गुरुवार, 3 सितंबर 2015

हास्य - व्यंग्य - गणेश जी की चिन्ता

वीरेन्द्र 'सरल'

ज्यों-ज्यों गणेश पक्ष नजदीक आता जा रहा था त्यों-त्यों गणेश जी की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। दिल की धड़कने तेज होने लगी थी। पेशानी पर बल पड़ने लगे थे। मूषक महराज के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ने लगी थी। दोनों एक-दूसरे को असहाय नजरों से देख रहे थे। मूषक के चेहरे का भाव ऐसा था मानों कह रहा हो आपको जाना है तो जाइये प्रभू, मैं तो अब वहाँ जाने से रहा। गणेश जी मूषक के मनोभाव के कारण को भली भांति समझ रहे थे पर कुछ असली भक्तों की भावनाओं का सम्मान करना भी जरूरी था। अन्ततः चुप्पी तोड़ते हुए गणेश जी ने कहा-'' देखो मूषक जी, मैं आपके डर के कारणों को समझ रहा हूँ, पिछले कुछ वर्षों के जो कटु अनुभव आपको हुए हैं वह मैंने महसूस नहीं किया है, ऐसी बात नहीं हैं। जिन परेशानियों से आप गुजरते हैं उनसे कहीं ज्यादा परेशानियों का सामना मुझे करना पड़ता है। लोग कलाकृति के नाम पर हमारी आकृति को किस तरह से विकृत कर देते हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है। आज मिलावट का युग है, फिर भी नकली भक्तों की भीड़ में अभी कुछ असली भक्त शेष है चाहे वे कंकड़ में दाल के समान ही क्यों न हो। हमें उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए, समझ गये। मूषक महाराज को एक बार में गणेश जी की बातें सुनाई नहीं दी क्योंकि पिछले कुछ वर्षों के कानफोड़ू संगीत के कारण उनकी श्रवण शक्ति काफी कमजोर हो गई थी। गणेश जी को अपनी बात दो-तीन बार दोहरानी पड़ी। तब मूषक को कुछ समझ में आया और वह सहमति में अपना सिर हिलाया। दोनों यहाँ आने से पहले वैसे ही तैयारी करने लगे जैसे सत्र शुरू होने से पहले सत्ता पक्ष वाले विपक्षियों के सवालों का सामना करने के लिए करते है।

अन्ततः वह दिन आ ही गया जब भगवान गणपति को यहां विराजना था। विशाल मंच बन गया था। भारी पंडाल लग गया था। रंगीन झालरों से मंच सुसज्जित होने लगा था। भक्त बड़े भक्ति भाव से मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करके श्रद्धापूर्वक उन्हें विराजित कर रहे थे। भगवान के नाम पर चन्दा मांगने वाले चाँदी काटना शुरू कर दिये थे। भक्ति भाव के नाम पर कानफोड़ू संगीत का सिलसिला शुरू हो गया था। डी. जे. साऊंड पर धमाचौकड़ी मचाने वालों की भीड़ बढ़ने लगी थी। देर रात तक शोर-शराबा होने लगा था। लोग अनुष्ठान के नाम पर वायु और ध्वनि प्रदूषण बढ़ाने में जितना सहयोग कर सकते थे उससे कहीं ज्यादा बढ़-चढ़कर सहयोग कर रहे थे। मूर्ति की चमक-दमक बढ़ाने और आकर्षक बनाने के लिए किये गये खतरनाक रसायनिक पेन्टों के प्रयोग के कारण प्रभू को बड़ी बेचैनी लग रही थी। एक-एक दिन को काटना कई युगों को काटने के समान लग रहा था। प्रभु याद कर रहे थे उस महामानव को जिसने एक पवित्र उद्देश्य के लिए इस धार्मिक अनुष्ठान को उत्सव का रूप दिया था। जिस उत्सव ने जन-गण-मन में राष्ट्रीयता के भाव का संचार किया था और देश के लिए मर मिटने का जज्बा जगाया था। वह हुड़दंग बाजों के हाथ में आकर कितना विकृत हो गया है। ऊपर से असंतुष्ट लोगों की मनोकामनाओं की इतनी लम्बी लिस्ट जिसे पूरा करना कठिन ही नहीं असंभव ही है। उद्देश्य पवित्र हो तो एक बार कोशिश भी की जा सकती है पर अपराधी, जुंआरी, सटोरिये और दागी, भ्रष्ट्राचारी तक अपनी मनोकामनाओं का मांग पत्र थमाकर चले जाते है और मांग पूरी होने की अपेक्षा करते है। अब इनको कैसे समझाया जाये? उत्सव के नाम पर बीच सड़क में भीड़ बढ़ाकर रास्ता जाम कर मरीजों को भी अस्पताल तक न पहुँचने देने वाले लोग, देर रात तक तेज संगीत बजाकर लोगों की नींद हराम कर देने वाले लोग भी यदि धार्मिकता का तमगा धारण करके खुद को धार्मिक समझ कर इतरा रहे हैं तो फिर मनुष्यता की निष्काम सेवा करने वाले, दीन-दुखियों की सहायता करने वाले तथा वंचित, दलित, और शोषितों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले क्या है? मजेदार बात तो यह भी है कि जब धार्मिक लोगों का इतना विशाल समूह है तो फिर मिलावटी समान बेचने वाले कौन हैं, गरीबों का हक छीनकर उनका शोषण कौन कर रहा है। सरकारी खजाने पर डाका डालने वाले कौन है? गरीबों का खून चूसने वाले कौन है। भ्रष्ट्राचार में आकंठ डूबकर अपनी इक्कीस पीढ़ी के लिए धन इकट्ठा करने वाले लोग कौन है? इनकी हरकतों को देखकर बु़द्धि के देवता होने के बाद भी मैं नहीं समझ पाता कि ये धार्मिकों के उत्सव है या हुड़दंगियों का हूजूम?

आज गणेश पक्ष का चौथा दिन था। दोपहर का समय था। लगातार जागरण के कारण गणेश जी की आँखें बोझिल होने लगी थी। उत्सवधर्मी हुड़दंगियों की हरकतें उन्हें काफी परेशानी में डाल रखी थी। प्रभु की माथे पर चिन्ता की लकीरें स्पष्ट दिख रही थी। वे लगातार चिन्तन कर रहे थे और अन्त में चिन्ता की सागर में डूबने उतरने लगे थे। अभी माहौल थोड़ा शांत था। पूजा करने वाले भक्त गण सुबह पूजा-अर्चना के अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री करके खर्राटे भर रहे थे, कुछ लोग पान-गुटखा के चक्कर में वहाँ से खिसक गये थे। गणेश जी का चिन्तन अभी भी जारी था। उस एकान्त के समय में भी एक आदमी आया और आरती के थाल पर एकदम से पाँच सौ रूपये का नोट चढ़ाकर, प्रसाद की थाल से स्वयं ही प्रसाद निकालने लगा। पहले तो प्रभु को लगा कि कोई बड़ा भक्त है पर नोट को ध्यान से देखने पर वे क्रोधित हो गये और उस आदमी के गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ा। वह आदमी धड़ाम से जमीन पर गिर गया। वह डर के मारे इधर-उधर देखने लगा पर आस-पास कोई था ही नहीं। वह कमर सहलाते हुए उठा और गणेश जी की ओर देखने लगा। मूर्ति से आवाज आने लगी, ''मूर्ख! तुम्हारा यह चढ़ावा, चढ़ावा नहीं मेरे लिए गाली है। तुम्हारा यह पाँच सौ रूपये का नोट तो जाली है। मुझे धोखा देता है। पाँच सौ रूपये का नकली नोट चढाकर असली प्रसाद लेना चाहता है। मैं देश का कोई नासमझ मतदाता नहीं हूँ जो तुम्हारे नकली वादे के झांसे में आकर अपना कीमती वोट का प्रसाद दे दूँ।'' वह आदमी सकपका गया फिर भी हाथ जोड़कर माफी माँगते हुए बोला-'' प्रभु मैं तो आपके चरणों का अनुरागी हूँ, आपके दरबार में मेरी बस एक ही अर्जी है।'' वह कुछ और बोल पाता उससे पहले ही मूर्ति से आवाज आई -''तू रागी नहीं दागी है। तेरी अर्जी भी फर्जी है। जब तू मुझे धोखा दे रहा है तो साधारण मनुष्य को कितना बेवकूफ बनाता होगा, इसे सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। मेरी नजरों से दूर हट जा वरना.....।''

वह आदमी हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए बोला-''प्रभू! एक जाली नोट के कारण आप मुझे इतनी बड़ी सजा दे रहे हैं। पता नहीं बाजार में कितने जाली नोट है। इसे पहचानना बैंक के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। इसमें लिप्त कारोबारी मौज उड़ा रहे हैं। नोटों की तो छोड़ो, पता नहीं यहाँ आपके कितने भक्त भी फर्जी है जो आपके नाम पर लोगों को लूट रहे हैं। कितने फर्जी प्रमाणपत्र धारी लोग सरकारी नौकरी पर कब्जा जमाये बैठ गये है और सरकारी खजाने को चूना लगा रहे हैं तथा योग्य उम्मीदवारों के हक पर कब्जा जमाकर व्यवस्था को अंगूठा दिखा रहे है। कहाँ तक बतायें प्रभू आपको, यहाँ तो मंत्री तक की डिग्रियां फर्जी साबित होने लगी है। भगवन! मैं तो आपसे यही अर्जी कर रहा था कि आप व्यवस्था को भी वह आँख दीजिये ताकि फर्जी लोगों की पहचान हो सके और योग्य आदमी को उसका वाजिब हक मिल सके।''

उस आदमी की बात सुनकर गणेश जी मूर्ति से आवाज आई-'' बेटा! जब आदमी की आँखों में स्वार्थ का चश्मा चढ़ जाता है तब उसका विवेक शून्य हो जाता है। आँखें सही-गलत, योग्य-अयोग्य, असली-नकली में भेद करने में अक्षम हो जाती है। एक महत्त्वपूर्ण बात और कि ढोंग जब धर्म का आवरण लपेटकर आदमी के सिर पर सवार होता है तो उसे धर्मान्ध बना देता है। आज धर्म के नाम पर यही सब हो रहा है। जबकि धर्म का मर्म तो परोपकार ही है। 'परहित सरिस धरम नहीं भाई' धर्म की इससे बढ़कर दूसरी कोई परिभाषा हो नहीं सकती। यदि तू अपने आपको मेरा सच्चा भक्त समझता है तो जा और मेरे इस संदेश को सबका बताकर धर्म के आदर्श को स्थापित कर, समझ गया।''

वह आदमी कुछ और सुनने की लालसा में बहुत समय तक गणेश जी की मूर्ति को अपलक निहारता रहा पर अब मूर्ति से आवाज आना बंद हो गई थी

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वीरेन्द्र 'सरल'

बोड़रा(मगरलोड़)

पोष्ट-भोथीडीह

व्हाया-मगरलोड़

जिला-धमतरी(छत्तीसगढ़)

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