गुरुवार, 17 सितंबर 2015

सड़कों, चौराहों पर नहीं, मन-मन्दिर में करें गजानन की प्रतिष्ठा

 

डॉ0 दीपक आचार्य

 

       आज और आने वाले कुछ दिनों तक हम मंगलमूर्ति भगवान श्रीगणेश के स्मरण, पूजा-उपासना और उत्सवी धूम-धड़ाकों में रमे रहने वाले हैं।

बरसों से हम सब यही करते आ रहे हैं लेकिन इसके असली मर्म को अभी तक समझ नहीं सके हैं। बाह्य उपचारों और उपासनाओं का मर्म यह है कि हम इनके माध्यम से अपने अन्तरतम को शुद्ध-बुद्ध और दिव्य-दैवीय बनाएं और यह तभी संभव है कि जब हम अपने मन मन्दिर में देवी-देवताओं और श्रेष्ठ विचारों की स्थापना करें और उनके अनुरूप जीवन को ढालें।

हम जो कुछ बाहरी तौर पर  करते हैं उसका लक्ष्य यही है कि यह स्थूल से ऊपर उठकर सूक्ष्म का मार्ग प्राप्त करे और हमेशा-हमेशा के लिए दिव्य आनंद की वह भावभूमि प्राप्त हो जो औरों के लिए दुर्लभ है।

गणेशोत्सव की शुरूआत हम सभी लोग गणपति की विभिन्न प्रकार की छोटी-बड़ी मूर्तियों के साथ करते हैं और दस दिन तक मंगलमूर्ति का गुणगान करते हैं, स्तुतियों और मंत्रों का पाठ करते हैं, अनुष्ठान और उत्सवी आयोजनों में रमे रहते हैं।

बरसों से यही सब करते आ रहे हैं मगर दस दिन की धूम के बाद फिर लग जाते हैं दूसरे धंधों और कर्मों में। गणपति की मूर्ति की प्रतिष्ठा का तात्विक  अर्थ यही है कि हम स्थूल पदार्थ मूर्ति के माध्यम से उनके गुणों को अपने भीतर ग्रहण करें, उनकी ऎसी आराधना करें कि मूर्तिमान गणेश सूक्ष्म और दिव्य स्वरूप धारण कर हमारे मन मन्दिर में प्रतिष्ठित हो जाएं।

बाहरी उपचार हम चाहे कितने भी कर लें, भगवान को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करने के लिए मन का निर्मल और मस्तिष्क का शुद्ध होना जरूरी है, नीयत साफ होनी चाहिए और हमारी वाणी तथा कर्म सभी में दिव्यताओं का समावेश हो।

इस परिशुद्धता के बाद ही गणेश या अन्य किसी भी देवी-देवता को हम अपने भीतर प्रतिष्ठित कर सकते हैं। यों देखा जाए तो सभी देवी-देवता पंचभूतों से निर्मित अपने शरीर में विद्यमान हैं लेकिन उनका बोध तभी हो सकता है जब कि इनकी उपस्थिति के स्थान को हम जानें तथा उनके जागरण के लिए पहले खुद का जागरण करें, सभी प्रकार के अंधकारों से अपने आपको मुक्त करें और मन-मस्तिष्क एवं देह को इतना अधिक शुद्ध बना लें कि जिस देवता का आवाहन करना चाहें वह प्रसन्नतापूर्वक अपने भीतर विराजमान होने को तैयार हो।

योग मार्ग के ज्ञानी जन किसी भी देवी-देवता को जानने और पाने के लिए कहीं बाहर की ओर नहीं देखते, वे अपने भीतर ही उनकी तलाश आरंभ करते हैं और वह सब कुछ पा लेते हैं जिसके लिए हम बरसों से बाहरी उपचारों का सहारा लेने के बावजूद आभास तक नहीं कर पाए हैं।

हमारे शरीर के सर्वप्रथम आधार चक्र मूलाधार में ही भगवान श्रीगणेश का स्थान है। इसे जागृत करना योग मार्ग का आरंभिक चरण है और इसकी शुरूआत गणपति आराधना के बिना नहीं हो सकती है क्योंकि सबसे पहले चक्र में वे विराजमान हैं। 

इस परम सत्य को जो जान लेता है उसके लिए गणेश हर पल उसके साथ रहते और अनुभवित होते हैं। बाहरी उपचार और आराधना, पूजा-पाठ, मूर्ति स्थापना आदि हमारी श्रद्धा और भगवान के मूर्तमान स्वरूप को जानने के लिए नितान्त आवश्यक हैं लेकिन हमें वहीं तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उपासना के मर्म को जानकर उत्तरोत्तर आगे बढ़ते रहने की जरूरत है।

बड़े प्रेम और श्रद्धा भाव से मंगलमूर्ति की मूर्तियों की प्रतिष्ठा करें लेकिन साथ में यह भी संकल्प ग्रहण करें कि भगवान गणेश को हम किस प्रकार अपने हृदयाकाश में प्रतिष्ठित कर सकते हैं। इस दिशा में दृढ़ संकल्प के साथ प्रयास आरंभ कर दिए जाने चाहिएं।

गणेश की उपासना और स्तुतिगान ही पर्याप्त नहीं है। उनके स्वरूप और लीलाओं का पठन एवं श्रवण करते हुए उन्हें आत्मसात करने की भी जरूरत है। आजकल गणतंत्र का जमाना है। हर गण अपने आपको गणेश बनाने के लिए इच्छुक तो रहता है लेकिन गणाधीश बनने लायक न तो विचार धारा रखता है, न ऎसे काम करता है।

गण के लिए जो निष्काम भाव से सेवा और परोपकार में जुटा रहता है, गण-गण के विघ्नों का नाश करता हुआ गण की उन्नति के लिए जो काम करता है वही गणों का अधिपति हो सकता है। गण भी सच्चे मन से उसी को अपना नेतृत्व कर्ता यानि की गणाधीश मानते हैं जो उनके लिए मददगार है।

आज इस सत्य को भी जानने की आवश्यकता है। अब तक जो हो गया, कोई बात नहीं। कम से कम इस बार गणेशोत्सव के रंग में डूबते हुए पक्का प्रयास करें कि गणपति महोत्सव के आयोजन का मूल उद्देश्य क्या है, किस प्रकार हम गणपति की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। खुद के या पराये पैसों या चन्दे के पैसों से गणेश मूर्ति की स्थापना कर देना और दस दिन तक उत्सवी धूम तक सिमटे रहने से गणेश की प्रसन्नता नहीं पायी जा सकती। गणेशचतुर्थी हम सभी को बहुत कुछ कहने आयी है। इसके मर्म को समझें और सच्चे मन से गणपति की आराधना करें।

सभी को गणेशचतुर्थी की अनन्त मंगलकामनाएँ ....

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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