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नज़र डालें गोबर गणेशों की ओर भी

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

सब तरफ गणेशोत्सव की जबर्दस्त धूम है जो अनन्त चतुर्दशी को सम्पन्न हो जाएगी।

सारा देश गणेशोत्सव के रंग में रंगा हुआ है। गांव की गलियों से लेकर कस्बों, शहरों और महानगरों तक हर तरफ गणेश ही गणेश छाए हुए हैं।

हर तरफ गणेश भक्ति के गीत-संगीत, भजन, मंत्र, स्तुतियां और पूजा-अनुष्ठान की गूंज है।  कोई कोना ऎसा नहीं है जहाँ मंगलमूर्ति गणेश विराजित न हों।

हम सभी के लिए यह कितनी सुकून की बात है कि हमारे यहाँ सर्वत्र गणेश ही गणेश भगवान प्रतिष्ठित हैं। कहीं अकेले विराजमान हैं, कहीं ऋद्धि-सिद्धि के साथ। फिर मूषक और मोदक तो हर जगह हैं ही।

लीलाओं के अनुरूप गणेशजी के अनेक रूप हैं। सर्वप्रथम पूज्य गणेशजी की आराधना के बिना न कोई कार्य आरंभ होता है,न पूर्णता ही प्राप्त कर पाता है।

इन दस दिनों में हम गणेशजी की जितनी श्रद्धा और भक्ति भाव के ज्वार के साथ पूजा-अर्चना करते हैं उसी का परिणाम है कि हम साल भर आनंद और सुख-समृद्धि का अहसास कर पाते हैं। सिद्धि और बुद्धि के देवता गणेश विघ्नविनाशक भी हैं और सभी को पता है कि आज की दुनिया में लोक जीवन से लेकर परिवेश और वैश्विक धरातल पर विघ्न पैदा करने वाले कौन लोग हैं, किन लोगों के कारण से समस्याएं पैदा होती हैं और शांति भंग होती है, विकास में बाधाएं आती हैं, सभी लोग परेशान होते हैं और हर बार हम उस मुकाम से दूर होते चले जाते हैं जिस पर पहुंचना हमारा ध्येय होता है।

हम सभी लोग दस दिन बाद गणेशोत्सव और गणेशजी को भूल जाएंगे, जो लोग याद रखेंगे वे धन्य हैं।

हम सभी लोग जितनी दस दिन में गणेश जी की आराधना करते हैं उससे भी कहीं अधिक उन लोगों को देखने की जरूरत है जो गोबर गणेश हैं और समाज-जीवन से लेकर देश-विदेश तक में हर जगह पसरे हुए जमे पड़े हैं, जिन्हें हिलाने का न किसी में माद्दा है, न इन्हें हिलाकर कोई आफत मोल लेना चाहता है।

इस देश का कबाड़ा करने में कोई सबसे अधिक अधिक जिम्मेदार है तो वे हैं सत्र-तत्र-सर्वत्र पुट्ठे पसराए चिपक कर बैठे हुए गोबर गणेश।

जितनी हम गणेश प्रतिमाएं स्थापित करते हैं उससे कई गुना हमारे यहाँ गोबर गणेश जमे हुए हैं जो सिद्धि, सुख और समृद्धि से लेकर हर काम में बाधक बने हुए देश की रफ्तार को रोके हुए हैं।

इन गोबर गणेशों के कारण से ही भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, बेईमानी, चोरी-डकैती, आतंकवाद, अनाचार और सारी बुराइयों का चलन चल पड़ा है।

ये गोबर गणेश ही हैं जिनकी बे-हुनरी के बावजूद चवन्नियां चल रही हैं। कोई सा काम हो, आज के बजाय कल-परसों तक टालने, मुफ्तखोरी अपनाने और पुरुषार्थहीन सम्पदा जमा करने की होड़ गोबर गणेशों को मालामाल कर रही है और देश के गरीब, मेहनतकश, मजबूर, ईमानदार और सज्जन लोग हाशिये पर भी आ रहे हैं और विपन्नता के साये में भी जी रहे हैं।

यों कहा जाता है कि गणेशजी की पीठ के पीछे दरिद्रता का वास रहता है लेकिन गोबर गणेशों के तो चारों तरफ दरिद्रता, आलस्य और कामचोरी का साम्राज्य बना रहता है।

ये गोबर गणेश चाहे बड़े हों या छोटे, मोटे हों या पतले या किसी भी आकार-प्रकार और किस्म के हों, इनका सान्निध्य और संपर्क तमाम प्रकार के दुःख, भय, शोक, दरिद्रता और विषाद देने वाला ही है।

हमारे दुर्भाग्य से ये गोबर गणेश हर बाड़े, गलियारे और महापथों से लेकर कोनों और दसों दिशाओं तक अपना वजूद किसी न किसी रूप में स्थापित किए हुए हैं।

जब तक इन गोबर गणेशों का कोई पक्का और निर्णायक ईलाज नहीं होगा तब तक देश में सुख-समृद्धि और ऋद्धि-सिद्धि, लाभ-शुभ आदि सब केवल लिखने के स्लोगन ही बनकर रह जाएंगे, इनका समाज-जीवन में कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है। गोबर गणेशों का ईलाज कैसे किया जाता है, इस बारे में किसी को समझाने की आवश्यकता नहीं है।

गोबर गणेशों से देश और समाज को मुक्त किए बगैर  असली स्वतंत्रता, विकास और उत्थान की कल्पना नहीं की जा सकती है। हर गणेश भक्त का परम कर्तव्य है कि वह गणेशजी की पूरे भक्तिभाव से सेवा-पूजा करे, उन्हें प्रसन्न करने और वरदान पाने के साथ उपाय करें लेकिन साथ में गोबर गणेश के उन्मूलन का भी अपना फर्ज है, इसे न भूलें।

मंगलमूर्ति की कृपा पाने के लिए सब तरफ स्वच्छ जमीन और परिवेश होना चाहिए और तभी गणेश विराजमान होते हैं। गोबर गणेशों को सफाया कर स्वच्छता में भागीदारी निभाना, समाज-जीवन में पवित्रता और दिव्यता लाना हम सभी का पहला फर्ज व धर्म है और यह गणेशभक्ति के साथ ही साथ समानान्तर रूप से चलना चाहिए तभी हमारी गणेश भक्ति का प्रभाव दिग-दिगन्त में पूरे उत्कर्ष के साथ देखा जा सकता है।

इस दिशा में गंभीरता से सोचें क्योंकि असुरों और विघ्नों का खात्मा करने की जो परंपरा गणेशजी आरंभ की है उस पर चलना प्रत्येक गणेश भक्त का कर्तव्य है और असल में यही गणेशोत्सव है जो साल भर बना रहना चाहिए।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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