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स्वावलंबन समय की सबसे बड़ी जरूरत

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डॉ∙ सूर्यकांत मिश्रा

0 समय से पहले समाज को जगाना जरूरी

स्वावलंबन समाज रूप से आर्थिक स्वावलंबन से लगाया जाता है अर्थात किसी अन्य पर निर्भर न होकर अपना गुजर बसर करने की शक्ति का नाम ही स्वावलंबन कर दिया गया। जहां तक मैं समझता हूं स्वावलंबन की यह परिभाषा पूर्ण नहीं है। स्वावलंबन का तात्पर्य स्वयं की जरूरत से संबंधित हर कार्य में निपुणता और उसे करने की प्रतिबद्धता तक विस्तृत होनी चाहिए। स्वावलंबन शब्द अपना महत्व और उसके प्रति मानवीय सोच को जरूरत में बदलता दिखाई पड़ने लगा है। अब वह समय जल्द ही समाप्त होने वाला है जो हमें नौकर और मालिक के संबंधों से जोड़े रखा है। एक सेवक के माध्यम से कराये जाने वाले काम हमें खुद ही करने आने चाहिए अथवा सीखने के लिए हमें तैयार होना चाहिए। इसी स्वावलंबन की शिक्षा हमें स्वतंत्रता से पूर्व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा दी जाती रही है। यह समस्या भारत वर्ष में सर्व व्यापी नहीं है, किंतु बहुत बड़ी आबादी नौकरशाही और सेवकों द्वारा कराये जाने वाले नित्य कार्यों पर निर्भर है। हम यहां तक सेवकों पर आश्रित हो चले है अब घरों में खाना बनाने के लिए भी सेवक रखे जा रहे है।

स्वावलंबन जैसे विषय पर चिंतन इस युग की प्रबल मांग हो सकती है। शासकीय सेवाओं में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति से लेकर अन्य पिछड़ा वर्ग तथा और भी वर्गों को आरक्षण प्रदान करना आजादी के बाद से बदस्तूर जारी है। समाज का सिस्टम भी आरक्षण के चलते ही दम तोड़ रहा है। परिस्थितियां इतनी तेजी से परिवर्तित हो रही है कि हमें अब घर पर मंगल कार्य के दौरान नाई जाति की सेवा के लिए उन्हें ढूंढना पड़ रहा है। क्या हम यह मान ले कि हमारे भारतवर्ष में नाई जाति विलुप्त हो रही है। नहीं! ऐसा कतई नहीं है, किंतु शासकीय नौकरियों में स्थान पाने से लेकर उच्च शिक्षा को अपनाने और शिक्षित होने वाले इस वर्ग के लोग अब अपना परंपरागत काम नहीं करना चाह रहे है। अब हमें खुद ही उनके हिस्से काम करना पड़ रहा है। मंगल गीत का आयोजन हो या जन्मोत्सव का उत्साह अथवा पारिवारिक शोक संदेश को रिश्तेदारों और समाज तक पहुंचाना हो तो नाई वर्ग की तलाश किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। परिणाम स्वरूप मोबाईल की मैसेज सेवा, तथा वाट्सएप जैसी सुविधाएं हमें ऐसे ही कामों के लिए उपयोग में लाना पड़ रहा है। हम स्वयं जाकर लोगों को सूचित करने का कष्ट नहीं उठा रहे है। कारण यह कि ऐसा काम हमारे स्टेटस को प्रभावित करता है, तब हम तकलीफ क्यों न पाए? हमारे पूर्वजों का जमाना और था, हमारा कुछ और, किंतु हम उसी ढर्रे पर चलकर अपनी हैसियत का ढिंढोरा पीटना चाह रहे है जो बदली हुई परिस्थितियों में संभव नहीं है।

स्वावलंबन ही वह ताकत है जिसके बल पर मनुष्य उन्नति कर सकता है। जीवन की हर सफलता उस जजबाती और वीर पुरूष का ही स्वागत करती है जो स्वयं मेहनत कर पृथ्वी की छाती चीरकर पानी निकालता है और अपनी प्यास बुझाता है। तात्पर्य यह कि कायर और भीरू तथा आलसी व्यक्ति स्वयं हाथ पैर न हिलाकर दूसरों पर निर्भर रहते हुए सफलता के हर अवसर को खो देता है। ऐसे ही व्यक्ति अपनी असफलता के लिए ईश्वर को दोष देते देखे जा सकते है। वे यह भूल जाते है कि ईश्वर भी उन्हीं की सहायता किया करते है, जो अपना कर्म स्वयं करते है। यदि हम अपने स्वावलंबन के बल पर ठान ले तो ऐसा कोई काम नहीं जिसे हम न कर सके। स्वावलंबी मनुष्य की हर इच्छा उसके द्वारा किये गये आचरण के साथ अवश्य पूरी होती है। एक स्वावलंबी पुरूष अपना ही स्वार्थ पूरा नहीं करता, वरन वह अपने देश और समाज का कल्याण भी करता है। अपने कठोर परिश्रम से वह नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों को जन्म देते है। ऐसा मनुष्य ही ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की कसौटी पर खरा उतरते हुए सामाजिक उन्नति का प्रेरक बन औरों को मार्ग दिखाता है।

दफ्तरों से लेकर आवासीय परिसर और आम रास्तों की साफ सफाई की बीड़ा ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ के रूप में उठाने वाले हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले व्यक्ति नहीं है। उन्होंने केवल महात्मा गांधी के विचारों को नये ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सिर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने अभियान चलाया। उसी अभियान में घरों से कच्चे शौचालयों को विदा कर सेप्टिक टैंक का निर्माण करा दिया। अब मोदी जी ने खुले में शौच न जाने की मुहिम को उसी तर्ज पर चलाकर चलकर महात्मा बनने की कोशिश की है। श्री मोदी का अभियान भी सम्मान के लायक नहीं है। कारण यह कि उनसे पहले और किसी प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत की कल्पना क्यों नहीं की? भले ही प्रधानमंत्री मोदी की योजना ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ की तर्ज पर ही क्यों न ली जाए, किंतु है महत्त्वपूर्ण और समय की मांग भी। यही वह योजना है जो हमें स्वावलंबन की शिक्षा प्रदान करती है। घरों में झाड़ू पोछा का काम अन्य महिला के हिस्से क्यों? घर परिवार के सदस्य ही उस कार्य को क्यों न करें? ऐसा करने से वह महिला जो घरों में झाड़ू पोछा लगाकर जीवन यापन कर रही है, कुछ और काम करके देश को बड़ा योगदान दे सकती है। सरकार की अनेक ऐसी योजनाएं है, जो अशिक्षित महिलाओं से लेकर कम पढ़े लिखे लोगों को प्रशिक्षण प्रदान कर स्वावलंबी बना रही है।

आज हम अपनी दिनचर्या को अव्यवस्थित ढंग से व्यस्त कर खुद को कामों के लिए दूसरों पर निर्भर है, क्या हमने यह सोचा कि उक्त काम को हम स्वयं कुछ समय लगाकर पूरा कर सकते है। हमें दफ्तर जाना हो और हमारे कपड़े प्रेस न हो, या फिर जूते या चप्पलों में पॉलिश न हो तो हम गली चौराहों तक चक्कर काट आते है कि कहीं धोबी और मोची हमारा काम कर दें। क्या हमें चंद मिनटों में उक्त दोनों काम नहीं कर सकते? यह हमारी कमजोरी है कि हमने खुद को इतना आलसी और पराश्रित बना लिया है कि एक छोटा सा काम भी हमें भारी पड़ता है। खुद को व्यस्त रखने और अपना काम खुद करने में जो आनंद है वह कहीं और नहीं। इतना अवश्य है कि आने वाले एक-दो दशक के बाद सारी परिस्थितियां स्वयं बदल जाएगी तब भोजन के पश्चात अपने बर्तन भी खुद ही साफ करने होंगे। नहाने के साथ अपने वस्त्रों की सफाई भी खुद के हाथों से करनी होगी। यदि मेरी कल्पना सही हो गई तो हमारे बाल बनाने वाले नाई भी हमें नसीब नहीं होंगे और हमें एक दूसरे की हजामत भी खुद बनानी होगी। मुझे स्वावलंबन की जरूरत के संबंध में कबीर दास जी की पंक्तियां याद आ रही है, जो इस नजरिये से तर्क संगत हो सकती हैः-

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।

पल में परलय होत है, बहुरी करेगा कब।

                                                                                             प्रस्तुतकर्ता

                                                                                         (डॉ∙ सूर्यकांत मिश्रा)

                                                                               जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

                                                                                          मो∙ नंबर 94255-59291

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