शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

मुक्ति ही है आनंद का स्रोत

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

अन्‍दर और बाहर की विभिन्‍न समस्‍याएं मकड़ी के जाल की तरह आदमी को घेरे रहती हैं।

वस्‍तुतः ये ही वे ताने-बाने हैं जो जीवन के विभिन्‍न प्रकार के आनंद और लक्ष्‍य को बाधित करते हैं और आदमी को अजगरी पाशों में इस कदर जकड़े होते हैं कि वह जीवन के अंतिम क्षणों तक इनसे मुक्त नहीं हो पाता। कई बार इंसान अपने स्‍वभाव और व्‍यवहार के कारण ऐसा हो जाता है उसे अपने आपके मुक्त होने का कभी अनुभव तक नहीं हो पाता है और कई बार बहुत सारे लोग दुनिया के रंग-ढंग और अपने प्रति रूखे स्‍वभाव को देखकर आत्‍मदुःखी हो जाते हैं।

बहुत सी बार हम दुनिया को बदलने के चक्‍कर में लग जाते हैं लेकिन हर बार असफलता ही हाथ लगती है और ऐसे में हम स्‍वयं अपनी असफलता पर कुढ़ने लगते हैं। शरीर के सभी अंग-उपांग, हृदयस्‍थ धमनियां और मस्‍तिष्‍क के सारे के सारे तंतु तभी ठीक ढंग से काम कर पाते हैं जब उन पर किसी भी प्रकार का कोई दबाव नहीं हो, सभी अपना-अपना काम करने के लिए स्‍वतंत्र हों और मर्यादित संचरण में किसी भी प्रकार की कोई सी बाधाएं न हों। ईश्‍वर ने सभी जीवात्‍माओं को स्‍वतंत्र रूप से कार्य व्‍यवहार के लिए स्‍वतंत्र बनाया है लेकिन सभी लोग इसका अनुभव नहीं कर पाते। हर इंसान दो ही प्रकार के झंझावातों के कारण अपने आपको बंधन में होने का अहसास करता है।

एक तो आत्‍महीनता से ग्रस्‍त होकर जीने वाले लोग, जो सब कुछ होते हुए भी किसी न किसी दुर्भाग्‍य, पूर्वाग्रह या दुराग्रह की वजह से अपने आपको हीन समझने लगते हैं और इस कारण अपने आपको किसी न किसी सीमा में कैद कर लिया करते हैं, फिर मरते दम तक ये न बाहर निकलते हैं, न इन्‍हें बाहर निकालने के कोई प्रयास सफल ही होते हैं। ऐसे लोगों पर कितनी ही बार प्रयास किए जाएं, हर बार असफलता ही हाथ लगती है। दूसरी तरह के लोग वे हैं जिन्‍हें अनुकूल माहौल और मनोनुकूल साथियों की कमी होती है और इस वजह से ये लोग बाहरी द्वन्‍द्वों और आक्रमणों से हमेशा घिरे रहते हैं। इन लोगों को अपने सोचे हुए कार्यों या लक्ष्‍य पूरे करने के लिए भी अनुकूल समय प्राप्‍त नहीं हो पाता है और इस कारण से भी अनावश्‍यक दबावों में काम करते रहते हैं।

एक आम इंसान अंदर - बाहर के ढेरों अभावों, द्वन्‍द्वों और समस्‍याओं से जूझता हुआ जीवन भर तनावग्रस्‍त रहता है और कई बार जीवन विषादों भरा अनुभव होता है। आज जिस कदर जमाना तेजी से भाग रहा है, एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर ऊँचा बनने और दिखाने का शगल हावी है उसे देख कर लगता है कि अब चारों तरफ अंधी दौड़ और भागदौड़ ही शेष रह गई है, बाकी सब कुछ स्‍वाहा होता जा रहा है। इन सारे झंझावातों के बीच आदमी को तभी सुकून मिल सकता है जबकि वह अनायास या सायास इन अंदर-बाहर के बंधनों से मुक्ति पाने का प्रयास करे। यह मुक्ति पाना आदमी के बस में ही है। थोड़ा सा प्रयास किया जाए, दृढ़ संकल्‍प शक्ति के साथ काम किया जाए तो कोई मुश्‍किल नहीं है।

हर इंसान के जीवन में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जिनमें वह मुक्ति का अहसास करता ही है। इसे स्‍थायी भाव मान लिया जाए तो कई समस्‍याएं अपने आप खत्‍म हो जाती हैं। हम सभी के जीवन में बहुआयामी बंधनों के कारण से ही तनावों और विषम स्‍थितियों का पैदा होना स्‍वाभाविक और सतत प्रक्रिया हो चुका है। इस स्‍थिति में मन-मस्‍तिष्‍क और शरीर की गति धीमी हो जाती है और इंसान अपनी पूर्ण आयु भी प्राप्‍त नहीं कर पाता है। इन हालातों में पूरी क्षमता से काम करने के इच्‍छुक लोगों को चाहिए कि वे सायास मुक्ति पाने का प्रयास करें और बंधनों के प्रति ज्‍यादा गंभीर न रहें तभी मुक्ति का आनंद प्राप्‍त हो सकता है।

जितना अधिक मुक्त रहने का प्रयास किया जाए,उतना ही सुकून और शांति का अहसास होगा। हम सभी को चाहिए कि आत्‍म आनंद पाने के लिए जीवन्‍मुक्ति का प्रयास करें।

 

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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