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मोबाइल में अटकी है हम सब की जान

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

अपना पूरा इतिहास तिलस्मी कथाओं और अन्तर्कथाओें से भरा पड़ा है जहाँ किसी न किसी की जान को तोते या किसी सुनहरे चमत्कारी पिंजरों में कैद कर रखने और इसके बूते बहुत कुछ कर गुजरने और चमत्कार दिखाने जैसी रोमांचक कथाओं को आज भी सुना जाता है। 

युग बदलने के बाद यह सब मायाजाल जीवन्त के साथ-साथ जड़ में भी घुस आया है। कल-युग में आज जीवन्त में जितनी ऊर्जा शक्ति नहीं देखी जाती उतनी क्षमता और अनवरत हलचल का दौर जड़ पदार्थों के माध्यम से देखा जा रहा है।

खूब सारे आविष्कारों और उपकरणों ने इंसान की जिन्दगी को सहूलियतें तो दी हैं लेकिन उसी अनुपात में अपना गुलाम भी बना डाला है।

आज खूब सारे उपकरण ऎसे हैं जिनकी हमारी जिन्दगी में जगने से लेकर सोने तक नितान्त अनिवार्यता इतनी अधिक हो गई है कि इन उपकरणों में हमें विवश कर दिया है।

यही नहीं तो अपने पर इतना अधिक आश्रित कर डाला है कि इनके बगैर पूरा का पूरा जीवन निरस, बोझिल और अधूरा तक लगने लगा है।

इन सभी में आज दूसरे सारे उपकरणों को छोड़ भी दिया जाए तो मोबाइल इनमें सर्वोपरि है जिसने हमें स्वच्छन्द और मुक्ताकाशी तो बना डाला है लेकिन उससे कहीं अधिक विवश और पराश्रित कर डाला है।

मोबाइल ने हमारे उत्तमांग से लेकर माता-पिता, बच्चों और रिश्तेदारों तक को भुलवा दिया है। पारिवारिक, सामाजिक आयोजनों और घर-परिवार के लोगों से बातचीत करने की बजाय हमें मोबाइल से चिपके रहना ज्यादा सुकून देता है। यही कारण है कि हमारे पारिवारिक आधारों को दीमक लगती जा रही है और हमें जीवन्त की बजाय जड़ वस्तुओं में अधिक आनंद आने लगा है।

जब तक बैटरी होती है हम हवाओं में उड़ते हैं, बैटरी डाउन होते ही उस उस गुब्बारे की तरह धड़ाम से नीचे आ गिरते हैं जिसमें हवा खत्म हो गई हो।

फिर बैटरी चार्ज करने के लिए किसी इलेक्टि्रक सॉकेट के पास ऎसे खड़े रहते हैं जैसे कि प्रसूति गृह के बाहर खड़े होकर पूरी व्यग्रता के साथ नई खबर सुनने का इंतजार कर रहे हों।

और तो और, रेल में सफर करने वाले लोगों में से खूब सारे शौचालय के बाहर लगे सॉकेट से बैटरी चार्ज करने की फिराक में ऎसे खड़े रहते हैं जैसे कि उन्हें इस स्थान पर खड़े रहना भा  ही गया हो।

मोबाइल अपने जीवनसाथी और जीवन संंगिनी या अपने जन्मदाताओं से भी इतना अधिक मूल्यवान हो गया है कि हम उनकी परवाह करें न करें, अपने मोबाइल को लेकर हमेशा सतर्क रहते हैं।

और किसी की कोई बात सुनें न सुनें, अनसुना करने की भले ही बुरी आदत हो, मगर मोबाइल की हर हरकत को लेकर हमारे कान हर पल चौकन्ने रहा करते हैं चाहे दिन के किसी काम में व्यस्त हों या रात के अंधेरों में खर्राटे भर रहे हों। 

बात पूजा-पाठ के समय की हो या शौचालय-बाथरूम जाने की, मोबाइल अब  दुनिया भर में एकमात्र ऎसा दिव्य उपकरण हो गया है जो कि पूजा घरों से लेकर सब जगह पवित्र ही रहता है, चाहे कहीं भी ले जाया जाए अथवा इस्तेमाल किया जाए।

अधिकांश लोग अपने मोबाइल को सोने-चाँदी के जेवरातों से भी अधिक संभाल कर रखा करते हैं, औरों के हाथों से बचाकर रखा करते हैं यहां तक कि अपने आत्मीयों से भी दूर रखा करते हैं।

लगता है कि जैसे मोबाइल में ही उनके जीवन की साँसें अटकी हुई हैं, जाने कितने राजकुमारों और राजकुमारियों, परियों आदि के संदेश, फोटो और वीडियो भरे हैं, जीवन के कितने अहम् दस्तावेज संग्रहित हैं या कोई ऎसी विस्फोटक सामग्री का कोई ऎसा भण्डार जमा है कि जिसके खुल जाने से कोई भूचाल या दावानल ही आ जाने वाला है।

बहुत से लोग दिन-रात में कई घण्टे अपने मोबाइल से ऎसे चिपके रहते हैं जैसे कि नवप्रसूताएं नवजात शिशुओं को दूध ही पिला रही हों।  कभी बैटरी डाउन हो जाए, सिग्नल न मिलें या और कोई परेशाानी आ जाए, कुछ पल के लिए सब कुछ बंद हो जाए तो हमारा जीना हराम हो जाता है, हायतौबा ऎसी मचाने लगते हैं जैसे कि जान ही निकली जा रही हो। खाना-पीना, सोना, चलना-फिरना आदि कुछ भी न हो तो चलेगा, हमारा मोबाइल जरूर चलना चाहिए।

फिर बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को आजकल मोबाइल का शौक ऎसा घेर चुका है कि हमारी जिन्दगी का बहुत बड़ा हिस्सा ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने में बीतना चाहिए वह मोबाइल छीनने लगा है। मोबाइल का खूंटा आजकल दूसरे सारे बंधनों से सर्वोपरि है जिसमें बिना किसी रस्सी, जंजीर या तार के हम सारे के सारे ऎसे बंधे हुए हैं कि यह बंधन ही अब हमें रास आता है, इसके सिवाय दुनिया के कोई से रिश्ते हमें आनंद नहीं दे पा रहे हैं।

अधिकांश लोगों के लिए मोबाइल का कहीं कोई उपयोग नहीं है लेकिन बतरस से आनंद और सुकून पाने के आदी लोगों के लिए यह जिन्दगी ही बन चुका है। मोबाइल है तो समझ लो आदमी जिन्दा है, जिसके पास नहीं है उसे जिन्दा मानने को कोई तैयार नहीं।  हम सभी की जान मोबाइल में अटकी है। यही सब यों ही होता रहा तो आने वाले  दिनों में पैदा होने वाले मनुष्यों में इनबिल्ड मोबाइल की मांग भी भगवान से की जा सकती है।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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