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पूरन सरमा का व्यंग्य - आओ शोध करें

व्यंग्य
आओ शोध करें
पूरन सरमा


मुझे एक ऐसे रिसर्च स्कोलर की आवश्यकता है, जो मेरे साहित्य पर कहराई से शोध करके अपने लिए पी. एच. डी. प्राप्त करना चाहता हो। विश्वास रखिये मैं शोधकत्र्ता का खून नहीं पिऊँगा, अपितु उसे रोज चाय और बिस्कुट खिलाऊँगा। जहाँ तक गाइड का प्रश्न है वह भी मैं सुलभ करवा दूँगा। गाइड तो बस नाम मात्र का होगा, बाकी सारा शोध मेरी ही देखरेख में होगा। गाइड से घबराने की आावश्यकता नहीं, वह तो मेरा ही दोस्त है, इसलिए उसकी तरफ से कोई अड़चन नहीं होगी, उससे मेरी बात हो गई है, वह तो केवल दिखावे का गाइड होगा, वर्ना शोध पर नजर तो मेरी और शोधकत्र्ता की ही होगी। मैं पुनः खुलासा कर दूँ कि न तो मैं रिसर्च स्कोलर से सब्जी मँगाऊँगा, न ही आटे का पीपा चक्की पर डलवाऊँगा, न ही अपने बच्चों को पढ़वाऊँगा या स्कूल भिजवाऊँगा और न ही बाजार के दूसरे कार्य कराऊँगा। भला स्कोलर्स से भी यह कार्य करवाये जात हैं। दूसरे प्राध्यापक ऐसा करते रहे होंगं, परन्तु मैं विद्वानों का अपमान अपना अपमान समझता हूँ।

मेरा तो बस इतना-सा स्वार्थ है कि मैंने इतना साहित्य लिख मारा है कि मेरी खुद की समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर मैंने लिख क्या दिया है ? बस थोड़ा एक समझदार आदमी मिल जावे तो साहित्य का मूल्यांकन हो जावे। इससे भी डरने की आवश्यकता नहीं है कि मेरे ऊपर किये काम पर विश्वविद्यालय पी. एच. डी. देगा या नहीं, अजी देगा क्यों नहीं, यदि शोध होगा तो। वैसे शोध में देखा क्या जाता है। बस केवल तीन-सौ से चार-सौ पृष्ठ अच्छी जिल्द में सफाई के साथ बँधवा दीजिए। बस यही सफलता है। वरना इतने पृष्ठ चाटने की हिम्मत किसकी है। कौन पढ़ता है। एक्जामिनर तीन महीने थीसिस को घर में अपने स्टेडी रूप की टेबिल पर पटके रखता है, जिस दिन विश्वविद्यालय का टेलीग्राम आता है, उस दिन फटाफट रिपोर्ट लिखकर पोस्ट कर देता है। वैसे एक्जामिनर भी मेरे जानकार हैं। उन्हें जब वर्क पूरा हो जायेगा तो पत्र लिखकर या व्यक्तिगत रूप से मिलकर आपके रिसर्च वर्क पर अच्छी रिपोर्ट लिखवा दूँगा।

रिसर्च स्कालर यदि महिला हो तो सोने में सुहागा। सामान्य रूप से देखा गया है ंकि महिलायें शोध डूबकर करती हैं तथा अच्छे परिणाम सामने आते हैं। यदि शोधकत्र्ता महिला हो तो ‘गाइड’ भी निर्देशन सही रूप में रूचि लेकर देता है। क्योंकि महिलाओं में पुरूषों की तुलना में ‘टेलेंट’ का प्रतिशत अधिक होता है और गाइड बस ‘टेलेंट’ का कायल होता है। दो प्रतिभाएँ जब एक साथ हो जाती हैं शोध का मजा ही कुछ और होता है। इसलिए यदि रिसर्च का सही उपयोग तथा आनन्द लेना है तो स्कोलर फीमेल होनी चाहिए।


मेरे थीसिस वर्क में प्रेक्टिकल का चक्कर नहीं है। सारा कार्य थ्यौरी का है। इसलिए घबराने की आवश्यकता नहीं है। यह तो सर्वविदित है कि प्रेक्टिकल में कार्य कितना कठिन होता है, थ्यौरी की तुलना में, इसलिए ‘लैब’ में घण्टों बैठने की भी आवश्यकता नहीं होगी। केवल रोज घण्टे-दो-घण्टे मिल गये तो काम चल जायेगा। साहित्य पर शोध कोई ज्यादा मुश्किल भी नहीं होती। थोड़ा आदमी संवेदनशील तथा रसों का जानने वाला हो तो फिर रिसर्च एक अच्छा-खासा मनोरंजन मात्र है।

वैसे भी रिसर्च में कौनसा ‘आॅरिजिनल वर्क’ होता है। संदर्भ पुस्तकों के अंश होते हैं मुख्य रूप से। इस तरह की तमाम पुस्तकें मैंने जुटाकर रख ली हैं। बस उन्हें पढ़ कर तनिक नोट्स छाँटने हैं तथा फिर सीधे ही टाइप में देनी है। टाइप अच्छा होना चाहिए। जितना अच्छा टाइप होगा-उतनी ही अच्छी रिपोर्ट मिलेगी एक्जामिनर से। शोधकत्र्ता को यह गारंटी देता हूँ कि यदि उसे मेरे साहित्य पर उपाधि मिल गई तो फिर वह अपना जाॅब भी पक्का समझे। मैं अनेक ऐसे प्रोफेसर्स को जानता हूँ, जिन्होंने अपने स्टूडेंट्स और खासकर छात्राओं के लिए खून-पसीना एक करके नौकरी वहीं दिलवा दी है। सम्बन्धों की मधुरता अभी तक बनी हुई है उनके बीच। इस मामले में मैं भी उनसे कम नहीं हूँ। मुझे खुशी होगी कि मेरे काम से उन्हें जाॅब मिला।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी इसके लिए स्कोलरशिप देगा। आपका खर्चा निकलता रहेगा। मैं उन ‘गाइडों’ में से नहीं हूँ, जो इस राशि में से भी अपने लिए धरा लूँ। मुझे तो यही क्या कम है कि शोधकत्र्ता मेरे ऊपर रिसर्च करेगा। इसलिए शोध-छात्रवृत्ति उसे पूरी मिलेगी। यू. जी. सी. में भी वैसे तो ऐसे बघेरे बैठे हैं जो हाथ ही नहीं धरने देते। वे भी सब शोध करके गये हैं, इसलिए पहले सारा अन्वेषण करने के बाद ही ‘सेंक्शन’ करते हैं। परन्तु थोड़ा-बहुत एप्रोच लगायेंगे तो काम हो जायेगा। आखिर वे भी तो हमारे बीच से ही हैं। उनके पास करोड़ों रूपये हैं, उन्हें रूपये बाँटने की फिक्र है। इसलिए कई बार तो बिना एप्रोच के ही केवल कागजी घोड़े से ही काम चल जाता है। बस जरा प्रोजेक्ट बढि़या-सा बनवा लेंगे। प्रोजेक्ट ड्राफ्ट करने वाले भी तैयार हैं। उन्हें उनकी फीस चुकाई और सारा प्रोजेक्ट तैयार हो जायेगा। ये तो धंधे की बातें हैं। घोड़ा घास से यारी करे तो खाये क्या ?

मेरे साहित्य की आऊट लाइन ढ़ाई ठप्पे की है, जो तत्त्व दूसरों के साहित्य में मौजूद हैं, वही मेरे में हैं। वही विसंगतियाँ, मानवीय कुण्ठायें व हीनतायें, दिनों दिन फैलती और बढ़ती संवेदनशून्यता, मानवीय हताशा-निराशा, सुख-दुःख और मानव मूल्यों की वैचारिकता है। कोई खास मेहनतवाला कार्य नहीं है। दो साहित्य की थीसिस पढ़ लेने, देख लेने के बाद तो यह कार्य बिल्कुल सहज हो जायेगा।


दो साल तक शोध छात्रवृत्ति लेवो और दो महीने की अवधि में वर्क पूरा कर   लो, बस इतना-सा मसला है मेरे साहित्य में। फकत चार खण्डकाव्य, एक महाकाव्य तथा तीन कविता संग्रह हैं। इनका सार मानवीय धरातल पर युग की कसौटी पर कस दीजिये।    जो तत्त्व निकल कर आवे उसे थीसिस में लिख मारिये। देखता हूँ कौन माई का लाल आपको पी. एच. डी. लेने से रोक सकता है। ऐसी बात नहीं है कि आप ही रिसर्च करने निकले हों। निरे लोग कर चुके हैं रिसर्च और मर भी गये। परन्तु हुआ क्या ? सिर्फ       वे विश्वविद्यालयों में पड़ी दीमकों को समर्पित होती रहीं, धूल जमती रही। देश को क्या  मिला ? सिर्फ शून्य। वही सिलसिला आपको बतौर औपचारिकता के पूरा करना है। किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है।

इसलिए हे रिसर्च स्कोलरो ! आओ और मेरे साहित्य पर रिसर्च करो। मैं पूरी सेवा करूँगा। मैं शपथ लेता हूँ यदि मैंने आपसे अपना निजी कार्य करवाया तो। मेरी पत्नी    की जरूर थोड़ी आदत खराब है-उसे कोई दिखा कि वह फट-से उसे चाय बना लाने को अथवा डेयरी से दूध की थैली लाने का कार्य सौंप देती है। इसके लिए हम यह कर सकते हैं कि हम अपना शोध स्थल विश्वविद्यालय लाइब्रेरी को ही बनायें। वैसे भी यदि रिसर्च स्कोलर छात्रा हुई तो वह फूटी आँख भी नहीं चाहेगी। तब भी रिसर्च उसें दूसरे स्थानों  पर ही करनी पड़ेगी। इसलिए शोधकत्र्ताओं ! ऐसा अवसर नहीं मिलेगा, जिसमें आधे से ज्यादा कार्य तो मैं खुद निपटाने को तैयार हूँ। इसलिए आओ रिसर्च करें और कुछ ऐसी सर्च करें, जो हमारे लिए उपयोगी हो। ‘हम दो हमारे दो’ का रास्ता प्रशस्त करता हो। शोध से ही नये रास्ते निकलते हैं तथा विकास के तमाम सूत्र इसी में छिपे हुए हैं।

(पूरन सरमा)
124/61-62, अग्रवाल फार्म,
मानसरोवर, जयपुर-302 020,
मोबाइल-9828024500
 
 
 
 
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