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गणपति बप्पा मोरया, इस बरस इको फ्रेंडली आ

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गणपति बप्पा हर बरस आते हैं. जल्द ही वे आने वाले हैं. मगर साथ में लाते हैं तमाम प्रदूषण. गणेशोत्सव में होती हैं चहुँओर बजने वाले हजारों वाट के डीजे से निकलने वाले ध्वनि प्रदूषण और चहुँओर बिकती हैं जहरीले रंगों से रंगी पीओपी की बनी गणपति बप्पा की मूर्तियाँ जो हमारे तालाबों और नदियों को अच्छा खासा प्रदूषित करती हैं. स्वयं गणपति बप्पा कभी भी ऐसा नहीं चाहते होंगे, मगर भक्तों को अकल आए तो आखिर कैसे?

खैरियत यह है कि बहुत से भक्तगण अब जागरूक भी हो रहे हैं. नीचे की खबर दिल में सुकून पैदा करती है -

सिर्फ इको फ्रेंडली नहीं इंदौर में बन रहे है इको प्लस  शास्रोक्त गणपति, युवाओं ने की अनूठी पहल

मन्त्रों के बीच आकार ले रहें है माटी के गणेश, इंदौर के युवाओं ने की अनूठी पहल
  मिट्टी में 56 औषधियों के अर्क से बन रहे है माटी के गणेश । इको फ्रेंडली भी और शास्त्रौक्त भी। 

इंदौर । इस बार आप चाहे तो सिर्फ इको फ्रेंडली नहीं बल्कि शास्त्रौक्त सामग्री और विधि से मंत्रौच्चार के बीच बने माटी के  गणेश से  गणेशोत्सव मना सकते है। गणेशोत्सव को प्रकृति,पर्यावरण और परंपरा को जोड़कर  इंदौर के दो युवाओं ने एक अनूठी पहल की है। माटी गणेश के नाम से इको फ्रेंडली और शास्त्रौक्त गणपति का कांसेप्ट देने वाले रौनक और रचित खंडेलवाल नामक इन युवाओं का कहना है कि  इस तरह का प्रयोग देश में पहली बार हो रहा है शास्त्रौक्त ढंग से माटी की मूर्तियां बनाने के लिए एक तरफ वेद और शास्त्र के विद्वानों का मार्गदर्शन लिया जा रहा है तो दूसरी तरफ देश के विख्यात पर्यावरणविदों की देखरेख में  मूर्तियों को 100 फीसदी इको फ्रेंडली बनाया  जा रहा है.   

 मिट्टी में मिलाया है 56 औषधियों का अर्क,मंत्रौच्चार के बीच बनी है मूर्तियां ।

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  रौनक बताते है कि माटी ग़णेश प्रतिमाएं बनाने के पहले हम लोग वेद, पुराण और शास्त्रों के ज्ञाता, संस्कृत कालेज के प्राचार्य डा. विनायक पांडेय जी,  पर्यावरणविद पद्मश्री कुट्टी मेनन साहब और चित्रकार शुभा वैद्य के मार्गदर्शन से इसकी शुरुआत हुई ।डा. पांडेय और संस्कृत कालेज के अन्य विद्वानों ने प्रतिमाएं बनाने का शास्त्रीय विधान बताया. उनके मार्गदर्शन में मित्टी में गाय का गोबर, पांच पवित्र नदियों का जल,  सात तीर्थों की मिट्टी, पंच गव्य, पंचामृत, दूर्वा सहित कुल 56 औषधियों के अर्क को मंत्रों से अभिप्राणित कर मिलाया गया। मिट्टी गूंथने से लेकर आकार लेने तक  24 घंटे गण्पति के बीजमन्त्र चलते रहे  ताकि मंत्र के पाजीटिव वाइब्रेशन मूर्ति में समा सके. मूर्ति बनाने में केमिकल का उपयोग ना करने की शर्त के कारण ही इन पर कोई  रंग नहीं किया गया है ये मिट्टी के प्राकृतिक रंग में उपलब्ध कराई कराई जाएंगी. उनके मुताबिक शास्त्रों में भी गणपति पर रंग करने का कोई विधान नहीं है.

एक बाल्टी पानी में होंगे विसर्जित, पानी  पौधों में डालने से बढ़ेगी ग्रोथ 
रौनक के मुताबिक़ मिट्टी की बनी इन  मूर्तियों का विसर्जन बहुत आसान होगा और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की जगह पोषित करेगा।  माटी गणेश प्रतिमा को  एक बाल्टी कुनकुने पानी में डालने पर  पूरी प्रतिमा लगभग डेढ़ से दो घंटे में पानी में घुल जाएगी। वे इस पानी को बहाने की जगह इसे घर के किसी पौधे में डालने की सलाह दे रहें है। मूर्ति में मिली औषधियों और मन्त्रों के कारण इस पानी से पौधे का विकास बहुत तेजी से होगा।

आनलाइन करेंगे बुकिंग 

इस विचार को लोगों तक पहुंचाने के लिए ये दोनों युवा सोशल मीडिया और इंटरनेट का उपयोग करने की योजना बना रहे है. रचित के मुताबिक सिस्ट्मेटिक्स नामक एक साफ़्ट्वेयर कंपनी के युवा एग्जीक्यूटिव अविचल रावत ने इस प्रोजेक्ट के लिए अपने साथियों की मदद से www.matiganesh.com के नाम से एक प्लेटफार्म बनाया है. लोग इस साइट पर आकर ये मूर्तियां खरीद सकते हैं. उनके कुछ दोस्त मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया की एक फिल्म भी बना रहे है.

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