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किनारों की तरह नहीं, दो हाथों की तरह हो ज़िंदगी

स्टीव जॉब्स steve jobs

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

स्टीव जौब्स स्टैन्फोर्ड विश्वविद्यालय के स्नातकोत्सव पर जो भाषण दिया था वह बडा ही हृदयग्राही तथा तथा विचारशील था वह भाषण जीवन की उथल पुथल तथा कठिनाइयों की एक झलक दिखा रहा था जो कि विश्व विद्यालय से स्नातक बने नवयुवकों के लिये एक आवश्यक शिक्षा है क्योंकि स्नातक हो जाने पर वे सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं जैसे उनमें कोई ऐसी विशेषता आ गई है जो कि दूसरे लोगों के पास नहीं है। वह यह नहीं समझ पाते हैं कि जीवन का कार्यक्षेत्र तो बहुत ही विशाल है और वहां स्नातक भी एक साझेदार ही है। उसमें और उसके अन्य साथियों में कोई अंतर नहीं है। यह कार्यक्षेत्र इतना विस्तृत है तथा यहां प्रत्येक कर्मचारी बराबरी का दर्जा रखता है। सफलता का सूत्र कहीं और है।

स्रष्टिकर्ता ने हरेक व्यक्ति को अपरिमित संभावनाएं प्रदान करके इस संसार में भेजा है। स्टीव जौब्स की जीवन गाथा इसका प्रमाण है। यह देख कर अपनी असफलता पर निराश न होकर अपनी अंतरात्मा की आवाज क़ो सुनें और उस पर अपने को ढालते रहें। उद्गारों की यह ख़ास सामग्री किशोरों और युवावस्था की दहलीज़ पर कदम रख रही पीढी के लिए पेश कर रहा हूँ. 

जॉब्स कहते हैं - संसार के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों मे से एक के स्नातकोत्सव पर आप लोगों के साथ होने के सौभाग्य से मैं अत्यंत सम्मानित हुआ हूं। सच बात तो यह है कि मैं कभी किसी कालिज का स्नातक बना ही नहीं और इस कारण मैं पहली बार ही कालिज के स्नातकोत्सव मे शामिल हो सका हूं। मुझे रीड कालिज छः महीने बाद ही छोड़ क़र डेढ साल तक इधर उधर भटकना पडा था और अंत में वहां से विदा ली। मुझे वहां से क्यों छोड़ना पडा। यह कथा तो मेरे पैदा होने से भी पहले शुरू हुई थी। 

मेरी अपनी माता एक अविवाहित युवती थी जो कि कालिज में पढ रही थी। उसने यह तय किया कि कोई मुझे गोद ले ले। पर मेरी माता यह चाहती थी गोद लेने वाले कालिज के ग्रैजुएट ही हों। पता चला कि एक वकील तथा उसकी पत्नी मुझे गोद लेने के लिये तैयार हैं। पर जब मैं पैदा हुआ तो उस समय वे लोग एक लडक़ी को गोद लेने की सोच रहे थे। मेरे माता पिता ने उनसे पूछा - यह तो लडक़ा है क्या आप अब भी उसे गोद लेने के लिये तैयार  हैं तो उन्होंने उत्तर दिया कि हां वे तैयार  हैं। जब मेरी मां को पता चला कि मेरी गोद लेने वाली माता कभी कालिज भी नहीं गई थीं और पिता ने तो हाई स्कूल भी नहीं पास किया था तब मेरी असली माता ने गोद लेने वाले कागजों पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। कुछ दिन बाद वह इसी शर्त पर तैयार हुईं कि मुझे कालिज भेजा जायेगा। मेरा जीवन इस प्रकार शुरू हुआ। और सतरह वर्ष बाद मैं कालिज भेजा भी गया था। 

लेकिन वह कालिज स्टैनफोर्ड की ही तरह बहुत महंगा था और मेरे माता पिता की सारी जमा पूंजी मेरी पढाई पर खर्च हो रही थी। छः महीने में ही मुझे लगा कि यह सारा खर्च व्यर्थ किया जा रहा है क्योंकि मुझे कतई भी यह समझ में नहीं आ रहा था कि जीवन में मैं क्या करूंगा और उसके लिये कालिज की पढाई किस प्रकार लाभप्रद हो सकेगी। अपने माता पिता का सारा धन जो उन्होंने अपने पूरे जीवन में जमा किया है मेरी पढाई में क्यों खर्च किया जा रहा है, इसलिये मैंने कालिज छोड़ने का इरादा कर लिया और यह भरोसा किया कि अंत में सब ठीक ही रहेगा। उस समय तो बडी घबराहट थी पर आज मैं सोचता हूं कि जो भी फैसले मैंने लिये हैं उन सब में यह सबसे अच्छा फैसला था। जैसे ही मैंने यह तय कर लिया तो जिन विषयों पर जोर दिया जा रहा था और वे मेरी रूचि के नहीं थे उन्हें छोड़कर उन विषयों को लेना शुरू किया जो मुझे रूचिकर लगे।

उस समय रीड कालिज में कैलिग्राफी का कोर्स सारे देश में सब से अच्छा माना जाता था। सारे कालिज के पोस्टर और हर दराज पर सुंदर सुंदर लेबिल लगे हुए थे। क्योंकि मैंने अपने कोर्स को छोड दिया था मुझे उन क्लासों में जाना ही नहीं था। अब मैंने कैलिग्राफी की क्लास मे जाना शुरू कर दिया जिससे इस विद्या को सीख सकूं। कैलीग्राफी की विधाओं में मुझे सैरिफ तथा सांस सैरिफ टाइप और विभिन्न शब्दों के बीच की दूरी कितनी हो जिससे टाइप अत्यंत आकर्षक बने यह सीखने का अवसर मिला। इसकी मैंने सारी बारीकियां सीख लीं। मुझे इसमें बहुत ही आनंद आया। यह अनुभव बडा ही सुखद एतिहासिक एवं कला की दृष्टि से विलक्षण था जो कि विज्ञान की पकड क़े भी बाहर लगा।

वैसे उस समय इससे जीवन के किसी व्यवसाय के क्षेत्र में लाभप्रद होने की तो कोई संभावना या आशा नहीं थी। लेकिन दस वर्ष बाद जब हम मैकिनटाश कम्प्यूटर डिजाइन कर रहे थे मुझे इससे बडा लाभ हुआ और मैकिनटाश मे सुंदर-सुंदर अक्षरों के फौंट बना पाए। फिर विंडोज ने भी उसको अपना लिया। संभवतया आज भी यह किसी और कम्पयूटर में नहीं मिल सकते हैं।

यदि मैं कालिज के उस कोर्स को न छोडता तो कैलिग्राफी मे भी नहीं जाता और फिर कम्प्यूटर में ऐसे सुंदर फौंट भी न आ पाते। यह तो अवश्य है कि जब मैं कालिज में था तब इस बात को सोचना भी कि यह मेरे काम आयेंगे असम्भव था। पर अब दस वर्ष बाद यह समझ मे आना आसान है। कोई भी काम जो हम कर रहे हैं कब काम आयेगा इसको तत्काल समझ पाना कठिन है। हां बाद में पीछे की बातें आसानी से समझ मे आ जाती हैं। इस लिये यह विश्वास करके चलना चाहिये कि जो भी काम हम कर रहे हैं भविष्य में काम आएगा। 

वास्तव में किसी चीज मे विश्वास करना आवश्यक है चाहे वह आपकी हिम्मत हो,भाग्य हो, क़र्म हो या जो कुछ भी हो। इससे ही हम में आत्म विश्वास जाग्रत होता है और हम घिसे पिटे रास्ते पर न चल कर नये रास्ते अपनाते हैं। ऐसे सोच विचार ही प्रगति का पथ दिखलाते हैं। 

अंत में बस इतनी-सी बात और - 

नहीं चाहिए मुझे,

दो किनारो सी जिंदगी !

जो साथ रहे,

पर कभी मिल न सकें !!


अगर दे सको तो

दो हाथो जैसा संग दे दो

जिनकी भले हों दो दिशाएँ

मगर जरुरत पड़े तो मुट्ठी बन सकें !!

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डॉ. चन्द्रकुमार जैन

प्राध्यापक,हिन्दी विभाग, दिग्विजय 

पीजी कालेज, राजनांदगांव 

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