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आज्ञाएँ ही बची हैं, आज्ञाकारिता गायब

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

      आजकल आज्ञा का प्रचलन हर तरफ हो रहा है और हर कोई दूसरे पर आज्ञा का असर आजमाना चाहता है और आज्ञाएं दे देकर अपने आपको महान सिद्ध करना और दिखाना चाहता है लेकिन आज्ञा का पालन करना कोई नहीं चाहता।

       कुछ बिरलों को छोड़ दिया जाए तो आज्ञा पालन के क्षेत्र में अब वे लोग रहे ही नहीं जिन्हें आज्ञाकारी कहा जा सकता था। आज्ञा का पालन जीवनचर्या में मर्यादाओं से भरा वह शब्द है जिसका अवलम्बन शैशव से लेकर मृत्यु पर्यन्त हर क्षण उपयोग में आना चाहिए।

       शिक्षा और संस्कारों का संतुलन होने पर मर्यादाओं का पूरा-पूरा प्रवाह जीवन पर्यन्त बना रहता है लेकिन संस्कारहीन शिक्षा और पुरातन संस्कृति के अभाव में हम लोग अपनी जड़ों से कट चुके हैं और इसी का कुफल है कि आज्ञा मानने की शिक्षा हम भुलाते जा रहे हैं।

       वैदिक संस्कृति, पौराणिक परंपराओं और सांस्कृतिक लोक जीवन में माता-पिता, गुरु और बड़ों को आज्ञा देने का पूरा-पूरा अधिकार था और संतान, शिष्य एवं आयु में छोटे लोग आज्ञाओं का  परिपालन करना अपना धर्म समझते थे और अक्षरशः आज्ञा का पालन करते हुए अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव भी करते थे और इस बात पर गर्व और गौरव भी करते थे कि हमें अपनों से बड़ों और आदरणीयों की ओर से सेवा का मौका मिला और उसे निभाया।

       वह जमाना और था जब आज्ञा पालन का धर्म निभाकर आत्मिक शांति और सुकून का ऎसा अहसास होता था कि जिसका वर्णन किया जाना संभव नहीं था। हम जब भी किसी की आज्ञा का अक्षरशः पालन करते हैं, आज्ञा देने वाला हमसे इतना अधिक प्रसन्न होता है कि इसे बयाँ नहीं किया जा सकता।

       आज्ञादाता इस स्थिति में हमें अपना आत्मीय अनुभव करता हुआ जिस प्रकार से आशीर्वादों की बरसात करता है वह अपने जीवन भर के लिए वह वरदान  होता है जो हमारे आभामण्डल से नकारात्मक प्रभावों को हमेशा ध्वस्त कर देता है और हर क्षण हमारे लिए अभेद्य सुरक्षा कवच के रूप में काम आता है।

       इस सूक्ष्म प्रभाव को सामान्य इंसान न कभी समझ पाया है, न समझ पाएगा।  क्योंकि हम सभी लोग अपने जीवन के हर व्यवहार को स्थूल रूप में आँकते हैं, जीवन की प्रत्येक गतिविधि को नफा-नुकसान के मानदण्डों पर तौलते हैं, हर प्रकार के संबंध को अपनी स्वार्थपूर्ति के माध्यम के रूप में देखते हैं और यही कारण है कि ईश्वरीय सत्ता, दिल से निकलने वाले आशीर्वाद की सूक्ष्म परमाण्वीय क्षमताओं और दिव्य तत्वों के बारे में जिन्दगी भर नासमझ बने रहते हैं।

       इसी नासमझी का परिणाम है कि आजकल आज्ञाकारियों की कमी होती जा रही है जो कि हर आज्ञा का अक्षरशः पालन करते रहें, अपने-अपने कर्तव्य कर्म को धर्म मानकर आज्ञाओं के अनुरूप जीवन का संचालन करते रहें और हमेशा इस बात के लिए प्रयत्नशील रहें कि जो आज्ञा दे रहा है वह किस प्रकार अन्तर्मन से प्रसन्नता का अनुभव करे।

       आज्ञा पालन के मामले में अब जो कुछ सुना जाता है वह केवल पुराणों, ऎतिहासिक ग्रथों, धर्मशास्त्रों और नीति कथाओं में ही सिमट कर रह गया है। बिरले ही होंगे जो स्वेच्छा से आज्ञा पालन करने में विश्वास रखते होंगे अन्यथा माता-पिता की आज्ञा संतान नहीं मानते, गुरु की आज्ञा शिष्य नहीं मानते और दूसरे सारे संबंधों को देखा जाए तो आज्ञा देने वाले इस बात से परेशान हैं कि उनकी आज्ञाओं को कोई नहीं मानता, कोई नज़र नहीं आता जिसे आज्ञाकारी माना जा सके।

       दूसरी ओर जिन्हें आज्ञा दी जाती है वे अपने व्यक्तित्व को इतना अधिक ऊँचा मान बैठे हैं कि उन्हें लगता है उन पर आज्ञा चलाने वाला कोई हो ही नहीं सकता। वे सबसे ऊपर हैं। यह अहंकार और स्वयंभू होने का भान आजकल बहुत से लोगों के लिए सर चढ़ कर बोल रहा है। 

       यही कारण है कि आजकल आज्ञा का पालन या तो किसी ज्ञात-अज्ञात भय से होता है अथवा किसी न किसी स्वार्थ से। इसके बिना स्वाभाविक रूप से आज्ञापालन कुछ संस्कारित परिवारों में ही देखने को मिलता है, और कहीं नहीं।

       विभिन्न क्षेत्रों में आज्ञाओें का अब कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। बहुत सारे लोगों को बार-बार किसी न किसी आज्ञा के बारे में याद दिलाना पड़ता है, उन्हें दी जाने वाली आज्ञाओं का बार-बार भान कराना पड़ता है औरतब कहीं जाकर ये लोग कुछ हरकत में आते हैं।

       आज्ञा को जो लोग धर्म मानकर स्वीकार करते हैं वे जिन्दगी में खुद भी प्रसन्न रहते हैं और दूसरों को भी खुश रखने की कला सीख जाते हैं। यही नहीं तो जो  लोग ईमानदारी और निष्ठा के साथ आज्ञा पालन करते हैं वे अन्यों के मुकाबले ज्यादा सुखी, समृद्ध एवं आत्मतुष्ट रहते हैं और ऎसे लोगों के जीवन में आने वाली समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाया करती हैं।

       कारण साफ है कि इन आज्ञाकारी लोगों पर संसार भी प्रसन्न रहता है और ईश्वर मेहरबान रहता ही है।  आज्ञापालन का धर्म जीवन का वह बड़ा धर्म है जो मर्यादाओं की रक्षा करता है और अनुभवियों, बुजुर्गों आदि के ज्ञान-अनुभव और आशीर्वाद प्रदान करता है। जो किसी अन्य से प्राप्त किये जाने कभी संभव हैं ही नहीं।

       अपने से बड़ों की आज्ञा का पालन करने की आदत डालने की आज जरूरत है तभी हम पुरानी परंपराओं के विलक्षण ज्ञान, हुनर और दुर्लभ अनुभवों को सीख कर अपने जीवन को सँवार पाएंगे। आज्ञा देने से कहीं ज्यादा अच्छा है आज्ञा का पालन करना। जो इंसान अपने जीवन में आज्ञा पालन करना सीख जाता है उसका जीवन सुनहरे रंगों और रसों से नहा उठता है।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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