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पखवाड़े की कविताएँ

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महेंद्रभटनागर



गाओ    
गाओ कि जीवन गीत बन जाए!
 
हर क़दम पर आदमी मजबूर है,
हर रुपहला प्यार-सपना चूर है,
आँसुओं के सिन्धु में डूबा हुआ
आस-सूरज दूर, बेहद दूर है,
      गाओ कि कण-कण मीत बन जाए!
     
हर तरफ़ छाया अँधेरा है घना,
हर हृदय हत, वेदना से है सना,
संकटों का मूक साया उम्र भर
क्या रहेगा शीश पर यों ही बना?
      गाओ, पराजयजीत बन जाए!
     
साँस पर छायी विवशता की घुटन,
जल रही है ज़िन्दगी भर कर जलन,
विष भरे घन-रज कणों से है भरा
आदमी की चाहनाओं का गगन,
      गाओ कि दुख संगीत बन जाए!
-----------------------------------
110, बलवंतनगर, गाँधी रोड, ग्वालियर - 474002 (म. प्र.)
फ़ोन : 81 097 300 48
ई-मेल drmahendra02@gmail.com
 
 
 
*महेंद्रभटनागर*
DR. MAHENDRA BHATNAGAR
Retd. Professor
110, BalwantNagar, Gandhi Road,
GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA


E-Mail : drmahendra02@gmail.com

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मनु वैरागी

तीन कविताएँ...


माँ, मैं शून्य था।
तुम्हारी कोख में आने से पहले
शून्य आकार था। एकदम शून्य
आपने जीवन दिया मुझे...
अंश बना तुम्हारा...
अनेक उपकार हैं तुम्हारे
मैं आहवान करता हूँ माँ तुम्हारा!
..............................................


लिखी रेत पे कविता
लिखा नाम तुम्हारा
लिखा क़लमा...
परवाज़ रूह हो गयी
जुगनू की रोशनी में...

...............................
हाँथो से तस्वीर उतरी
उंगुलियों ने रंग पहना
दिल के कैनवास पर
ज़िन्दगी एक नई दौड़ी

 

manuvairagi@gmail.com

http://manuvairagi.blogspot.in

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रमेश शर्मा


दोहे  रमेश के

हिंदी दिवस पर
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हिंदी मेरे देश की,..... मोहक मधुर जुबान !
इसका होना चाहिए, और अधिक उत्थान !!

किया उन्होंने आज फिर, हिंदी पर अहसान !
दिया साल के बाद फिर, हिंदी में व्याख्यान !!

हो जाएगी  एक दिन ,दिया नहीं गर ध्यान !
भावी पीढ़ी देश की,....... हिंदी से अनजान !!

हिंदी का समझें बड़ा, खुद को खिदमतगार !
बच्चे जिनके पढ़ रहे,..... अँग्रेजी अखबार !!

अँग्रेजी में लिख रहे, हिन्दी का अनुवाद !
संसद में भरपूर है ,..... ऐसों की तादाद  !!

रमेश शर्मा (मुंबई)
rameshsharma_123@yahoo.com

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सुरेन्द्र बोथरा ’मनु’


बंसी वाला चला गया


गीता के गायक का यह दिन आया आकर चला गया
धरती गूँजी] अम्बर गूँजा] पर हमने सब भुला दिया।
 
तीन लोक का स्वामी आया ग्वालों का जी बहलाने
अंबर छोड़ धरा पर उतरा जी कर जीना सिखलाने।
हम घर से बस मंदिर पहुँचे] युग आया युग चला गया।
 
लोक लाज मीरा ने छोड़ी] साँवरिए रंग राचीं
नटनागर की धुन पर खुलकर सहज उमंगें नाचीं
पंडित कितने अर्थ दे गया] जोगी उनको सुला गया।
 
वह उन्मुक्त पवन बन डोला साँस-साँस में बसने
हमने उसको बाँध दिया है बंधन खोले जिसने
जिसको सब छलिया कहते हैं वही अन्त में छला गया।
 
उसका दर्द सुना ही किसने] बंसी वाला चला गया।
&&&&&
सुरेन्द्र बोथरा email— surendrabothra@gmail.com
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राजेन्द्र नागदेव


      नावें
          -

एक दिन मैं उस नदी तक चला जाऊँगा 
जिसमे कागज की कितनी ही नावें तिराई थीं मैने
नदी ही थी किसी पहाड़ या झरने से यद्यपि नहीं निकली
उसकी कहानी जंग लगे नालीदार छप्पर से आरंभ होती थी
जहाँ से सावन-भादो में पानी धार धार झरता
और आंगन में नदी बन बह जाता,
मेरी कागज़ की नावें तिर रही हैं वहाँ
नदी अबतक सूखी नहीं है मेरे अंदर

कितने ही भयानक ग्रीष्मों से गुजरा
लू के तप्त थपेड़े सहे
नदी का जल भाप नहीं बना

नदी बचपन का झुनझुना थी
बजती रही
कभी सुना मैंने
कभी नहीं भी

कापियों-किताबों में गत्ते ही शेष थे उन दिनों
बहुत नावें छोड़ी होंगीं

मेरा बचपन नावों में अब भी तिर रहा है
मैं लौटना चाहता हूँ नदी किनारे
देखना चाहता हूँ पुरातन चेहरा अपना
जो जारी सफ़र में
प्रस्थान-बिंदु सा उभरता है कभी
कभी ओझल होता

याद है, आँखों में भविष्य के कुछ स्वप्न तब भी थे
मैं परखना चाहता हूँ
आज के अपने अक्षांस-देशांतर एक बार उन्हीं आँखों से

--

अकेली
          -

वह जो बैठी है वहाँ
टूटे हत्थे वाली कुर्सी पर
अभी-अभी लौटी है एक समुद्र की नमकीन यात्रा से अपने घर
कंधे पर पर्स
और पूरे तन पर आफिस की थकान सम्हाले,
कोइ फ़र्क नहीं पड़ता
इस जग़ह को आप घर कहें या रेगिस्तान
कब्रिस्तान या फिर गिलास
जिसे भरा होना था पानी से इस समय
पर खाली है

स्त्री अपने को सात-पच्चीस की लोकल में ढोकर
छोड़ आती है समुद्र की हिलोरों पर
और डूबती-उतराती है
जबतक कि उसकी पावडर-सुवासित देह पर
चिनचिनाती नमकीन पर्त न चढ़ जाए
स्त्री चिनचिनाहट में बैठी है
नल में है केवल हवा का सरसराना

सहज नहीं होता होगा
किसी स्त्री का
अपने लिये मरुभूमि चुन लेना
फिर जलती रेत पर
फफोलों वाले पाँव रखते चले जाना,
मैं सफ़र का मात्र अनुमान कर सकता हूँ
जानता हूँ अनुमान कभी सही नहीं होते

स्त्री, पता नहीं किन सुरंगों से गुज़र कर पहुँची है
बोरिवली की चाल के इस घोंसले में
जहाँ तिनकों के सिवा और कुछ नहीं
कोई घोंसला केवल तिनकों से नहीं बनता,
स्त्री शायद यह भी नहीं जानती
लौटने के लिए कोई सुरंग अब खुली है कि नहीं

स्त्री देर तक बैठी रहेगी यूँ ही
फिर उठा लेगी रिमोट्कंट्रोल
और रख देगी वापस
कि टीवी सीरियल का जाने कौनसा रंग
अतीत के किसी चिथड़े के रंग से मेल खा जाए
और समान तरंगों वाली ध्वनियों के मिलन की तरह
अकस्मात विस्फोट हो जाए
जी उठे कोई दबी हुई आग,
स्त्री जानती है
उसके मेमोरीकार्ड में किसी फ़ायरब्रिगेड का नम्बर नहीं
बल्कि सच यह है कि उसकी दुनिया में
कोई फ़ायरब्रिगेड है ही नहीं

कितनी अकेली हो सकती है एक अकेली स्त्री
स्वयं नहीं जानती
जबतक वह अकेली नहीं होती।
*                    *                   *
                          राजेन्द्र नागदेव
                          डी के 2 – 166/18 , दानिशकुंज
                          कोलार रोड
                          भोपाल- 462042

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बीना रौतेला


‌‌‌तेरे सितम
हसरतों की चाह में, तू मुझे भुलाता चला गया।
खबर तुझे यह न थी कि तू मुझे मिटाता चला गया॥
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वक्त का यह फरमान था या तेरी सज़ा।
तू जगमगाती रातों में अंधकार फैलाता चला गया॥
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बुत बनी मैं तेरी सुरत देखती रही।
तू मेरे होठों पर खामोशी लाता चला गया॥
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जिन आंखों ने देखे न थे कभी मंजर तबाही के।
तू अपनी कवायदों से एहसास उसे कराता चला गया॥
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दिन बने हफ्ते, साल बनते चले गये।
हम तेरी साजिशों के गवाह बनते चले गये॥
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तेरी मेहरबानियों के करम हम पर कम न थे।
तू हर रोज सितम की तारीख ब‌ढाता चला गया॥
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परिचय: बीना रौतेला, दिल्ली 
हिंदी भाषा की कविताए लिख रही हैं।

----------.

अनिल उपहार


भरोसा ।
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हर बार की तरह इस बार भी
आ ही गई राखी ।
न जाने कितने भाई देते है वचन
अपनी बहन की रक्षा का ।
और
कितने निभा पाते है इस वचन की
लाज ।
शहर के नुक्कड़ पर खड़े शोहदे
क्यों ताकते है ?
हर आने जाने वाली बहन कों ।
क्यों भूल जाते है वो कि -
उनकी अपनी बहन भी गुज़र रही होगी
ऐसे ही रास्तों से
और सुन रही होगी फब्तियां ।
काश! इस राखी पर ऐसा हो जाये
और सच मुच कोई भाई
अपना वचन निभा जाये ।
--
हर बार तुमने मेरी सूनी कलाई पर
अपने स्नेह के हस्ताक्षर कर
अपनी दुआओ के तमाम दस्तावेज
मेरे नाम कर दिए ।
और मैने भी रवायतो के खाली प्रष्ठ पर
अपनी जेब के कुछ पल
तुम्हारी हथेली पर रख
अपने फर्ज़ की इति श्री करली ।
क्या सही अर्थों में
निभा पाया हूँ तुम्हारे स्नेह के मूल्य कों ?
आज के इस पवित्र दिन मेरे हाथों में बंधे
इस धागे की कसम
मेरा वचन है तुमको
कि अब कोई बहन अपने भाई से
नही मांगेगी रक्षा का वचन ।
हर भाई ठीक मेरी ही तरह
निभाएगा हर वो फर्ज़
जिस पर सिर्फ बस सिर्फ बहन
तुम्हारा ही हक होगा ।
और फिर
तुम कर सकोगी बैखोफ विचरण
हजारो की भीड़ में और -
हर वक़्त खड़ा पाओगी किसी भाई को अपने साथ ।।।।।।
--

------ ------

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स्मृति उपहार


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हर वक़्त क्यों दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है ?
मै आत्म निर्भर हूँ ये काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों खुद कों साबित करना पड़ता है ?
क्या मै एक लड़की हूँ काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों दबाया जाता है ?
मै खुलना चाहती हूँ काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों पर काटे जाते है ?
मै उड़ना चाहती हूँ काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों जीने की वजह पूछी जाती है ?
मै जीना चाहती हूँ यह काफी नहीं ।
हर वक़्त क्यों दूसरों की पहचान दी जाती है ?
मै खुद की पहचान बनाना चाहती हूँ यह काफी नही ।
अनुत्तरित है बहुत से प्रश्न जो चाहते है तुमसे समाधान
आप दोगे न जवाब ???????
----------स्मृति उपहार
द्वारा अनिल उपहार काव्यांजलि पिडावा जिला झालावाड राजस्थान

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रचना -पीयू 'प्रीत'

लगी आज घोटालों की फिर वो झड़ी है
वही भांग कुएँ में फिर घुल पड़ी है ।


दौर वो भी था जब वो दर-दर घूमे थे
सुन-सुनके उनके इरादे हम भी तो झूमे थे ।
वही तो है वतन मगर, मुखौटे नये हैं
हकीकत से रु-ब-रु होकर जनता फिर रो पड़ी हैं।

लगी आज घोटालों की फिर वो झड़ी है
वही भांग कुएँ में फिर घुल पड़ी है ।


कहीं व्यापमं की चीखें, किसी ने हड़पी धरा है
खेलों, खनिजों को नीलाम कर, कहां पेट उनका भरा है?
पाक कारनामों की परदेसों तक जुड़ी कड़ी से कड़ी है
नए नालंदाओं की करतूते सीसों में जड़ी हैं ।

लगी आज घोटालों की फिर वो झड़ी है
वही भांग कुएँ में फिर घुल पड़ी है ।

☆रचना -पीयू 'प्रीत'
अलवर (राज. )

----------.

मनीष  जैन अज़ल

दर्द   छुपा   लूँ    ऐसा   कलाकार  नहीं   हूँ
दुनिया  में  हूँ  पर  दुनियादार   नहीं  हूँ
बहते   जाना  ही   मुकद्दर  हो गया अब
किसी  साहिल  का  तलबगार  नहीं  हूँ
फरेब  झूठ   बेवफाई  से  हारा  हूँ बेशक
खुद  की  नज़रों  में  तो  शर्मसार  नहीं  हूँ
हर बार  शख्ससियत  बदलता  है  मेरी
किसी  किस्से  का  मैं  किरदार  नहीं  हूँ
गर्दिशों  में  भी  खुद्दारी  कायम  है  मेरी
शुक्र    है  इमाँ   का  गुनहगार  नहीं  हूँ
जबाँ  से  कहूँगा  करके  भी दिखाऊंगा
मैं   कोई   ढुल मूल  सी  सरकार  नहीं  हूँ
हर  वक़्त  तो  मुझसे  रूठा  ना  कर
सिर्फ  तेरा  ही   खिदमतगार  नहीं  हूँ
रुबरु  ना    मिल  सके  तू  ना  सही
अज़ल  तेरे ख्यालों   का  भी हकदार  नहीं  हूँ

----------.

डॉ नन्द लाल भारती

दर्द
दर्द दांत का अकेला नहीं होता
सिर्फ दांत में
कैद कर लेता है पूरा बदन
दर्द दांत का, छेद डालता है
खूनी खंजर के  जख्म जैसे
नाक ,कान ,आँख
ऐठन डाल देता है
गर्दन में …………
झूठ नहीं सच है
दर्द भोगने वाले जानते है 
काया काँप उठती है
अतड़िया तड़प उठती है
दांत के दर्द में …………
छीन जाता है सकून
पेट में भूख का
झोंका उठता रहता है
दांत इजाजत नहीं देते
जब होता है दर्द दांत में ……
होती है तो बस जदोजहद
ज़िन्दगी पतझड़ हो जाती
बसंत में भी
पलके  रिसने लगती  है
जब जब उठता है
दर्द दांत  में …………
सच ऐसे ही दर्द का ,
जीवन हो गया है
हाशिये के आदमी का
स्नेह का झोंका तनिक
सकून दे जाता है
दर्द में कैद  आदमी को …………
उपचार जब  मिल जाता है
बेपटरी ज़िंदगी
पटरी पर दौड़ पड़ती है
काश
भारतीय समाज में
जातिवाद से उपजे
भयावह दर्द का
पुख्ता इलाज हो जाता …………
हाशिये के आदमी का
जीवन हो जाता सफल-समान
दौड़ पड़ता अदना भी
विकास के पथ पर सरपट
जातिवाद रूपी
दांत के दर्द की कैद से छूटकर 
सदियों से जो दर्द
पालथी मार बैठा है
भारतीय समाज में …………
------------.

सुधीर पटेल


आरजू नहीं थी कदमी डूब कर मरने की,
मुझे तो सिर्फ समंदर की गहराईयाँ पूछना था.
टूट सा गया हूँ जीवन की नाकामियों से
तुझसे तेरे जीने का सलीका सीखना था.
चिराग जलाने की तमाम कोशिशें नाकाम रही मेरी
ऐ हवा! मुझे तुझसे कौन सा गले लगना था
किसी ने मिन्नतें तो किसी ने खुशमिजाजी माँगी,
मेरे खुदा मुझे अपने गुनाहों का हिसाब पूछना था...
मुनासिफ था डूबना मेरा इश्क के दरियाँ में
अक्सर उनका हमारी गलियों से जो गुजरना था.
चादरें मजार पर बेहिसाब चढ़ती रही
बाहर किसी बदनसीब शख्स को ठंड से मरना था.
काश थम जाए यही नुमाइश इन सितारों की,
मुझे चाँद को कुछ देर और तकना था.

कांटों के नसीब में कभी गुलाब नहीं आते,
कमबख्त ये अश्क भी बहने से बाज नहीं आते ।
अब कौन समझाए इन नादान ऑखों को,
इनके बहने से पतझड़ में सावन नहीं आते ।
कदमों की आहट से ही जान जाते थे वो कभी,
आज उन्हें दिन के उजालो में हम नजर नहीं आते
मेरे दुश्मनों से मिलती है कुछ फितरत तुम्हारी,
वो भी वार करने सरेआम नहीं आते।
किसी की बख्शीश पर कब तक करोगे गुजारा,
पत्थर उछाले बिना पेड़ो से आम नहीं आते ।
मैं भी गुनाहगार हूँ इश्क में तबाही की,
क्योंकि बन्द घरों में कभी मेहमान नहीं आते।
कुछ कम लोग नहीं इश्क में तबाह यही
न जाने क्यों सबक कोई सीख नहीं पाते।
बेहद खूबसूरत तरीके से लिखा है जज्वातों को,
पर आप मेरे किरदार को कभी निभा नहीं पाते।
ये तो अपने अपने हुनर की बात है मेरे दोस्त,
कुछ गजल तो कुछ शायर को समझ नहीं पाते।

-----------.

अंजली अग्रवाल

जिन्‍दगी उस घड़े का नाम है ॰॰॰॰॰॰
जिसमें डेरो पत्‍थर डालने के बाद पानी ऊपर आता है ॰॰॰॰॰॰
और हम वो पंछी हैं जो आकाश में उड़ते वक्‍त तक तो बड़े खुश रहते है‚
पर प्‍यास लगने पर ये पत्‍थर डालना हमारी परेशानी बन जाती है ॰॰॰॰॰॰

बस थोड़ी सी मेहनत करना है॰॰॰॰॰॰


हम अपने हाथ का सही उपयोग तब कर पाते है‚
जब हमें पता होता है कि हमें इस समान उठाना हैं॰॰॰॰
ठीक उसी प्रकार हम अपने दिमाग का सही उपयोग तब कर पाते है‚
जब हमें यह पता होता है कि हमें क्‍या करना हैं।


एक पंछी के उड़ने में उसकी सबसे बड़ी बाधा हवा हैं ‚
पर सच यह भी है कि हवा के बिना एक पंछी ढंग से उड़ नहीं सकता॰॰॰॰
ठीक उसी तरह मनुष्‍य के जीवन की सबसे बड़ी बाधा ये परेशानियाँ है ‚
पर सच यह भी है कि इन परेशानियों के बिना मनुष्‍य जी भी नहीं सकता॰॰॰॰

जिन्‍दगी की राह में चलते — चलते जब लगे कि थक गयें हैं आप ‚
और थोड़ा रूकने का मन करे‚
तो समझ लेना कि अभी तक तो सिर्फ जिन्‍दा थे आप‚
और अब जीना चाहते हैं आप।

मंजिल उसी को मिलती हैं‚
जिसे रास्‍तों से प्‍यार होता हैं‚
जो दर्द को भी मरहम बना ले‚
कारवां उसी का होता है।
-------------.

मुकेश कुमार


लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


गाथा गायी तेरी अग्नि ने
समन्दर की रेत पर
योंही चलते रहना अब्बा की नाव की तरह
लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


बनकर एक नया जन्म लेना तुम
माँ के त्याग का गुणगान करना
रहकर अब्बा संग तुम परछाई बनना
लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


कलम के कलाम हों तुम
प्रकृति के रखवाले हो तुम
जूही के फूल हो तुम
लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


इंसान के रूप में भगवान हो
कौन कहता हैं भगवान नहीं होते
लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


बताते जाओ मुझे मैं कहा मिलूँ तुम्हें
तुमने कहा था रातों के सपनों में नहीं
दिन के उजाले खुली आँखों के सपनों में
लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


यही इंतज़ार करुँ रामेश्वरम के तट पर
मस्जिद की चादर पर या मन्दिर की गेट पर
लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


कहते हैं की बंज़र जमी में पेड़ नहीं होते
गलत हैं कहने वाले मैंने तो तुम्हें फूल उगाते देखा।
एक आदर्श हों
जो तुम्हारे बताये  पथ पर चलें।
एक शिक्षक हो
जिनसे ये दुनिया सीखी हैं।
लिखना चाहता हूँ कागज़ पर
कलाम तुम्हारे बारे में...
शब्द नहीं हैं मेरे पास


तुम आत्मा हो परमात्मा की
तुम जीवन हो शून्य धरा की
कलम के कलाम हो तुम


मुकेश कुमार
राधाकिशन पुरा, सीकर,
राजस्थान,भारत

---------------.

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