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रोना रोते न रहें दहाड़ें, गर्जना करें

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

सबकी अपनी-अपनी आदतें होती हैं। अपने वंशानुगत संस्कारों, आनुवंशिक गुणों और सम सामयिक धाराओं-उप धाराओं के अनुरूप बन जाने वाली इन आदतों को छोड़ पाना हर किसी के बस में नहीं होता।

बिरले लोग ही होते हैं जो कि किसी न किसी प्रकार का कोई झटका लगने या कि प्रभावी समझाइश अथवा  दैव कृपा हो जाने पर अपनी आदतों को छोड़ पाते हैं अन्यथा बहुसंख्य लोगों के लिए एक बार जो भी आदत पड़ जाए, उसे छोड़ पाना अत्यन्त कठिन होता है।

हर क्षेत्र में हर किस्म की आदत को पालने वाले लोग मिल जाते हैं। इनमें से अधिकांश की पहचान ही उस आदत विशेष को लेकर होने लगती है और धीरे-धीरे अपनी आदतों की वजह से लोग पहचाने जाने लगते हैं।

आदतों के साथ ही हर व्यक्ति का अपना स्वभाव भी होता है। कोई जरूरी नहीं कि एक परिवार या स्थान पर रहने वाले लोगों का स्वभाव एक जैसा ही हो। यह पूर्वजन्म के संचित पाप-पुण्य और अपने-अपने प्रारब्ध से आकार लेता है।

यही कारण है कि सभी का स्वभाव भिन्न-भिन्न होता है और यह भिन्नता व्यक्ति के कर्म, व्यवहार और चरित्र आदि सभी पक्षों पर साफ तौर पर झलकती भी है। आदतों और स्वभाव के बारे में आजकल थोड़ी मिलावट होने लगी है क्योंकि इंसान अपने काम और स्वार्थ के साथ मौके देखकर रंग बदलने में माहिर हो गया है।

इस कारण से आजकल लोगों में खूब सारी आदतों का मिश्रण देखने को मिलता है। लगता है कि जैसे हर कोई तरह-तरह के स्वभाव और आदतों की वह दुकान होकर रह गया है जहाँ जिस मुखौटे के अनुरूप जो कुछ चाहिए वह हमेशा के लिए हाजिर है, उपयोग करो और बदलते रहो।

इन सभी प्रकार की आदतों वाले लोगों में सर्वाधिक शालीन और गंभीर स्वभाव वालों की मजबूरी यह होती है कि वे मानवीय संवेदनाओं और स्वभाव वाले होते हैं और ये हमेशा किसी न किसी मुलाहिजे में आकर उन लोगों को कुछ नहीं कह पाते हैं जो उनके मनोनुकूल काम नहीं कर पाते हैं अथवा अपने कत्र्तव्य कर्म को ढंग से पूरा नहीं कर पाते हैं।

अपनी इस शालीनता की वजह से ये दूसरे लोगों से हमेशा दुःखी और परेशान रहते हैं और कुछ कह नहीं पाते हैं। और इसी विवशता से भरे होकर हम जैसे लोग हमेशा दूसरों के नाम का रोना रोते रहते हैं। बावजूद इसके कुछ हो नहीं पाता।

इसका मूल कारण यही है कि आजकल हम जिन लोगों के सामने रोना रोते हैं वे सारे के सारे इस काबिल नहीं होते कि हमारी समस्या दूर कर सकें, हमें राहत दे सकें।

उलटे ये लोग हमारी समस्याओं को बहुगुणित भी करते हैं हमारी तकलीफों के बारे में दूसरों को भी नमक-मिर्च लगाकर हर बात को परोसते रहते हैं चाहे वह परोसने लायक हो या नहीं।

दरअसल आजकल न तो गुणग्राही लोग रहे हैं, न इतने धीर-गंभीर और सकारात्मक सोच वाले लोग रहे हैं जो कि किसी और की तारीफ कर सकें, कोई सहयोग कर सकें और अच्छे इंसान के लिए किसी जरूरत के वक्त अच्छाइयों के बारे में कह सकें। 

पहले समुदाय में अच्छे लोगों के बारे में लोग सिफारिश किया करते थे और अच्छे लोगों को जहाँ कहीं मौका मिलता था वहाँ अपने बारे में राय व्यक्त किया करते थे। इसके साथ ही जहाँ कहीं मौका मिलता था वहाँ सज्जनों के हित में कुछ न कुछ मदद किया ही करते थे।

अब वो समय नहीं रहा। अब जो कुछ करना है कि वह खुद ही को करने की जरूरत है। आजकल अपनी किसी समस्या के बारे में किसी अपात्र, खुदगर्ज और कायरों से कुछ न कहें, संसार में बहुत से लोग ऎसे हैं जो बड़े-बड़े ओहदों पर हैं, बहुत कुछ भला कर सकने की स्थिति में हैं। पर ये लोग अपनी जिम्मेदारियों तथा कत्र्तव्य कर्म तक को तो ढंग से निभा नहीं सकते, दूसरों का क्या भला करेंगे।

ऎसे लोग आजकल बहुत बड़ी संख्या में हैं। इन नपुंसकों से कुछ उम्मीद रखने की बजाय अपने आप को जगाएं, अपनी शक्तियों का जागरण करें और धर्म, सत्य तथा ईमान पर चलते हुए दहाड़ें और गर्जना करें तथा अपनी हर बात को पूरे जोश के साथ रखें।

जो कुछ करना है हम ही को करना है, हमारी ही शक्तियों के कारण हम संसार सागर में अपने आपको विजयश्री दिलाते हुए अपने वजूद को स्थापित कर सकते हैं। अपने आपको जगाएं और इस प्रकार व्यक्तित्व को निखारें कि अग्निधर्मा व्यक्ति का प्रभाव हर किसी को नज़र आए।

अब वह समय नहीं है कि हम औरों के भरोसे रहें, अपने जीवन को सँवारना, अपनी समस्याओं का खात्मा करना हमारे हाथ में है। अप्प दीपो भव ... की भावनाओं के अनुरूप जो चलता है वह दीपक की तरह जलता भी है और सूरज का प्रतिनिधि रहकर औरों को भी प्रकाशित करता है।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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