यहां। तब इन्हें सजा देने , धीरे - धीरे तुम सबकी वापसी करवा दूंगा।  वैसे भी  इन्हें ,  निर्दोष होने की सबसे बड़ी  सजा दे ही रहे हैं – आम जनता बनवाकर। 

                 इसके बाद भी यमराज का गुस्सा कम नहीं हुआ। तप करके ब्रह्माजी से एक और वरदान ले लिया। यह वरदान था - धरती पर मानव की संख्या धीरे धीरे कम हो जाये।  मानव के पेट से मानव नहीं , बल्कि दानव , पशु या यमदूत पैदा हों । तब से तरसता है आदमी  , आदमी पैदा करने के लिये । वास्तव  में , निर्दोष रहने की बड़ी सजा चुका रहा है  , आज तक आदमी। 

                                                   हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

टिप्पणियाँ

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.