रविवार, 27 सितंबर 2015

उत्सवी हो हर विसर्जन

 

डॉ0 दीपक आचार्य

 

अर्जन से लेकर विसर्जन तक की पूरी यात्रा में उत्सवधर्मिता का पुट होना चाहिए। अर्जन नित्य भले न हो, विसर्जन शाश्वत और नित्य है जिसे होना ही है चाहे हम चाहें, या न चाहें।

पिण्ड और ब्रह्माण्ड भर में हर सृजन का एक समय बाद अंत होना ही है क्योंकि पदार्थ की अपनी निश्चित सीमा होती है जिसके बाद उसका संयोग भंग होना ही है। यह स्थिति जीव और जगत सभी पर लागू होती है।

हम सभी लोग अर्जन के मामले में सदा-सर्वदा गंभीर और सजग रहते हैं लेकिन विसर्जन के प्रति हम भय, आशंका और दूरी का भाव बनाए रखते हैं।

हम सभी की इच्छा यही होती है कि अर्जन ही अर्जन होता रहे, पदार्थों का जखीरा हमारे कब्जे में रहे, पंचतत्वों के पुतलों की भारी भीड़ हमारे आगे-पीछे जमा रहकर हमारा जयगान करती रहे, हमें महान बताती रहे और सारे के सारे हमारे पीछे-पीछे चलते रहें, कोई हमसे आगे बढ़ पाने का दुस्साहस न कर सके, चाहे वह हमसे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो।

हमेशा चरम प्रतिष्ठा के साथ वजूद बना और यह आनंदमयी स्थिति हर क्षण बनी रहे, इसमें कहीं कोई कमी न आने पाए, उत्तरोत्तर इसमें बढ़ोतरी ही होती रहे।

अर्जन के प्रति पुराने युगों की अपेक्षा वर्तमान में हम लोग अधिक सक्रिय, उत्सुक और आतुर रहने लगे हैं।  सब तरफ एक ही भागदौड़ मची है। हर कोई जल्दी से जल्दी धनाढ्य, वैभवशाली और प्रतिष्ठित होना चाहता है।

इसके लिए हम सारी मर्यादाओं को भुला चुके हैं, तमाम लक्ष्मण रेखाओं को लांघ चुके हैं और उस युग में पहुँच चुके हैं जहाँ संवेदनहीनता और अमानवीयता का बोलबाला है, इंसानियत ताक में रखी हुई है और छीनाझपटी की कबीलाई संस्कृति का पक्का प्रभाव आदमी से लेकर परिवेश तक में छाया हुआ है।

इन काले घने और घुप्प अंधेरों के बीच इंसानियत की रोशनी के सारे कतरे बौने होते जा रहे हैं और लगता है जैसे हर तरफ मुखौटों के जंगल उग आए हैं जहाँ खरपतवार से लेकर हर फसल तक विषैली होने लगी है और कहीं दूर तक आदमी का कोई नामोनिशान नज़र नहीं आ रहा।

हमारा पूरा जीवन उत्सवधर्मिता का पर्याय होने के लिए है लेकिन हमने इसे केवल अपने स्वार्थ पूरे करने, भोगी-विलासी एवं आरामतलबी जिन्दगी तक ही सीमित करके रख दिया है। इसमें तनिक सी कमी आयी नहीं कि हमारा मानसिक संतुलन और शारीरिक सौष्ठव बिगड़ जाता है, हम पागलों जैसा व्यवहार करने लगते हैं, अब तक अनुभवित सारे  सुखों और आनंद को भुलाकर शोक, विषाद और खिन्नताओं के जंगल में भटकते रहकर उन्मादियों जैसा व्यवहार करने लगते हैं।

यह स्थिति हमारे विसर्जन तक यों ही बनी रहती है और हमारा  विसर्जन भी होता है तो आधी-अधूरी कामनाओं और विषादों से भरे आभामण्डल के साथ। 

जितना अर्जन के प्रति गंभीर रहते हैं उतना ही विसर्जन के लिए भी तैयार रहें। जीवन में जो कुछ प्राप्त किया है उसे जगत का मानते हुए इसे पात्र लोगों और समाज में बाँटने का अभ्यास बनाएं, देश के लिए अपनी अर्जित संपदा को समर्पित करें और विसर्जन की परंपरा को जीवन के नित्य क्रम में शामिल करें।

जहाँ जिसको जो भी जरूरत हो, पूरी करने में निष्काम भाव से आगे रहें और इसमें जरा भी संकोच न करें। कृपणता और अनुदार स्वभाव त्यागें, तभी विसर्जन के प्रति आत्मीय भाव स्थापित हो सकेगा। जो पाया है वह सब समाज और देश का है, इस भावना से अर्जन करें और विसर्जन की प्रक्रिया को साथ-साथ अपनाते रहें। 

आज हम विसर्जन की कल्पना तक से भय खाते हैं, संकोच करते हैं और उदारता से परे रहकर सोचते हैं। सारे पदार्थों को अपना और नित्य मानकर चलते हैं, जमा ही जमा करते रहते हैं और इस पर अपना लेबल चिपकाए रखते हैं।

जबकि हम  सभी को यह पता है कि कुछ भी साथ नहीं जाने वाला, सब कुछ यहीं रह जाने वाला है। फिर भी हममें उतनी उदारता नहीं रही कि अपने जीते जी त्याग करने का माद्दा पैदा करें और विसर्जन को नित्य मानकर अपने व्यवहार को उदार बनाएं।

विसर्जन के लिए खुद तैयार न होंगे तो प्रकृति एक समय बाद अपने आप विखण्डन कर देगी, इसके बाद तो विसर्जन की विवशता रहेगी ही रहेगी। काल किसी का सगा नहीं है, न अब तक वह किसी के बस में आ पाया है।

हम सभी को एक न एक दिन जाना ही है, इसे कोई टाल नहीं सकता। फिर क्यों न आत्म विसर्जन के प्रति आस्था जगाएं, संचित को विसर्जित करने और सृष्टि के लिए उपयोगी बनाने में आगे आएं और अपने आपको उस स्थिति के लिए हमेशा तैयार रखें जहाँ जाकर विसर्जन का संस्कार पूरा होना ही है।

विसर्जन की यह आदत हमें अर्जन की ही तरह विसर्जन के प्रति भी उत्सवी उत्साह और उमंग से भरा रखेगी और हमारा यह जन्म सफल होगा तथा आने वाले जन्मों के लिए मजबूत बुनियाद भी स्थापित होगी।

जीवन का कोई सा क्षण हो, जो पाया है वह छीना जाने वाला है। क्यों न हम अपने ही हाथों जरूरतमन्दों और समाज को देकर अपने जन्म को धन्य करें।

ईश्वर ने भी हमें धरा पर इसीलिए भेजा है ताकि हम जो कुछ प्राप्त करें वह समाज के लिए, अपनी मातृभूमि के लिए और जगत के लिए समर्पित करें। 

स्वेच्छा से ऎसा कर सकें तो श्रेयस्कर और पुण्यदायी है, स्वर्ग के द्वार खोलने में समर्थ है। अन्यथा अनचाहा विसर्जन तो होना ही है। अर्जन के साथ ही विसर्जन को भी आनंद का पर्व बनाएं। आज का पर्व यही तो कह रहा है।

सभी को अनन्त चतुर्दशी की हार्दिक मंगलकामनाएँ .....

गणपति बप्पा मोरिया ....

 

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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