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स्मृति शेष : वीरेन डंगवाल

कवि वीरेन डंगवाल - संस्मरण

कवि वीरेन डंगवाल नहीं रहे.

विष्णु खरे ने वीरेन डंगवाल को याद करते हुए श्रद्धांजलि स्वरूप अपने संस्मरण में लिखा  - हमारे जमाने का एक अद्वितीय बड़ा कवि चला गया. मंगलेश डबराल ने श्रद्धांजलि दी - एक अपराजेय का  जाना.

अनिल यादव ने बीबीसी के पन्ने पर उन्हें बेतरह याद किया - जिंदगी से छलकता आदमी और कवि वीरेन डंगवाल.

फ़ेसबुक में नीलाभ इलाहाबादी (https://www.facebook.com/neelabh.1945) ने वीरेन की इन कविताओं को पोस्ट कर श्रद्धांजलि दी -

दो कविताएं जो वीरेन के लिए लिखी थीं
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एक दिन इसी तरह
(वीरेन के लिए)

एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल के भीतर
या कविता की किताब के पन्नों में दबा
तुम्हारा ख़त बरामद होगा

मैं उसे देखूंगा, आश्चर्य से, ख़ुशी से
खोलूंगा उसे, पढ़ूँगा एक बार फिर
कई-कई बार पढ़े पुरानी बातों के कि¤स्से

तुम्हारी लिखावट और तुम्हारे शब्दों के सहारे
मैं उतर जाऊँगा उस नदी में
जो मुझे तुमसे जोड़ती है
जिसके साफ़-शफ़्फ़ाफ़ नीले जल में
घुल गयी हैं घटनाएँ, प्रसंग और अनुभव
घुल गयी हैं बहसें और झगड़े

एक दिन इसी तरह किसी फ़ाइल में
किसी किताब के पन्नों में
बरामद होगा तुम्हारा ख़त

मैं उसे खोलूंगा
झुर्रीदार हाथों की कँपकँपाहट के बावजूद
आँखों की ज्योति मन्द हो जाने पर भी
मैं पढ़ सकूंगा तुम्हारा ख़त
पढ़ सकूंगा वे सारे ख़त
जो तुमने मुझे लिखे
और वे भी
जो तुमने नहीं लिखे

एक दिन इसी तरह
तुम्हारा ख़त होगा: और मैं

1986

मित्रताएँ

मनुष्यों की तरह
मित्रताओं का भी आयुष्य होता है

यही एक रिश्ता है
बनाते हैं जिसे हम जीवन में
शेष तो जन्म से हमें प्राप्त होते हैं
भूल जाते हैं लोग सगे-सम्बन्धियों के नाम
मित्रों के नाम याद रहे आये हैं

मित्रताओं का भी आयुष्य होता है
मनुष्यों की तरह
कुछ मित्रताएँ जीवित रहीं मृत्यु के बाद भी
आक्षितिज फैले कछार की तरह थीं वे
मिट्टी और पानी का सनातन संवाद
कुछ मित्रताएँ नश्वर थीं वनस्पतियों की तरह
दिवंगत हुईं वे
जीवित बचे रहे मित्र
2004

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शंभूनाथ शुक्ल ( https://www.facebook.com/shambhunaths ) ने वीरेन दा को कुछ यूँ याद किया -

वीरेन डंगवाल यानी वीरेन दा को मैने सदैव एक बड़े पत्रकार के रूप में देखा। यकीनन वे बहुत अच्छे कवि रहे होंगे पर मैने उनमें सदैव एक बड़े पत्रकार और बेहतर इंसान की छवि देखी। पहली बार जब मैं उनसे मिला था तब वे कानपुर में अमर उजाला के संपादक थे और उन्होंने कानपुर में अपेक्षाकृत नये आए अखबार अमर उजाला को जन-जन तक पहुंचा दिया था। उनके बाद कानपुर अमर उजाला में प्रदीप कुमार संपादक रहे और प्रदीप जी के जाने के लगभग छह महीने बाद मैं कानपुर में अमर उजाला का संपादक बन कर गया। तब अखबार के प्रबंध निदेशक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी ने मुझसे कुछ कहा तो नहीं था लेकिन मैने लक्ष्य निर्धारित किया कि अखबार को उस ऊँचाई तक पुन: पहुंचाना जहां पर उसे वीरेन दा छोड़ गए थे। इसलिए मैने अखबार का प्रसार बढ़ाने हेतु काफी कुछ वीरेन दा की ही लाइन पकड़ी। नतीजा आशा के अनुरूप ही रहा और अखबार मात्र छह महीने में ही फिर वहीं पहुंच गया। कुछ दिनों बाद हमारे कानपुर कार्यालय के एक रिपोर्टर रजा शास्त्री की शादी फतेहपुर जिले के खागा कस्बे के पास गंगा किनारे एक गांव में हुई। मेरे वहां जाने का एक मकसद वीरेन दा से मिलना था क्योंकि मुझे बताया गया था कि वीरेन दा वहां पर इलाहाबाद से आएंगे। वे आए और आते ही मुझे गले लगा लिया बोले- 'शंभूजी आपसे यही उम्मीद थी'। हमारे युग के एक महान पत्रकार का आकस्मिक और असमय काल कवलित हो जाना दुखद है और तब तो और भी जब वे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से अपनी हिम्मत और बहादुरी से लड़े और जीतकर निकले थे। वीरेन दा की मृत्यु पर मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

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कृष्ण कल्पित (कल्बे कबीर https://www.facebook.com/krishna.kalpit )  के कीबोर्ड से श्रद्धांजलि की कविता छलक पड़ी -

'वह लोग तुमने एक ही शोख़ी में खो दिये
पैदा किये थे चर्ख ने जो ख़ाक छानकर !'
‪#‎अलविदा_वीरेन_डंगवाल_1947_2015‬.
अग्नि जलेगी आप से तू सोमपान कर
फिर कर सुरत-निरत वृहद्-सामगान कर
धरनी पड़ेगी एक दिन ऐसा ही मानकर
सोजा अभी तो तू उसी चादर को तानकर ! 

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कोई सात साल पहले, कुमार मुकुल ने वीरेन पर संस्मरण लिखा था - हिन्‍दी कविता में जो कुछ प्‍यारे से लोग हैं उनमें एक हैं - वीरेन डंगवाल.

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