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भारतीय समाज में आदिवासी

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- अजय कुमार चौधरी

भारतीय समाज में शान्ति, सौहार्द और समरसता स्थापित करने के लिए समानता और स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करना अनिवार्य है लेकिन इस समाज में समानता और स्वतन्त्रता कभी वास्तविक नहीं रही। भारतीय समाज में हमेशा से आदिवासी उपेक्षित ही रहा है। आदिवासी का मूल अर्थ है- प्राचीन निवासी। जब से मानव सभ्यता का विकास हुआ है तब से आदिवासी जंगली जीवन व्यतीत करते आए हैं। जंगल ही उनके जीवन का मुलाधार है। पर जब से मानव सभ्यता के विकाश में तेजी आई है तब से आदिवासी की विकास की रफ़्तार धीमी हो गई है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आर्य सभ्यता के विकास होते ही आदिवासियों को अनार्य कह कर संबोधित किया गया। इसे असभ्य व बर्बर जाति भी कहा गया। इसे सामाजिक व्यवस्था से दूर रखते हुए इनके अधिकारों का हनन किया गया। आदिवासी सामाजिक व्यवस्था से दूर वनों -जंगलों में निवास करने वाले साधारण जंगली इंसान है जिनका जीवन का मूल उद्देश्य जीवन को जीवित रखने के लिए प्राकृतिक-संसाधनों पर निर्भर रहना। भारतीय संविधान के पाँचवें अनुसूची में आदिवासी को अनुसूचित जनजाति कहकर संबोधन किया गया है।

भारत की जनसंख्या एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है जो भारत के प्रमुख राज्य उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, छ्त्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक है जबकि पूर्वोत्तर राज्यों जैसे आसाम, मिजोरम, नागालैण्ड आदि में बहुसंख्यक है। सन १९५१ की जनगणना के अनुसारादिवासियों की संख्या १,९१,११,४९८ थी जो २००१ की जनगणना के अनुसार इनकी संख्या बढ़कर८,४३,२६,२४० हो गई। २०११ की जनगणना की रिपॉर्ट अभी प्राप्त नहीं हो पाई है। इस तरह देश की कुल जनसंख्या का ८.२% है। प्राचीन काल से ही आदिवासी प्राकृतिक-संसाधनों का संरक्षक करते आ रहे हैं।

किन्तु भारतवर्ष पर लगातार विदेशियों का आक्रमण होता रहा था। कई वंश आए और काल कल्वित हो गए किन्तु आदिवासियों की जीवन शैली में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। ब्रिटिश कम्पनी के आने के पश्चात इनके जीवन के मुलभूत संसाधनों का अभाव शुरू हुआ। अंग्रेजों के शोषण नीति के तहत आदिवासियों को इनके जीवन से जमीन को बेदखल कर दिया जो इसके जीवन का मूलाधार था। नील की खेती के लिए हजारों आदिवासियों को मजबूर किया गया

१८६५ में वन कानून पारित कर आदिवासियों को प्राकृतिक अधिकारों से वंचित कर दिया। १८७१ में दि क्रिमिनल ट्राइब एक्ट के तहत आदिवासियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया। इस प्रकार सामाजिक शोषण के साथ-साथ इनका आर्थिक शोषण भी हुआ। उदाहरण के लिए आप को मैं बता दूँ कि हाल ही ११ जनवरी २०१२ में अंडमान में पुलिस ने विदेशी सैलानियों के सामने आदिवासी लड़कियों को नंगा नाचने पर मजबूर किया (रिपॉर्ट द ब्रिटिश गार्जियन)। गुवाहाटी में भी ठीक ऐसी ही घटना ९ जुलाई२०१४ को हुई। जहाँ लक्ष्मी उरांव नामक आदिवासी लड़की को निर्वस्त्र करके सारेआम बाजार में घुमाया जाता है। ऐसी घटनाओं से सारा इतिहास पसरा हुआ है बस आवश्यकता है दृष्टि डालने की।

छ्त्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के माध्यम से आदिवासियों को उनके ही लोगों के द्वारा मारने जैसी असंवैधानिक व अमानवीय घटना प्रकाश में आई है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आदिवासियों का शोषण ब्रिटिश शासन से लेकर अब तक कायम है। विकास के नाम पर आदिवसियों के जमीन को जबरन दखल कर उद्योगपतियों के हाथों बेच देना। विरोध करने पर मिथ्या आरोप लगाकर पुलिसी कारवाई करवाना आदि जैसे घटनाएं इनके जीवन की विद्रूपताओं को दर्शाता है। जयपुर लिटेरेचर फ़ेस्टिवल में सुप्रसिध्द लेखिका महाश्वेता देवी कहती है कि नक्सलियों के भी अपने सपने होते हैं। इस तथ्य को समझने की जरूरत है क्यों एक बुध्दिजीवी नक्सलियों के पक्ष में ऐसी बयान बाजी करते हैं। निश्चय ही उनके मन में नक्सलियों के प्रति सद्भावना होगी। हंस पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव का कहना है कि बुध्दिजीवियों का नक्सलियों के प्रति जो वैचारिक समर्थन है वह बना रहेगा क्योंकि वह समर्थन अन्याय के खिलाफ, दमन के खिलाफ उठती आवाज का है।

आदिवासियों के कुल आबादी का ५२% गरीबी रेखा के नीचे है और चौंका देने वाली बात यह है कि ५४% आदिवासियों को आर्थिक सम्पदा जैसे संचार और परिवहन तक कोई पहुँच ही नहीं है। भारत की सामाजिक व्यवस्था में सदा से सवर्णों का वर्चस्व रहा है। सवर्ण के वर्चस्ववादी नीति के कारण आदिवासी अपने अधिकारों से वंचित रहा। समाज में उनकी दशा अत्यंत सोचनीय रही। आदिवासी वन-जंगलों में रहते थे पर दोनों ही सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत शोषित और प्रताड़ित थे। आदिवासी की अपनी संस्कृति है और अपनी भाषा भी। उनका मुख्य व्यवसाय आखेट और पारंपरिक ढंग से खेती-बारी। औद्यौगिकीकरण के इस में दौर आदिवासी पीछे की ओर जा रहे हैं।

औद्योगिकीकरण की नीति के कारण आदिवासियों को उनके पुरखों की जमीन से जबरन विस्थापित किया जा रहा है। औद्योगिकीकरण के कारण उनके जमीनों को उद्योगपतियों के हाथों बेचा जा रहा है। आदिवासी अपने परम्परागत आखेट और कृषि को छोड़कर श्रमिकों के जमात में खडा होने को विवश हो रहा है। इस तथाकथित परिस्थियों को ध्यान में रखकर राजनीतिक दल इसका लाभ उठा रहे हैं। इनके अधिकारों को राजनीतिक मुद्दा बनाकर आदिवासियों को अपने पक्ष में करना चाहते हैं। स्वर्गीय क्रांतिकारी बिरसा मुंडा के सजग प्रयासों के कारण आदिवासी समाज में आमूलचूल परिवर्तन हुआ था। उनसे प्रभावित होकर आदिवासी अपने अधिकारों के लिए सजग हुए थे और आज भी राजनितिक दलों के प्रलोभनों से बचते हुए संघर्ष को जारी रखें हैं। जब तक भारतीय संविधान में दिए गए प्रावधान के अनुरूप समानता का वास्तविक रूप प्रदान नहीं होगा तब तक आदिवासी समाज के मुख्यधारा के साथ जुड़ नहीं सकता और ये हाशिए पर ही रहेगा चाहे इसके विकास के कितने ही सामाजिक और राजनीतिक विचार-विमर्श क्यों ना हो।

Ajay Kumar Choudhary

Assistant Professor in Hindi

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