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सहयोग का हिंदी दिवस आयोजन

बहुभाषीय साहित्यिक संस्था सहयोग ने अनूठे ढंग से हिंदी दिवस का आयोजन किया और आनलाईन समस्या पूर्ति की विधा को संयोजित किया ।
समस्या पूर्ति साहित्य की पुरानी विधा रही है,संयोजक और संचालक चर्चित कवयित्री पद्मा मिश्रा ने सभी सदस्यों के सम्मुख एक पंक्ति दी" "हिंदी है जन जन की भाषा" "और सभी को इस पंक्ति को लेकर चार या आठ पंक्तियों की एक कविता लिखने की चुनौती दी जिसे सभी ने सफलता पूर्वक पूरा किया।
कुछ कवितायें सुंदर और उल्लेखनीय रहीं जिनमें गीता मुदलियार ने
"एकता का सूत्र बने हिंदी
नूर बने कण कण की आशा
हिंदुस्तान की मन परिभाषा
हिंदी है जन जन की भाषा

से इस सुंदर कार्यक्रम की शुरुआत की तो सदस्यों के उत्साह से प्रभावित होकर नगर के सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार डा बच्चन पाठक सलिल जी ने भी अपनी कविता भेजी
"हिंदी सिखलाती सदियों से
संस्कृति की परिभाषा
इसमें है संतों की वाणी
कवियों नै इसे तराशा

युवा कवि मनोज आजिज अपनी कविता के साथ हिंदी के गौरव की बात करते हैं
गौरव मान बढे अभिलाष
हिंदी है जन जन की भाषा

जयश्री शिवकुमार की कविता शीतल बयार की तरह लगती है जब वह विभिन्नता में एकता की बात करती है ं
मै मलयाली तू बंगाली
तुम गुजराती

डा शीला कुमारी ने प्रेमचंद सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे कवियों लेखकों को याद कर हिंदी के गौरव को सम्मान दिया"""""

इंदिरा तिवारी और डा सरित किशोरी की कवितायें गंभीर चिंतन की ओर प्रेरित करती है
""संस्कृत के कोख सै जनम लिया
संस्कारी मां के आंचल में पलकर
देश प्रदेश घर घर में समृद्ध हुई मैं
हर मन की हूँ आशा

कवि ललन शर्मा ने .हिंदी की वर्तमान स्थिति पर व्यंग्य किया
"""बास के आदेश से
मनाता हूँ पखवारा
पता नहीं हिंदी बेचारी
या मैं बेचारा

युवा कवयित्री कल्याणी कबीर कहती है"
"इसने सहेजा इतिहास को
  सभ्यता के पन्नों को तराशा
भारत मां की है यह आशा

लोकप्रिय एवं गंभीर लेखन के लिए चर्चित प्रेमलता ठाकुर की कविता"
"भाषा मन के भाव बताती
जन जन के मन की यह पाती
हर रिश्तों मैं प्रीत पिरोती
प्रांत प्रांत को नहीं तोड़ती

उदीयमान और लोकप्रिय वीणा पाण्डेय कहती है"
"माटी के कण कण से आशा
सबको जोडे यह अभिलाषा

पेशे से चिकित्सक होते हुए भी भावुक कवयित्री डा आशा गुप्ता लिखती है"""
संवेदना हिंदी में छलकती
सुरभि विश्व में फैली
भारत मां की लाडली बेटी
बनी जनजन की भाषा,,,,,

डा अनीता शर्म ने लिखा "'चली हूँ खोजने फिर वजूद अपना
नई पीढी ने भुलाया मुझे
अपनों ने किया पराया

इन कविताओं में अपनी भाषा के उत्थान के लिए एक ललक दिखाई पडती है । वरिष्ठ कवयित्री आनंद बाला शर्मा ने कोटि कोटि के मन की आशा  ""कहकर हिंदी को अपेक्षित मान दिये जाने का संकेत दिया और अनीता सिंह ने  संस्कृति व एकता से जुडकर हिंदी को राष्ट्रीय भाषा भानने की वकालत की ।अंत में संयोजिका पद्मा मिश्रा ने अपनी रचना प्रस्तुत की"'अक्षर अक्षर भाव सजे हों
कविता कथा प्रवाह भरे हों
सुरभित हो उपवन हिंदी का
हिंदी भारत मां का टीका
विजयी हो गौरव की आशा
हिंदी है जनजन की भाषा

ललन शर्मा ने हिंदी की स्थिति पर व्यंग्य रचना प्रस्तुत की
इंदिरा तिवारी ने अलग ढंग की कविता भेजी। सहयोग ऐसा आयोजन पहले भी हिंदी दिवस पर कर चुका है जिसे पाठकों और सदस्यों की काफी सराहना मिली और प्रिंट मीडिया में भी चर्चित हुआ था। धन्यवाद ज्ञापन मनोज आजिज ने किया ।वरिष्ठ साहित्यकार और पटना विश्वविद्यालय की अवकाश प्राप्त आचार्य डा. वीणा श्रीवास्तव ने इसे एक अभिनव प्रयोग मानते हुए सभी को आशीर्वाद दिया था और सहयोग को बधाई दी।

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