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हास्य-व्यंग्य : सतयुग आ गया है?

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सुदर्शन कुमार सोनी

व्‍यंग्‍य’

सतयुग आ गया है ?

द्वापर , त्रेता , सतयुग के बाद कलयुग चल रहा है । और कलयुग के बारे में कहा जाता है कि यह कई हजार साल और चलेगा इसमें जो हो जाये कम होगा । गाना तो आपने सुना ही होगा कि ’’हे रामचन्‍द्र कह गये सिया से कि ऐसा कलजुग आयेगा हंस दाना चुगेगा और कौआ मोती खायेगा’’। कहते हैं सतयुग में लोग बहुत ईमानदार थे यदि कोई अपने घर के बाहर रात भर के लिये सोना भी रखकर छोड़ दे तो सुबह ’जस का तस’ रखा मिल जाता था । कलयुग की तरह के वाकये नहीं होते थे कि ’अभी ईमानदारी जीवित है’ , वहां केवल और केवल ईमानदारी ही थी अतः उसके मरने व जीने जैसी कोई बात नहीं थी । यदि समाचार उस समय आता होगा तो इस तरह का होगा कि ’एक बेईमान पाया गया मुसाफिर का बैग गायब किला ’ ’बेईमानी आज भी मौजूद है’। और लोग उस पर बहुत अचरज करते होंगे कि बेईमान ये क्‍या होता है , कैसे हमारे बीच है।

कहते है कि सतयुग में हर चीज मुफ्‍त में मिल जाती थी । घी दूध की नदिया बहती थी , भिखारी नहीं होता था । कहते है कि कटोरे का आविष्कार कलियुग में ही हुआ है और इस कटोरे को फिर गरीब देशों ने भी हाथ में उठाना शुरू कर दिया। सतयुग में मुद्रा नाम की चीज नहीं थी । बार्टर ट्रेड ही चलता था एक चीज के बदले दूसरी मिल जाती थी । और जरूरत मंद को तो सब मुफ्‍त मिल जाता था।

कलियुग भी लगता है कि कुछ मामलों में सतयुग की बराबरी कर रहा है , कई चीजें यहाँ मुफ्‍त में मिलती हैं। कह सकते हैं कि यह कलयुग का मनुष्‍य जाति को उपहार है या कि डिस्‍काऊंट जैसे कि ’दो पिज्‍जा लेने पर एक मुफ्‍त’ मतलब जेब दो बार कटवाने पर उसके एक हिस्‍से को सिलने की मुफ्‍त व्‍यवस्‍था ! घोर कलयुग में भी कुछ गुण सतयुग के हैं , रहेंगे ही आखिर यह सतयुग के बाद आया है ? और कलियुग के बाद भी जो युग आयेगा उसमें कुछ गुण इसी तरह कलियुग के रहेंगे ही ।

वैसे हमारे कान खडे़ हो गये हैं मुफ्‍त की बात से ! हर आदमी को मुफ्‍त की चीज ’चीज’ से भी ज्‍यादा अच्‍छी लगती है ।

यह सतयुग नहीं तो क्‍या है , कि एक रूपया किलो में अनाज मिल रहा है , भले ही गरीबों को मिल रहा है , उनका तो कम से कम सतयुग इस मामले में चल रहा है। दिल्‍ली में भी बिजली के मामले में सतयुग आ गया लगता है , 400 वाट बिजली हर परिवार को मुफ्‍त मिल रही है। वैसे कई साल पहले आंध्रप्रदेश में दो रूपये किलो चावल देकर सतयुग के दर्शन करवाये गये थे ।

कलियुग में और भी चीजें मुफ्‍त में मिल रही हैं। आजकल मोबाईल के प्‍लान सेकेंडों में होते हैं बहुत संक्षिप्‍त बात आप पांच पैसे में जो चलन से बाहर है भी कर सकते हैं। कई बार तो एक दो पैसे में लोग मतलब का संदेश देकर फोन बंद कर देते हैं। लेकिन कलियुग क्‍या करे ? बाजारवाद उसका काला पक्ष है वैसे यह पूरा ही काला नहीं है उजला पक्ष यह है कि आपसी प्रतिस्पर्धा में चीजें सस्‍ती हो रही हैं – सबसे ज्यादा सस्ती आदमीयत और मनुष्यता है !

कलियुग में और क्‍या मुफ्‍त में मिल रहा है। यहां भ्रष्‍टाचार का अचार मुफ्‍त मिल रहा है। इसके बिना यहां कोई काम नहीं होता। यहां अखबारों में इतना काम्‍पीटीशन हो गया है कि ये मुफ्‍त मिल रहे हैं काम्‍पलीमेंटरी कापी के रूप में।

मेग्‍जीन के साथ शैम्‍पू के पाऊच मुफ्‍त मिल रहे हैं । यहां बस में ट्रेन में सफर करने पर महिलाओं को बदसलूकी व छेड़छाड़ मुफ्‍त में मिलती है। यहां चैनल खोलने पर दिनभर परिचर्चा व पैनल डिस्‍कसन मुफ्‍त में परोसे जा रहे हैं , उसके बीच में ब्रेक मुफ्‍त में मिलते हैं , विज्ञापन मुफ्‍त में मिलते हैं, विज्ञापनों के भरोसे चैनल मुफ़्त मिलते हैं. यूट्यूब मुफ़्त है, यूट्यूब पर फिल्में मुफ्त हैं।

चुनाव के समय आश्वासन मुफ्‍त में मिलते हैं , कोई चार्ज नहीं लगता है। यहां स्‍कूल में बच्‍चे का एडमीशन करवाने पर कोचिंग संस्‍थान में जाने या ट्यूशन पढ़ने की सलाह मुफ्‍त में मिलती है , यूनिफार्म व किताबें खरीदने की दुकान का नाम व कार्ड मुफ्‍त में विनम्र भाषा में मिलता है ।

दूध के साथ मिलावट मुफ्‍त है , नववधु को दहेज की प्रताड़ना बोनस में मिलती है , दफ्‍तरों में जातिवाद का जहर मुफ्‍त में मिलता है , गांवों में दूध दही की नदिया नहीं बहती छुआछूत व साम्‍प्रदायिकता का ज्‍वालामुखी समय समय पर मुफ़्त आग उगलने लगता है। यहां बाजार में खडे़ होकर तमाशा देखने वालों की विस्‍फोट में जान मुफ्‍त में ले ली जाती है ! कलियुग में न जाने क्‍या क्‍या मुफ्‍त में मिल रहा है लम्‍बी फेहरिस्‍त है। बाकी इस लेख के पार्ट दो में दी जा सकती है, और आप लोग अपने कमेंट के जरिए इस लिस्ट को पूरा कर सकते हैं.

sudarshan kumar soni 

D-37 , Char Imli , bhopal 

462016 , mob. 9425638352  

Email: sudarshanksoni2004@yahoo.co.in

Blog: meethadank.blogspot.in

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