शनिवार, 26 सितंबर 2015

अपयश देता है पापियों का साथ

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

पापी कोई सा क्यों न हो,  दिवंगत हो, पुराना हो, वर्तमान हो या भावी पापी होने के सफर पर हो। सारे के सारे दुःखों का महा कारण यही हैं। पाप हमेशा अंधकार में पनपता है और पापी हमेशा अपने साथ अंधकार ले कर चलता है।

उसका पूरा का पूरा आभामण्डल नकारात्मकता के मकड़जालों से घिरा रहता है  और यही कारण है कि पाप से परिपूर्ण लोग जहाँ कहीं होंगे उनके साथ पापों का पूरा का पूरा संसार चलता रहता है। इसका अनुभव कोई भी सच्चा और अच्छा इंसान अच्छी तरह कर सकता है, बशर्तें की वह तन-मन और मस्तिष्क से साफ-सुथरा और शुचिता भरा हो।

पाप ढोते हुए चलने वाले लोग किसी भी बाड़े या गलियारे में मौजूद रहते हैं उस वक्त कोई सा अच्छा विचार और कार्य होना संभव नहीं है। इस स्थिति में हर प्रकार के काम भी आगे से आगे टलते जाते हैं और उत्तरोत्तर इन गलियारों और बाड़ों मेें काम का बोझ इतना अधिक हो जाता है ये बाड़े तनावों के केन्द्र के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं, वहाँ कोई श्रेष्ठ, उल्लेखनीय और श्रेयदायी काम भी हो नहीं सकता।

आजकल बहुत सारे स्थानों में इसी प्रकार की स्थितियाँ हैं। पापियों की वजह से उस स्थान विशेष का वास्तु खराब हो जाता है और वहाँ से सकारात्मक शक्तियाँ पलायन कर जाती हैं, भूत-प्रेत, आसुरी शक्तियाँ, दुर्भाग्य एवं बीमारियां पैदा करने वाले सूक्ष्म कीटों का घर होकर रह जाता है जहाँ हमेशा अंधकार और विषादों का साया पसरा रहता है।

पापियों और उनके अंधकार भरे आभामण्डल की वजह से बहुत सारे स्थान ऎसे अभिशप्त हो जाते हैं कि उन स्थलों को बदनामी से जाना जाने लगता है जहाँ काम-काज और सुकून की बजाय विषाद, दुःख और पीड़ाओं का प्रवाह हमेशा बना रहने  लगता है।

जो लोग स्वयं नकारात्मकता से परिपूर्ण, अंधकार के पहरुए और पापवृत्ति के प्रतीक, पोषक और विस्तारक होते हैं उन लोगों के लिए ये बहुआयामी अंधकार भरे डेरे सुकून देने वाले होते हैं क्योंकि इन्हीं बाड़ों में उन्हें सब प्रकार के षड़यंत्रों, हथकण्डों, अनाचारों, पापों और नकारात्मक प्रवृत्तियों के अंकुरण से लेकर प्रचार-प्रसार और स्थापना करने तक के सारे तत्वों की भरपूर मौजूदगी प्राप्त होती है।

इन्हीं बाड़ों और संगी पापियों के साथ रहते हुए उनके मलीन मन, प्रदूषित दिमाग और सडान्ध भरे विकृतियुक्त शरीर के भीतर की सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का नियमित और सम्पूर्ण पुनर्भरण स्वतः हो जाता है जो उन्हें हमेशा परिपुष्ट बनाए रखता है।

श्रेष्ठ कर्म करने वाले इंसानों को अपनी बराबरी के लोग मिलने या ढूँढ़ने में दिक्कतें आ सकती हैं मगर नापाक लोगों का गठबंधन और मेल-मिलाप हमेशा बिना किसी मेहनत के हो जाया करता है क्योंकि सडांध की गंध सर्वाधिक तीव्र होती है और हर किसी को बहुत दूर से ही महसूस होने लगती है तथा इसकी दुर्गन्ध इसके हटने के बाद भी बहुत समय तक बनी रहती है।

जबकि सुगंध का कोई भी प्रयास किया जाए इसका विपरीत स्वभाव होता है। सुगंध को बरकरार रखे रखने के लिए निरन्तर और नियमित प्रयास जरूरी हैं तभी दैवत्व और दिव्यत्व का अहसास पाया जा सकता है।

हमारा  दुर्भाग्य कहें या युगीन दुष्प्रभाव, आजकल सुगंध के कतरों के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है जबकि दुर्गन्ध के भभके हर गलियारे में महसूस हो सकते हैं। दुर्गन्ध फैलाने वाली प्रजातियां आजकल विस्तार पाती जा रही हैं और उन्हें अपने बराबर की दुर्गन्ध भी निरन्तर मिलने लगती है।

आजकल लोग अपने वजूद को स्थापित-प्रतिष्ठित करने में उतने सक्षम नहीं हैं कि अपने भीतर कर्म, चरित्र, स्वभाव या लोकस्पर्शी व्यवहार की कोई सुगंध पैदा कर जमाने भर को इससे अवगत करा सकें इसलिए बहुत सारे लोगों ने अंधकार के झण्डे हाथों में थाम लिए हैं और जाने कैसे-कैसे घातक और मारक षड़यंत्रों के सहारे अपने आपको सब जगह स्थापित करने के लिए बाड़ों, डेरों और गलियारों को दुर्गन्ध का केन्द्र बनाते हुए अखाड़ची की तरह अपने आपकी छवि बना रहे हैं।

इन लोगों के लिए कर्मयोग का मतलब हरामखोरी, कामचोरी करते हुए टाईमपास करना और बाड़ों को अखाड़ों के रूप में परिवर्तित करते हुए अपनी चवन्नियां चलाना ही रह गया है। फिर ऎसे लोगों के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल होने वाले बिकाऊ लोग भी खूब सारे हैं। इन्हें संरक्षण व प्रोत्साहन देने वाले ऊपर वाले भिखारियों और बिकने वालों की संख्या भी कोई कम नहीं है।

दोनों तरफ आपूर्ति के मुकाबले मांग बहुत ज्यादा है और मांगने या मांग खाने वालों की संख्या भी निरन्तर बढ़ती ही जा रही है। जहाँ सब कुछ बिना मेहनत किए धींगामस्ती और धौंस जमा कर प्राप्त किया जा सकता हो, वहाँ काम करना कौन चाहेगा।

रोजी-रोटी देने वाली थालियों में छेद करने का हुनर आजकल आम होता जा रहा है। बहुत से हैं जो पत्थर मार-मार कर आम भी खा रहे हैं, गुठलियों के मोल भाव भी कर रहे हैं और पेड़ की डालियों से लेकर पूरे के पूरे पेड़ को भी बेच खाने के बाद डकार तक लेने का नाम नहीं ले रहे हैं।

सज्जनों के लिए आज के हालात बड़े ही दुःखदायी और पलायनवादी मानसिकता पैदा करने वाले होते जा रहे हैंं जहाँ सच्चों और अच्छों को लगता है कि वे किसी गलत युग में पैदा हो गए हैं अथवा कलियुग का प्रभाव कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है।

पाप कहीं भी अकेला नहीं जाता या रहता। वह अपने साथ दुःख, विषाद, शोक, रोग, भय, तनाव और सभी प्रकार के दैहिक, दैविक व भौतिक तापों को लेकर रहता है जहाँ यशस्वी, मनस्वी, कर्मयोगी, सेवाभावी और परोपकारी लोगों के लिए कोई स्थान नहीं होता क्योंकि जो स्थान पाप के डेरों के रूप में स्थापित हो जाते हैं वहाँ सभी प्रकार के पापों और पापियों का आकर्षण बढ़ता जाता है और ये डेरे अंधकार के महातीर्थ के रूप में विकसित हो जाते हैं जहाँ अच्छे लोगों को न कोई श्रेय प्राप्त हो सकता है न किसी प्रकार की कीर्ति।

इस स्थिति का खात्मा तभी संभव है जब कि पूरे के पूरे डेरे और बाड़ों के पापियों को हटाकर स्थान विशेष का सम्पूर्ण शुद्धिकरण हो जाए या तीव्रता भरा भूकंप ही आकर सारे चिह्नों का खात्मा कर जाए।

इन डेरों में छाये अंधकार और नकारात्मक शक्तियों को बेदखल करना कोई सामान्य कार्य नहीं है। इस कार्य को हाथ में लेना भी अपना समय गँवाना ही है। पापों से भी दूर रहें और पापियों से भी दूर रहें, इससे अच्छा और कोई मार्ग आज के युग में है ही नहीं।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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