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अंग्रेजी हग, हिन्दी अंकवार

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डॉ. रामवृक्ष सिंह

अपने देश में बहुत लम्बे समय से लोगों को गले लगाकर मिलने का रिवाज़ रहा है। यह परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। महाभारत में अंधे धृतराष्ट्र भीम को गले लगाने के लिए आगे बढ़ते हैं तो उनकी मंशा भांपकर उनके आगे भीम का पुतला बढ़ा दिया जाता है। रामायण में राम और सुग्रीव, राम और भरत आदि के गले मिलने के प्रसंग आते हैं। हनुमान चालीसा में लिखा है- सहस वदन तुम्हरो जस गावें। अस कहि श्रीपति कंठ लगावें। भगवान राम ने विभिन्न प्रकार से हनुमानजी की प्रशंसा की और भी फिर उन्हें गले लगा लिया।

विदाई और मिलन, दोनों ही अवसरों पर अंकवार भरकर गले मिलना विशुद्ध भारतीय परंपरा है। इसमें कोई संदेह नहीं। यह एक मनुष्य के दूसरे मनुष्य के प्रति प्रगाढ़ अनुराग का प्रतीक है। अंकवार भरकर मिलने का अर्थ है, अपने अहं को बिसराकर पूरी तरह दूसरे के अहं में, उसके व्यक्तित्व में, उसके प्रेम में विसर्जित कर देना। हिन्दुओं में ही नहीं, मुसलमानों में भी यह परम्परा खासी गहराई तक पैठी हुई है। इसीलिए ईद के मौके पर मुसलमान भाई एक दूसरे के गले मिलते हैं। होली के मौके पर उत्तर भारतीय लोग बरसों पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं। अपने यहाँ शादियों में भी मिलना होता है। समधी लोग गले मिलते हैं और एक-दूसरे को उपहार देते हैं।

पुरुष ही नहीं, अपने यहाँ महिलाएं भी गले मिलती हैं। गाँवों में महिलाएं परस्पर गले मिलकर भेंटती हैं। एक नहीं तीन बार। इसी प्रक्रिया में कई महिलाएं रो-रोकर अपने हृदय के उद्गार भी व्यक्त करती हैं। हमने अपनी माँ को मौसी से और नानी से गले मिलते देखा है। दादी से गले मिलते नहीं देखा, क्योंकि अपने देश की सास हमेशा अपनी बहू के लिए तलवार निकाले खड़ी रहती है, और हमारी दादी भी इस परंपरा का अपवाद नहीं थी। गले मिलने में ही कई बार धोखा भी होता है। धृतराष्ट्र ने भीम के साथ यही करना चाहा। मुगलकाल में शिवाजी ने अपने शत्रु को ऐसे ही मार डाला था। एक दिलजले शायर ने ऐसे ही वाकयों को देखकर लिखा है- कोई हाथ भी न मिलाएगा, जब गले मिलोगे तपाक से। ये हादसों का शहर है, यहाँ फासले से मिला करो।

हिन्दी साहित्य में आधुनिकता का सन्निवेश करनेवाले बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा भी- विदा के समय सब गले लगावें। लब्बो-लुआब यह कि अंकवार भरकर मिलने की परंपरा अपने यहाँ सदियों से रही है। इसमें कोई संदेह नहीं। मज़े की बात यह है कि भारत में सदियों से रहती चली आती इस परंपरा के लिए अब हमारी हिन्दी में प्रचलित शब्दों को भुलाकर लोग अंग्रेजी शब्द ‘हग’ का इस्तेमाल करने लगे हैं, जो हिन्दी में बहुत भदेस अर्थों में इस्तेमाल होता है। आज यदि कोई किसी को गले लगाता है, या अंकवार में भर लेता है (इसे भोजपुरी भाषी अँकवार कहते हैं) तो थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जाननेवाले लोग भी कहते हैं उसने मुझे हग किया, या उसने मुझे हग दिया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि हग शब्द हिन्दी प्रान्तों में शौच या विष्ठा के लिए इस्तेमाल होता आया है। अंग्रेजी में हग का अर्थ है गले लगाना या किसी को बिलकुल सटाकर बाँहों में भर लेना। इसीलिए शिशुओं और छोटे बच्चों तथा शौच एवं मूत्र-विसर्जन क्रिया पर नियंत्रण खो बैठे वृद्धों के पहनने के लिए निर्मित लंगोट (डायपर) के एक ब्रांड का नाम है हगीज, यानी जो शरीर से चिपका रहे। शुद्ध हिन्दी भाषा के नज़रिए से देखें तो उसका अभिप्राय हुआ, जिसमें शिशु अथवा निशक्तजन शौच कर सकें।

हिन्दी में हगना क्रिया का इस्तेमाल गर्हित अर्थों में शौच करने के लिए होता है। हिन्दी में बहुत-सी कहावतें और मुहावरे इस क्रिया को लेकर बनाए गए हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

जब दरवाज़े आई बारात, तो समधी को लगी हगवास- यानी समय-कुसमय का विचार किए बिना कोई ऐसा काम करने चल देना, जिसका उस समय कोई औचित्य न हो और जिसकी वज़ह से कोई बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य बाधित हो जाए।

हगकर लीपना- यानी कोई गंदगी मचा देना और फिर उसे और बढ़ाते जाना। आम तौर पर गंदगी दिखने पर उसपर मिट्टी डाली जाती है, किन्तु यदि कोई गंदगी को पसंद करे और गंदगी फैलाने में ही उसकी रुचि हो, तो उसे हगकर लीपना कहा जाता है।

गाँवों में किसी को गुस्सा आता है और कुछ नहीं सूझता तो वह चिल्ला कर कहता है- मारूँगा हग दोगे। गाँवों और मलिन बस्तियों में लोग शौच के लिए प्रायः बाहर मैदान में जाते हैं। ऐसे क्षेत्र तयशुदा होते हैं, जहाँ पूरे गाँव के मल-विसर्जन के कारण बहुत गंदगी होती है। इसे हिन्दी में हगनहट कहते हैं।

इस प्रकार यह निर्विवाद सच है कि हिन्दी में हगने का अर्थ वैसा नहीं है, जैसा अंग्रेजी में है। इसके बावज़ूद गले लगाने, झप्पी पाने, अंकवार या अँकवार में भरने, बाहु-पाश में लेने, बाहों में भरने जैसे तमाम पर्यायों के होते हुए भी हम इतनी प्यारी मानवीय क्रिया के लिए हग देने या हग लेने जैसे भदेस शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं। क्या हमारे खुद के शब्द मर रहे हैं?

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डॉ. रामवृक्ष सिंह

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