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हिंदी दिवस विशेष : हिंदी की धूम

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डॉ. हरीश कुमार

हिंदी दिवस फिर आ रहा है और पूरी धूम में है। आज के बाजारवादी युग में हिंदी का कोई सानी नहीं। आज भारत में भाषा का बाजार छाया हुआ है और हिंदी इसमें सबसे अधिक लोकप्रिय है। चाहे वो किसी देसी विदेशी वस्तु का विज्ञापन हो या अंग्रेजी से अनूदित हिंदी साहित्य का प्रचुर रूप में बढ़ता पाठक। हिंदी हर और छायी है। भारत आज विश्व में एक बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है और इस बाजार में पैठ बनाने के लिए हिंदी आना बड़ा जरूरी है। इस बात को बड़ी बड़ी देसी और विदेशी कंपनिया मान चुकी हैं। अब यह भाषा रोजगार की भाषा बन रही है। सबसे अधिक ख़ुशी की बात यह भी है कि सूचना प्रोद्योगिकी के अंतर्गत इस भाषा के प्रचार और प्रसार पर बहुत काम हो रहा है और इस मामले में विदेशी वेब साइट्स जैसे कि गूगल ,याहू और अन्य मोबाइल कंपनियां महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। हिंदी भाषा को सरल रूप से टाइप करने के लिए गूगल हिंदी इनपुट, स्पीच टू टेक्स्ट आदि फीचर रोज नए नए रूपों में आ रहे हैं। इसी प्रकार संगीत ,टेलिविज़न,मीडिया,फिल्म नाटक आदि क्षेत्रों में कमाई के मौके इस भाषा में ही बढे हैं।

अब जो लोग हर बार हिंदी की दुर्दशा को लेकर हिंदी दिवस पर रोदन करते हैं या सहानुभूति के आंसू बहाते हैं उन्हें ये प्रलाप बंद कर देना चाहिए। भारत में सबसे अधिक हिंदी के समाचार पत्र बिकते हैं और हजारों पत्रकार व् मीडिया कर्मी इस क्षेत्र में रोजगार पा रहे हैं यही नहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी किसी परिचय का मोहताज नहीं। सबसे अधिक टी आर पी पाने वालो में हिंदी चेनलों का नाम ही है। फिल्म और सिनेमा क्षेत्र में तो हिंदी फिल्में सौ सौ करोड़ का बिजनेस कर रही है। विज्ञापन का एक बड़ा बाजार और उसमे काम करने वाले लोगों के लिए हिंदी रोजगार की भाषा नहीं है तो और क्या है ?

अंग्रेजी का अपना बाजार है पर पेंगुइन इंडिया ,ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस ,हिंदुस्तान टाइम्स ,और इंडियन एक्सप्रेस जैसे कई बड़े पुस्तक और पत्र पत्रिकाएं छापने वाले कई हिंदी संसकरण भी छाप रहे हैं। चेतन भगत ,अमिश त्रिपाठी और रोबिन शर्मा को एक बड़ा पाठक वर्ग हिंदी में अनुवादित होने से मिला है। यही हाल अन्य भाषाओं का है। भारतीय ज्ञानपीठ हर साल भारत के अन्य भाषाओँ में लिखे साहित्य को हिंदी में अनूदित करवा रही है। इसका एक बड़ा कारण हिंदी पट्टी में बड़े पाठक वर्ग और बाजार की संभावनाओं से जुड़ा हुआ है।

जीता प्रेस गोरखपुर बंद होने की चर्चाओं पर यह कहना तर्क संगत होगा कि उसके पीछे कुछ और कारण हो सकते हैं पर हिंदी भाषा नहीं। यदि ऐसा होता तो अब भी धार्मिक साहित्य विपुल मात्र में छप रहा है। उसका जरिया बदल गया है। अब बाबाओं का बाजार फैला है जिसमे वो अपना सारा ज्ञान हिंदी में ही प्रचारित कर रहे हैं। बाबा रामदेव के जड़ी ब्यूटी विज्ञान से लेकर अन्य बाबाओं के आध्यात्मिक ज्ञान का सारा भर हिंदी भाषा ही वहन कर रही है। दूसरी बात अमिश त्रिपाठी की शिव ट्राइलॉजी हो या नरेंद्र कोहली का धार्मिक पुस्तकों पर आधारित साहित्य सब अच्छे पाठक बनाये हुए है। इस का एक प्रमाण आप ओन लाइन शॉपिंग और मोबाइल एप्स पर भी देख सकते हैं जहां हिंदी की पुस्तकें बहुत ही आसनी से और उचित मूल्यों पर उपलब्ध है। बाकी इंटरनेट पर ऑनलाइन पत्रिकाओं ,ब्लॉग्स ,पुस्तको और वेब साइट्स का एक बड़ा क्षेत्र पिछले कुछ सालों में बढ़ चुका है। हिंदी भाषा में आप विकिपीडिया भी देख सकते हैं जहां अनेकों सूचनाएँ आप को सहजता से उपलब्ध हो जाती है। व्यापार से लेकर अध्यात्म तक और प्रोद्योगिकी से लेकर साहित्य दर्शन तक हिंदी भारत और विदेशी लोगो को अपने साथ जोड़ रही है। आज रोजगार ने भाषा की सीमाओं को समाप्त कर दिया है फिर भी हिंदी हर राज्य के और हर राज्य में रोजगार करने वालो के मध्य एक केंद्रीय सूत्र का सुलभ माध्यम बनी हुई है।

आप केवल हिंदी को साहित्य के क्षेत्र तक ही सीमित कर या शिक्षा के अंग्रेजी ढांचे में रख कर नहीं तौल सकते। उसका क्षेत्र इन बातों से बहुत ऊपर है। एक सब्जी वाले से लेकर एक बैंक कर्मचारी तक और एक ग्रहणी से लेकर सुषमा स्वराज तक सब हिंदी की महिमा से ओट प्रोत है। अब तो सोनिया गांधी जी भी खूब हिंदी बोल लेती है। यहाँ तक के कॉमेडियन भगवंत मान तक को अपनी बात कहने का सहज माध्यम अब हिंदी ही लग रही है। सनी लियोन से लेकर दशरथ मांझी तक को अभिव्यक्ति हिंदी भाषा से मिल रही है। अब सुबह उठकर हिंदी अखबार और हिंदी समाचार चैनल देखने वालो में सत्तर प्रतिशत भारतीय शामिल है। अंततः इतना कहना चाहूँगा कि हिंदी हिन्दुस्तान की आत्मा है। आत्मा की उपयोगिता और महत्व कभी भी धुंधला नहीं पड़ता

 

डॉ. हरीश कुमार ,

गोबिंद कालोनी ,

गली न -२, गोबिंद कालोनी ,बरनाला ,पंजाब

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