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उर्दू हास्य कहानी - सवेरे जो कल आँख मेरी खुली

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ए० एस० बुखारी 'पतरस '

गीदड़ की मौत आती है, तो शहर की ओर दौड़ता है। हमारी जो शामत आयी, तो एक दिन अपने पड़ोसी लाला कृपाशंकर जी ब्रह्मचारी से प्रसंगानुसार कह बैठे कि, ' 'लाला जी परीक्षा के दिन निकट आते जाते हैं, आप प्रभात के समय जाग उठते हैं, जरा हमें भी जगा दिया कीजिए। ''

वे महोदय भी, मालूम होता है, इन्हीं शब्दों के भूखे बैठे थे। दूसरे दिन उठते ही उन्होंने ईश्वर का नाम लेकर हमारे दरवाजे पर, मुक्काबाजी आरंभ कर दी। कुछ क्षण तक तो हम समझे कि स्वप्न-जगत में हैं। अभी से क्या चिंता है। जागेंगे तो प्रत्येक लाहौल पड़ लेंगे-प्रायश्चित कर लेंगे, परंतु यह गोला-बारी क्षण-प्रतिक्षण तेज होती गयी और श्रीमान! जब कमरे की चाबी लकड़ी की दीवारें कांपने लगीं, सुराही पर रखा हुआ गिलास तरंग की तरह बजने लगा और दीवार पर लटका हुआ कलैण्डर पेण्डुलम की भांति हिलने लगा, तो मुझे अपने जागरण पर विश्वास करना ही पड़ा, किंतु अब दरवाजा है कि लगातार खटखटाया जा रहा हे। मैं क्या मेरे पूर्वजों-दादा, नगड़-दादा-की रूहें और मेरा सोया हुआ भाग्य तक जाग उठा होगा। बहुतेरी आवाजें देता हूं.. .अच्छा... .अच्छा... थैंक यू! जाग गया हूं.. .बहुत अच्छा! आपने कृपा की.... धन्यवाद। लाला जी हैं कि सुनते ही नहीं, प्रभु! किस विपत्ति का सामना है? ये सोते को जगा रहे हैं या मुर्दे को जिला रहे हैं? और महामान्य ईसा भी तो बस उचित रूप से हल्की-सी आवाज में कुम' उत्तिष्ठ कह दिया करते होंगे। जी उठा तो जी उठा, नहीं तो छोड दिया। कोई मुर्दे के पीछे लट्ठ लेके पड़ जाया करते थे! तोपें थोड़ी दारा करते थे? यह तो भला हम से कैसे हो सकता था कि उठकर दरवाजे की चटखनी खोल देते? इससे पहले, कि बिस्तरे से बाहर निकलें, दिल को कितना समझाना-बुझाना पड़ता है। इसका अनुमान कुछ रसिक मनीषी कर सकते हैं। अंत में जब लैम्प जलाया और उनको बाहर से रोशनी नजर आयी, तो तूफान थमा।

अब तो यह खिड़की में से आकाश को देखते हैं, तो जनाब! सितारे जगमगा रहे हैं। सोचा कि आज पता चलाएंगे, यह सूरज आखिर किस तरह से निकलता है, परंतु जब घूम-घूमकर खिड़की में से और झरोखे में से चारों ओर देखा और गुरुजनों से प्रभात की जितनी निशानियां सुनी थीं, उनमें से एक भी कहीं दिखायी न दी, तो चिंता-सी लग गयी कि आज कहीं सूर्य-ग्रहण न हो? कुछ समझ में न आया, तो पड़ोसी को आवाज दी।

' 'लाला जी!... .लाला जी....। ''

जवाब आया- ' 'हूं। ''

मैंने कहा- ' 'आज यह क्या बात है, कुछ अंधेरा-सा है?''

कहने लगे....' 'तो और क्या तीन बजे ही सूर्य निकल आएगा ?' '

तीन बजे का नाम सुनकर होश गुम हो गये। चौंककर पूछा, ' 'क्या कहा तुमने? तीन बजे हैं?''

कहने लगे....' 'तीन... .तो... .नहीं... .कुछ सात... साढ़े सात मिनट ऊपर तीन हैं। ''

मैंने कहा....'' अरे कमबख्त, खुदाई फौजदार, बदतमीज कहीं के मैंने तुमसे यह कहा था कि सुबह जगा देना या यह कहा था कि सिरे से सोने ही न देना ? तीन बजे जागना ही शराफत है? हमें तूने कोई रेलवे गार्ड समझ रखा है? तीन बजे हम उठ सकते, तो इस समय पूज्य दादा के अनन्य प्रिय न होते? अबे मूर्ख कहीं के, तीन बजे उठ के हम जीवित रह सकते हैं? धनी बाप के बेटे हैं, कोई मजाक है?''

दिल तो चाहता है कि अहिंसा और हिंसा दोनों को तिलांजलि दे दूं परंतु फिर ख्याल आया कि मनुष्य मात्र के सुधार का ठेका कोई हमीं ने ले रखा है। हमें अपने काम से मतलब लैम्प बुझाया और बुड्‌बुड़ाते हुए फिर सो गये।

और फिर दैनन्दिन की भांति अत्यंत संतोष-शांति के साथ भले आदमियों की तरह दस बजे उठे। बारह बजे तक मुंह हाथ धोया और चार बजे चाय पीकर ठंडी सड़क की सैर को निकल गये।

सायं के समय वापस होस्टल में पहुंचे। जवानी का जोश तो है ही, इस पर सायं का अरमान भरा समय। पवन भी मंद-मंद चल रही थी। मन भी जरा मचला हुआ था! हम जरा तरंग में गाते हुए कमरे में दाखिल हुए-

' 'बुलाएं जुल्फिजानां1 ' की अगर लेते तो हम लेते। ''

1. प्रेमिका की अलकें।

कि इतने में पड़ोसी की आवाज आयी-

' 'मिस्टर!''

हम उस समय जरा चुटकी बजाने लगे थे। बस उंगलियां वहीं की वहीं रुक गयीं और कान आवाज की ओर लग गये। वे बोले, ' 'यह आप गा रहे हैं?'' (जोर ' आप' पर)।

मैंने कहा- '' अजी मैं किस योग्य हूं हां आप कहिए। ''

बोले- ' 'जरा... .देखिए मैं... .मैं डिस्टर्ब होता हूं। ''

बस साहिब हम में जो संगीत की आत्मा पैदा हुई थी तत्काल मर गयी। दिल ने कहा, '' ओ दुष्ट मानव! देख, पढ़ने वाले यूं पढ़ते हैं। ''

- फिर क्या था, श्रीमान जी हमने भगवान के सामने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की- '' भगवान। हम भी अब नियमित रूप से अध्ययन आरंभ करने वाले हैं।

हमारी सहायता कर और हमें शक्ति दे। ''

आंसू पोंछकर और दिल को पक्का करके मेज के सामने आ बैठे। दांत भींच लिए। नेकटाई खोल दी। आस्तीनें चढ़ा लीं, परंतु कुछ समझ में न आया कि करें क्या? सामने लाल, हरी, पीली सभी प्रकार की किताबों का ढेर लगा था। अब इनमें से कौन-सी पढ़ें निश्चय यह हुआ कि पहले किताबों को क्रम से मेज पर लगा दें, क्योंकि नियमपूर्वक अध्ययन की पहली मंजिल यही है।

बड़ी लंबाई-चौड़ाई की पुस्तकों को अलग रख दिया। छोटी लंबाई-चौड़ाई की किताबों को साइज के अनुसार अलग पांति में खड़ा कर दिया। एक नोट पेपर पर प्रत्येक पुस्तक के पृष्ठों की संख्या लिखकर सबको जमा किया। फिर पंद्रह अप्रैल तक के दिन गिने। पृष्ठों की संख्या को दिनों की संख्या में विभाजित किया। साढ़े पांच सौ उत्तर आया, परंतु घबराहट की क्या मजाल जो चेहरे पर प्रकट हो पाये। मन में कुछ थोड़ा-सा पछताये कि प्रात: तीन ही बजे क्यों न उठ बैठे, परंतु अनिन्द्रा के आयुर्वेदिक पहलू पर विचार किया तो तुरंत अपने आपको फटकारा। अंत में इस परिणाम पर पहुंचे कि तीन बजे उठना तो निरर्थक बात है, हां पांच, छ: सात बजे के लगभग उठना बहुत ही उचित होगा। स्वास्थ्य बना रहेगा और परीक्षा की तैयारी भी नियमित रूप से होगी।... .एक पंथ दो काज।

यह तो हम जानते हैं कि सवेरे उठना हो, तो जल्दी सो जाना चाहिए। खाना बाहर ही से खा आये थे। बिस्तर में घुस गये।

चलते-चलते ख्‌याल आया कि लाला जी से जगाने के लिए कह ही न दें? यूं हमारी अपनी इच्छा-शक्ति पर्याप्त बलवती है। जब चाहें उठ सकते हैं, परंतु

फिर भी क्या हानि है? डरते-डरते आवाज दी- ' 'लाला जी। ''

उन्होंने पत्थर खींच मारा- ' येस !' '.

हम और भी सहम गये कि लाला जी कुछ नाराज मालूम होते हैं। तुतलाकर निवेदन किया- ' 'लाला जी! प्रात: आपको बड़ा कष्ट हुआ मैं आपका बहुत आभारी हूं। कल यदि जरा मुझे छ: बजे अर्थात जिस समय छ: बजें.। ''

कोई उतर न मिला।

मैंने फिर कहा - '' जब छ : बज चुके तो... .सुना आपने?'' चुप।

'' लाला जी!''

कड़कती हुई आवाज ने उत्तर दिया - '' सुन लिया। सुन लिया। छ : बजे जगा दूंगा। थ्री गामा प्लस और एल्फा प्लस....। ''

हमने कहा - '' ब ब ब .बहुत अच्छा यह बात है। ' .'

'' तोबा। खुदा किसी का मुहताज न करे। ''

लाला जी आदमी बहुत शरीफ हैं। अपने वअ'दा' के अनुसार दूसरे दिन प्रात: छ: बजे उन्होंने दरवाजे पर घूंसों की वर्षा आरंभ कर दी। उनका जगाना तो केवल एक सहारा था। हम स्वयं ही प्रतीक्षा में थे कि यह स्वप्न समाप्त हो ले, तो बस जागते हैं। वे न जगाते तो मैं स्वयं एक दो मिनट के पश्चात आखें खोल देता। खैर जैसा कि मेरा कर्त्तव्य था, मैंने उनका धन्यवाद किया। उन्होंने इसे इस रूप में स्वीकार किया कि गोलाबारी बंद कर दी।

इसके बाद की घटनाएं जरा विचारणीय है और बहस चाहती हैं। उनसे संबंधित कथाओं में कुछ विभिन्नता है। कुछ भी हो इस बात का तो मुझे विश्वास है और मैं सौगन्ध भी खा सकता हूं कि आंखें मैंने खोल दी थीं। फिर यह भी याद है कि एक नेक और सच्चे मुसलमान की तरह कलमए-शहादत (साक्षी-सूचक मंत्र) भी पढ़ा। फिर यह भी याद है कि उठने से पहले भूमिका के रूप में एक आध करवट भी ली। फिर भी पता नहीं। शायद लिहाफ ऊपर से उतार दिया, शायद सिर उसमें लपेट दिया। शायद खांसा, कि भगवान जाने खर्राटा लिया। खैर यह तो निश्चय बात है कि दस बजे हम बिल्कुल जाग रहे थे, परंतु लाला जी के जगाने के पश्चात और दस बजे से पूर्व भगवान जाने हम पड़ रहे थे या शायद सो रहे थे। नहीं, हमारा ख्‌याल है, पड़ रहे थे या शायद सो रहे हों। कुछ भी हो, यह मनोविज्ञान की समस्या है, जिसमें न आप विशेषज्ञ है, न मैं। क्या पता लाला जी ने जगाया ही दस बजे हो या उस दिन छ: देर से बजे हों। भगवान के कामों में हम और आप क्या हस्तक्षेप कर सकते हैं, परंतु हमारे दिल में दिन भर यह

संदेह रहा कि दोष कुछ अपना ही जान पड़ता है।

जनाब की शराफत देखिए कि केवल इस संदेह के आधार पर प्रात: से सायं तक अंतःकरण की फटकारें सुनता रहा और अपने आपको कोसता रहा, किंतु लाला जी से हंस-हंसकर बातें की। उनका धन्यवाद किया और इस विचार से कि उनका हृदय भग्न न हो, अतीव संतोष प्रकट किया कि '' आपकी कृपा से मैंने प्रात: का सुहावना और आनंददायक समय बहुत अच्छी तरह व्यतीत किया, अन्यथा और दिनों की भांति आज भी दस बजे उठता। लाला जी! प्रात: के समय मस्तिष्क क्या स्वच्छ होता है, जो पढ़ो खुदा की खसम तत्काल याद हो जाता है। भई खुदा ने सुबह भी क्या अजीब चीज पैदा की है अर्थात यदि सुबह की बजाय सुबह-सुबह शाम हुआ करती, तो दिन क्या बुरी तरह कटा करता।

लाला जी ने हमारे जादू भरे वक्तव्य के प्रति इस प्रकार प्रशंसा प्रकट की कि आप पूछने लगे-

' 'तो मैं आपको छ: बजे जगा दिया करूं ना?''

मैंने कहा- ' 'हां, हां! वाह, यह भी कोई पूछने की बात है? अवश्य जगाइए। ''

सन्ध्या के समय आने वाले प्रात: की पढ़ाई के लिए दो पुस्तकें छांट कर मेज पर अलग जोड़ दीं। कुर्सी को चारपाई के निकट सरका लिया। ओवरकोट और गुलूबंद को कुर्सी की पीठ पर लटका दिया। कनटोप और दस्ताने पास ही रख लिए। दियासलाई को सिरहाने के नीचे टटोला। तीन बार कुरान की एक विशेष पवित्र आयत पढ़ी और मन में एक अत्यंत ही शुभ संकल्प बांधकर सो गया।

प्रात: लाला जी के दरवाजे को जरा थपथपाते ही झट आंख खुल गयी। अत्यंत पुलकित भाव से लिहाफ की एक खिड़की में से उनको 'गुड मार्निंग' किया और अतीव निर्दयतापूर्वक लहजे में खांसा। लाला जी संतुष्ट होकर वापस चले गये।

हमने अपनी हिम्मत और अपूर्व साहस को बहुत सराहा कि आज हम तुरंत ही जाग उठे। दिल से कहा- ' 'दिल भय्या, प्रात: समय उठना तो केवल जरा-सी बात है, हम यूं ही इससे डरा करते थे। ''

दिल ने कहा- '' और क्या? तुम्हारे तो यूं ही होश उड़ जाया करते हैं। ''

'शुद्ध उच्चारण ' वअ'दा' ' wa’da है; ' 'वायदा' ' नहीं जो बिना सोचे समझे प्रचलित हो गया है- 'प्रभाकर'

हमने कहा- ' 'सच कहते हो यार अर्थात यदि हम सुस्ती और आलस्य को स्वयं अपने निकट न आने दें, तो उसकी क्या मजाल है, जो हमारी बाकाइदगी' में बाधा डाल सकें। इस समय लाहौर शहर में हजारों ऐसे आलसी लोग होंगे, जो संसार और संसार में होने वाली बातों से बेखबर नींद के मजे उड़ाते होंगे और एक .हम हैं कि कर्त्तव्य-पालन के लिए अत्यंत पुलकित हृदय और मुस्कराती मुखाकृति से जगा रहे हैं। भई क्या बरखुरदार सिद्ध हुए हैं। नाक को सर्दी-सी अनुभव होने लगी, तो उसे जरा यूं ही लिहाफ की ओट में कर लिया और फिर सोचने लगे- ' 'खूब, तो हम आज क्या समय पर जागे हैं। बस जरा इसका अभ्यास हो जाये, तो नियमपूर्वक कुरआन मजीद की तिलावत' और फर्ज की नमाज भी आरंभ कर देंगे। आखिर मजहब सबसे पहले और उच्च है। हम भी क्या दिन प्रतिदिन नास्तिकता की ओर झुकते जाते हैं। न खुदा का डर, न रुसूल का भय। समझते हैं कि बस अपने परिश्रम ही से परीक्षा पास कर लेंगे। अकबर बेचारा यही कहता-कहता मर गया, परंतु हमारे कान पर सूं तक न चली....। ''

(लिहाफ कानों पर सरक आया)

' 'तो मानो आज हम और लोगों से पहले जागे हैं... .बहुत ही पहले.... अर्थात कालेज आरंभ होने से भी चार घंटे पहले... .क्या बात है? कालेज के अधिकारी भी कितने सुस्त हैं। प्रत्येक उद्यमशील मनुष्य को छ: बजे तक पूर्णत: जाग उठना चाहिए। समझ में नहीं आता कि कालेज सात बजे क्यों न शुरू हुआ करे....। ''

(लिहाफ सिर पर आ गया)

' 'बात यह है कि नवीन सभ्यता हमारी समस्त उच्च शक्तियों का उन्यूलन कर रही है। विलासिता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है आखें बंद)... .तो अब छ: बजे हैं। मानो तीन घंटे तो अविरल अध्ययन किया जा सकता है। प्रश्न केवल यह है कि पहले कौन-सी किताब पढ़ें। शेक्सपियर या वर्डसवर्थ ? मैं जानू शेक्सपियर अच्छा रहेगा। उसकी शानदार कृतियों में ईश्वर की महिमा के तत्त्व दिखायी देते हैं और सुबह के वक्त अल्लाह मियां की याद से अच्छी चीज क्या हो सकती है?''

' 'फिर ख्‌याल आया कि दिन का भावों के बवंडर-स्थान से श्री गणेश

1. शुद्ध उच्चारण वाकाइदा' ' है ' वाका-यदा' ' नहीं।

2. तिलावत = पाठ।

3. फज्र = प्रभात।n

करना ठीक विचार नहीं-युक्ति-युक्त भी नहीं। वर्डसवर्थ पढ़ें। उसके पृष्ठों में मन की शांति और संतोष प्राप्त होगा, हृदय और मस्तिष्क नेचर की मौन मनोज्ञाताओं से हत्के-हत्के आनंदित होंगे... .परंतु शेक्सपियर... .नहीं वर्डसवर्थ ही ठीक रहेगा.... शेक्सपियर-हेमलेट... .किंतु वर्डत्‌वर्थ. .टेनीसन... .उन्माद... .हरी-भरी ... .घास के मैदान... .वसन्त-पवन.. .काम का शिकार... .काश्मीर... .मैं आफत का परकाला हूं...। ''

यह पहेली आध्यात्म विद्या ही से संबंध रखती है।... .फिर जो हमने लिहाफ से सिर बाहर निकाला और वर्डसवर्थ पढ़ने का इरादा किया तो वही दस बज रहे थे। इसमें नामालूम क्या भेद है? कालेज हाल में लाला जी मिले। कहने लगे, ' 'मिस्टर! प्रात: मैंने आप को आवाज दी थी। आपने उत्तर न दिया?''

मैंने जोर का ठहाका लगाकर कहा, ' ओहो लाला जी याद नहीं, मैंने आपको गुडमार्निंग कहा था? मैं तो पहले ही से जाग रहा था। ''

बोले- ' 'वह तो ठीक है! परंतु बाद में... .उसके बाद... .कोई सात बजे के लगभग, मैंने आपसे तारीख पूछी, आप बोले ही नहीं। ''

हमने अत्यंत आश्चर्य की दृष्टि से उनको देखा। मानो वे पागल हो गये हैं और जरा गंभीर चेहरा बनाकर माथे पर तेवर चढ़ाये सोच विचार में डूब गये। एक आध मिनट हम इस गहराई में रहे। फिर हठात एक रहस्यमय प्यारे अंदाज से मुस्कराकर कहा-हां ठीक है, ठीक है। मैं उस समय... ए. ए. .नमाज पड़ रहा था।

लाला जी प्रभाव में दबकर चल दिए और हम अपने यतित्व और पवित्रता की हीनता में सिर नीचा किए कमरे की ओर चल आये।

अब यही हमारा प्रतिदिन का ढर्रा हो गया-जागना न 1 छ: बजे, जागना न 2 दस बजे, इस बीच में लाला जी आवाज दें, तो नमाज।

जब दिवंगत हृदय आशा-आकांक्षाओं का पूरा जगत था, तो यूं जागने की कामना किया करते थे कि ' 'हमारा गौरवमय सिर सिरहाने पर अल्प निद्रासक्त हौं' ' और सूर्य की पहली किरणें हमारे काले घुंघराले बालों पर बिखर रही हों। कमरे में फूलों की प्रातःकालीन सुगन्धि मन की विभोर कर रहा हो। कोमल और सुंदर हाथ अपनी उंगलियों से वीणा के तारों को हल्के-हल्के छेड़ रहे हों और प्रणय में डूबी हुई सुरीली और मधुर आवाज मुस्कराती हुई गा रही हो-.

' 'तुम जागो मोहन प्यारे' '

स्वप्न की सुनहली सुन्ध धीरे-धीरे संगीत की लहरों में विलीन हो जाये और जागृति एक मनोहर जादू की भांति अंधकार की सूक्ष्म यवनिका को नीरवतापूर्वक टुकड़े-टुकड़े कर दे। चेहरा किसी की उत्सुकतापूर्ण दृष्टि की गर्मी अनुभव कर रहा

हो। आखें मंत्र-मुग्ध होकर खुले और चार हो जायें। चित्ताकर्षक मुस्कान प्रात: को और भी चकमा दे और गीत

'सांवरी सूरत तोरी मन को भाई'

के साथ ही लज्जा व संकोच में डूब जाये। पर भाग्य में यह है कि पहले ' 'मिस्टर! मिस्टर! की आवाज और दरवाजे की दनादन थपथपाहट कानों में पड़ती है और फिर चार घंटे बाद कालेज का घड़ियाल मस्तिष्क की नस-नस में दस बजाना आरंभ कर देता है और इस चार घंटे की अवधि में गड़बियों के गिर पड़ने-देगचियों के उलट जाने, दरवाजों के बंद होने, किताबों के झाडूने, कुर्सियों के घसीटने, कुल्लियां गरगरे करने खंखारने और खांसने की आवाजें तो मानो अनायास ठुमरियां हैं। अनुमान कर लीजिए कि इन वाद्यों में सरताज की कितनी गुंजाइश है!

मौत मुझको दिखायी देती है,

जब तबीअत1 को देखता हूं मैं।

'1 शुद्ध उच्चारण 'तबीअत' है, ''तबियत'' नहीं।

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(उर्दू की श्रेष्ठ हास्य कहानियाँ, संपादक एस शरत् से साभार)

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