विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

गीता दुबे की कहानी - एक अलौकिक रिश्ता

image

एक अलौकिक रिश्ता

- गीता दुबे

मानसून की रिमझिम बारिश...धान के लहलहाते खेत... किसी के हाथ में छाता तो कोई बरसाती में...और जिसके पास ये दोनों नहीं हैं वह किसी तरह अपने शरीर को किसी कपड़े या फिर बोरे से बचाता- ढँकता...बारिश में आते- जाते लोग... अमेरिका में रह रहे राजीव को भारत के ये बारिश के दिन याद  कर एक सुखद अनुभूति होती...  शायद इसीलिए वह प्रत्येक वर्ष बरसात के मौसम में ही भारत कुछ दिनों के लिए आया करता. फिर वर्षा ऋतू आई और वह भारत जाने की तैयारी करने लगा, उसने कपड़े सूटकेस में रखते हुए आलोक से पूछा—

‘बोल क्या लाऊंगा तेरे लिए इण्डिया से’

‘कुछ नहीं चाहिए मुझे इंडिया से’... वहाँ मेरा है ही कौन...और मुझे तेरी तरह वहाँ के धान के लहलहाते खेत वेत अच्छे नहीं लगते... बारिश में चाय के साथ पकौड़ा वकौडा... ये सब भूल जा... अब इंडिया वैसा नहीं रहा... बारिश में लोग चाय- पकौड़ा नहीं, बर्गर, पिज्जा.. ए. सी. में बैठकर खाते हैं और खिड़की से ही बारिश का मजा लेते हैं ... मुझे तो अपना अमेरिका ही प्यारा लगता है... मुझे तो यहाँ के धान के खेत ही अच्छे लगते हैं... मेरा घर तो अमेरिका ही है.

    राजीव और आलोक बचपन के दोस्त थे या यूँ कह लीजिए दाँत काटी रोटी थे और पड़ोसी भी थे. राजीव की उम्र दो वर्ष की रही होगी जब आलोक उसके पड़ोस में रहने आया था. आलोक के पिता का अपना बिजनेस था...आमदनी बहुत थी.. लेकिन अपने काम से उन्हें घर के लिए फुर्सत नहीं मिलती... फुर्सत मिलती भी तो उसे वह अपने दोस्ती यारी में बिताना ज्यादा पसंद करते, घर से बस सोने तक का वास्ता था, वहीँ राजीव कुल चार भाई-बहन थे और उसके पिता एक मामूली क्लर्क थे लेकिन ऑफिस से लौटने के बाद उनका पूरा समय अपने घर- परिवार के लिए ही होता था. मोहल्ले  में हुई हरेक छोटी- बड़ी घटनाओं की चर्चा करना, अपने बच्चों को पढ़ाना.. बच्चों के दोस्तों में भी दिलचस्पी रखना... सम्पति के नाम पर बस बच्चे ही थे उनके पास. इत्तिफाक से दोनों दोस्त आलोक और राजीव पढ़ने में अच्छे निकल गए और उन्होंने आई. आई. टी. से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर अमेरिका की एक कंपनी ज्वाइन कर ली. पिछले सात सालों से वे वहीँ रह रहे थे लेकिन इन सात सालों में जहाँ राजीव प्रत्येक वर्ष एक महीने इंडिया में बिताना पसंद करता था वहीँ आलोक अपनी लगन और मेहनत की बदौलत अमेरिका में अपनी सॉफ्टवेयर की एक कंपनी खोलकर वहाँ अपनी एक पहचान बना ली थी.

    राजीव की फ्लाईट लॉस-एंजिल्स से दिल्ली तक की थी. आलोक उसे एअरपोर्ट छोड़ वापस घर आ चुका था... आज उसे अपनी माँ की बहुत याद आ रही थी... जब वह अमेरिका पहली बार आया था तो घर से दूर रहना उसे बहुत खलता, वह भी राजीव की तरह प्रत्येक वर्ष भारत जाया करता था... लेकिन ऐसा बस दो वर्ष ही चल पाया था ... माँ के निधन के बाद वह टूट चुका था... वह भारत आना नहीं चाहता था.. वह किसके लिए भारत आता... परिवार के नाम पर बस एक उसका पिता ही  तो था लेकिन उसे वह कोई दूर का व्यक्ति लगता था.... जिसे बस वह जानता भर  है... उसे आज भी याद है, जब वह आठवीं में था तब उसे टायफायड हो गया था, दो महीने तक वह बिस्तर पर से उठा नहीं था.. काफी कमजोर हो गया था.. माँ तो हमेशा उसके साथ रहती लेकिन पापा! वे तो इन दो महीनों में कभी उसके पास तक नहीं आए! हाँ उसने पापा को माँ से यह कहते हुए जरुर सुना था कि इसे कोई अच्छे डॉक्टर से दिखाओ. उसने राजीव के घर पर देखा था कि यदि राजीव या उसके किसी भाई-बहन को सर्दी-खाँसी भी हो जाती तो उसके पापा ऑफिस से छुट्टी ले लेते लेकिन अपने पापा का बर्ताव वह सहन नहीं कर पाया...एक बार वह अपनी माँ से पूछ बैठा था...

‘माँ क्या पापा मुझे बिलकुल पसंद नहीं करते’...

इसपर माँ ने हंस कर जवाब दिया था... ‘नहीं रे अपना बिजनेस है न, नौकरी तो नहीं करते तुम्हारे पापा इसलिए घर पर नहीं रह पाते’..वे रोज रात में जब तू सो जाता है...आकर तेरे पास बैठते हैं, तुझे सहलाते हैं... लेकिन आलोक के मन में यह बात बैठ गई थी कि उसके पापा उसे नापसंद करते हैं.

     कुछ दिनों बाद राजीव वापस अमेरिका चला आया, आकर उसने आलोक को भारत के बारे में बहुत कुछ बताया और इन्तजार करता रहा कि आलोक अपने पापा का हाल- समाचार जरुर पूछेगा लेकिन पूरे दो दिन बीत गए उसने कुछ नहीं पूछा. अंत में राजीव को आलोक से कहना पड़ा-

‘मैं तेरे घर भी गया था’

आलोक ने बस यूँ ही पूछ लिया था—

‘कैसे हैं सब वहाँ.. किसी ने मेरे बारे में पूछा क्या?’

‘हाँ यार अंकल तुम्हे बहुत याद कर रहे थे... उन्होंने मुझे देखते ही मुझसे पूछा.. कैसा है मेरा बेटा? आंटी के चले जाने के बाद उन्होंने बिजनेस देखना ही छोड़ दिया.. बिल्कुल अकेले हो गए थे..एक माइल्ड हार्ट-अटैक भी हुआ था.. पिछले साल उन्हें पक्षाघात हो गया था जिससे उनके शरीर का दाया हिस्सा बहुत प्रभावित हुआ ऊपर से तुम्हारे आशीष चाचा ने तो हद ही कर दी.. उन्होंने तो अंकल को मृत घोषित कर सारी जायदाद अपने नाम करवा ली.. अब अंकल बस एक कमरे में चुपचाप पड़े रहते हैं और उनकी आखें किसी के आने का इन्तजार करतीं रहतीं हैं...आलोक चुपचाप सब सुनता रहा... फिर उसने लैपटॉप ऑन किया और भारत जाने के लिए अपनी टिकट बुक करवाई. आलोक को अचानक वहाँ देख उसके आशीष चाचा के तो होश ही उड़ गए. आलोक सीधे अपने पापा के कमरे में पहुँचा..सत्रह वर्ष बाद एक पिता और एक पुत्र मिल रहे थे..वक्त भी कुछ देर के लिए ठहर गया था..पिता में न जाने कहाँ से इतनी उर्जा चली आई कि वे उठ बैठे और मारे खुशी से उनकी आखें भर आईं.. कहने लगे.. अरे भई कोई है.. मेरे बेटे के लिए मिठाई ले आओ... मेरा बेटा आया है...मेरा बेटा आया है... सत्रह सालों बाद आज किसी ने आलोक को इतना खुश देखा था.. आज कुदरत भी खून के इस अलौकिक रिश्ते को खड़ा देख रहा था.  

गीता दुबे

                                                          

गीता दुबे 

                                                           

जमशेदपुर 

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget