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कहानी - हरामजादा

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भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

कहानी काफी पुरानी और वास्तविक घटना पर आधारित है। इसकी समानता किसी भी तरह से अन्य लोगों से नहीं हो सकती क्योंकि यह मेरी अपनी कहानी है। इसके पात्र काल्पनिक न होकर मेरे अपने ही करीबी परिवारी जन हैं। अब तो मैंने अपनी इस कहानी का जिसे आगे लिख रहा हूँ के बारे में स्पष्टीकरण दे दिया है, बस आप पढ़िए और यदि आपके मन में कोई विचार आए तो झट से कमेण्ट पोस्ट कर दीजिए। मेरा बचपना था। 50-60 के दशक की बात है। मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि ठेठ गँवई हैं। खेती-किसानी अच्छी होती थी, लेकिन शिक्षा से परिजनों को परहेज था, शायद स्कूल कालेज दूर-दराज थें इसलिए हमारे पूर्वज शिक्षा नहीं ग्रहण कर सके थे।

गाँव का हमारा ही एक परिवार ऐसा था, जिसका बड़ा बेटा परदेस रहकर नौकरी करता था, और वह थें हमारे पिता जी, जो अब इस संसार में नहीं हैं। हमारा गाँव पिछड़ा माना जाता था इस वजह से तत्समय हमारे गाँव के युवकों की शादियाँ नहीं होती थीं। हमारे बाबू जी चूँकि परदेस में रहकर पैसा कमाते थे, इसलिए उनकी शादी अच्छे घराने की लड़की (मेरी माता जी) से हो गया था। हमारे पिता जी और माता जी की शादी के बारे में हमने बुजुर्गों से बड़ी रोचक बातें सुनी थीं। वह लोग कहते थे कि मन्नू के बाबूजी ने (मेरे पिता जी के बारे में) परदेस में जाकर रूपया छापने वाली मशीन ले रखा है यही कारण है कि उनका मिट्टी का घर पक्का भवन बन गया, साथ ही खेती-बारी भी अव्वल होने लगी है।

पहले कन्या पक्ष के हिमायती दलाली/बिचौलियों का रोल प्ले करते थे। इसी तरह के किसी तत्कालीन बिचौलिए ने पिता जी और माता जी की शादी कराया था। चूँकि मेरी माता जी एक अच्छे और बड़े घराने की थीं इसलिए उनका रहन-सहन अन्य लोगों विशेष कर तत्कालीन महिलाओं की तुलना में सर्वथा हटकर था। मेरी माता जी आजादी के पूर्व की प्राइमरी पास हैं। और आज भी बी.ए./एम.ए. पास उनसे बात करके आगे नहीं जा सकते। माता जी देहात और शहरी वातावरण में पली-बढ़ी थीं, इसलिए उनके अन्दर का प्राणी काफी हद तक तत्समय आधुनिक हुआ करता था। हम छोटे थे, गाँव में लोगों के बच्चे शरारत करते थे, तब उनकी माताएँ देहाती गालियाँ देकर उन्हें शरारत करने से मना करती थीं, लेकिन जब हम शरारत करते थे तब हमें हरामजादा, कुत्ता, कमीना कहकर अम्मा अपना प्रभुत्व अपढ़ समाज में कायम करती थीं।

शायद वह तब यह भूल जाया करती थीं, कि हरामजादा का मतलब क्या होता है? हम सब छोट थे, लेकिन अम्मा द्वारा दी जाने वाली गाली का अर्थ समझते थे। क्या कहें अम्मा का क्रोध बेकाबू रहता था, वह जब गालियाँ बकने लगतीं थीं तब यह नहीं सोच-समझ पाती थीं कि इसका हम पर कैसा असर पड़ेगा। कहते हैं कि माँ बच्चे की पहली पाठशाला होती है जहाँ हर तरह की शिक्षा और संस्कार दिए जाते हैं, यह तो ऊपर वाले का शुक्र रहा कि माँ द्वारा क्रोधावेश में दी जाने वाली गालियों ने हम पर अपना प्रभाव नहीं डाला। समय बीतता गया। हम सब बड़े होकर स्कूल/कालेजों में पढ़ने लगे।

अम्मा ने हरामजादा कहना कब छोड़ा यह तो ठीक से नहीं मालूम, लेकिन अब जब वह अपने जीवन का 85 वर्ष पूरा कर रही हैं, और अपना ज्यादा समय पूजा-पाठ में ही लगाती हैं तब हम यह सोचने पर विवश होते हैं कि काश! माता जी पहले भी ऐसा ही करतीं जैसा कि अब कर रही हैं। अब जब उनको याद दिलाया जाता है तो वह डांटती हैं और कहती हैं कि तब की बात और थी अब तो उनके सामने चार पीढ़ियाँ हैं यदि वह अपने मुँह से अपशब्द निकालेंगी, तब बच्चों पर उसका कुप्रभाव पड़ेगा।

बुढ़ापे में अम्मा के मुँह से ऐसे वचन सुनकर आश्चर्य होता है। काफी अर्सा हो गया मैंने उनके मुँह से गाली नहीं सुना है। काश! समय विपरीत चक्र में घूमता और मैं फिर से दस व मेरी माता जी 30 वर्ष की हो जाती और अम्मा के मुँह से ‘हरामजादा’, कमीना, कुत्ता जैसे शब्दों से अलंकृत होता तो कितना अच्छा रहता। एक राज की बात बताएँ शहरी परिवारों में वर्तमान में इस तरह की गालियाँ देने का प्रचलन जोरों पर है। मैंने कई घरों के आँगन में अपने बच्चों को डाँटती हुई माताओं के मुँह से सुना है कुत्ता, कुतिया, कमीने, कमीनी और ‘हरामजादा‘। खैर! यह रही गालियों की बात कृपाकर आप अपने बच्चों को सुसंस्कृत बनाएँ और इस तरह की गालियों के उच्चारण से बचें।

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भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार

अकबरपुर, अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)

 

आत्मकत्थ्य

उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जनपद अन्तर्गत ग्राम- अहलादे (थाना बेवाना) में 26 जून 1952 को एक मझले किसान परिवार में जन्म। गंवई परिवेश में पला-बढ़ा और ग्रामीण स्तर तक के स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। विगत 45 वर्षों से लेखन कार्य।

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