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स्वयं खुश रहने के प्रयास में, कोई खुश नहीं किसी से

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

पहले हर इंसान खुश रहने के साथ ही औरों को खुश रखने को लालायित रहता था । दूसरों को खुशी देने की खातिर लोग अपनी खुशी की बलि भी चढ़ा दिया करते थे लेकिन मन में एक ही ध्येय होता था कि सामने वाले हमसे खुश रहें।

अपनी खुशियों को दरकिनार कर औरों को खुश रखने के जतन में कहीं भी किसी भी स्तर पर न कोई मलिनता थी, न कोई अपेक्षा।  बस एक ही भाव था कि सामने वाला हमसे प्रसन्न रहे।

औरों को खुश कर या देख कर हमें आत्मीय प्रसन्नता और संतोष होता था और यही आत्मसंतोष हमारी खुशियों को इतना अधिक बहुगुणित कर दिया करता था कि उस जमाने के लोग परम संतुष्ट और मस्त हो जाया करते थे। उनके लिए यही एक पूंजी थी जो वे लोगों को खुश रखकर या खुशी देकर जमा कर लिया करते थे।

निष्काम भाव से प्रदान की गई खुशी और सेवा हमेशा दुआओं का भण्डार देती हैं। यही कारण है कि बिना किसी कामना के औरों को प्रसन्न रखने व खुशियां बाँटने का जो कोई निर्मल मन से जतन करता है उसे बिना मांगे ही वह सब कुछ मिल जाता है जो रुपए-पैसों और सोने-चाँदी-हीरे देकर भी खरीदा नहीं जा सकता।

सेवाभावी, मन, वचन और कर्म के पक्के, ईमानदार और परोपकारी लोगों की दीर्घायु, आरोग्य तथा चेहरे की चमक-दमक का यही एकमात्र राज है जिसे स्वार्थी, झूठे और खुदगर्ज लोग कई जन्मों में भी नहीं समझ पाते।

हर खुशी का संबंध हृदय से है। चाहे बाहर कितना ही कुछ ऎसा हो जाए जो हमें खुशी देने वाला हो लेकिन जब तक हृदय इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं करता, तब तक हम अपने आपको न खुश कह सकते हैं, न खुश हो पाते हैं।

इसका मूल कारण यही है कि हमारी आत्मा को सब कुछ पता है। वह इसके पीछे के सारे राज, आडम्बर और हथकण्डों को जानती है इसलिए उसे अच्छी तरह पता होता है कि कौन सी खुशी दिखावटी, कृत्रिम, चुराई या छीनी हुई है और कौन सी खुशी वास्तविक।

जब कभी कोई वास्तविक खुशी का मौका आता है, अपनी प्रतिभा, परिश्रम और बौद्धिक कौशल से कोई खुशी प्राप्त होती है तब आत्मा अपने आप खुशी अभिव्यक्ति के सारे द्वारों को खोल देती है जहाँ से होकर आत्मिक प्रसन्नता एवं संतोष की धाराओं का महाज्वार बाहर की ओर निकलना ही है।

पर बहुधा ऎसा होता नहीं है। अब समय काफी बदल चुका है। हमें अपने को खुश रखने से ही मतलब रह गया है और हम वही काम करते हैं जिससे हमारी खुशियां बनी रहें, बढ़ती रहें।

इसके लिए हमारे कर्म, स्वभाव और व्यवहार में कुटिलता, अपेक्षा, पक्षपात और स्वार्थ भरने लगता है और हम अपनी खुशी तलाशने के लिए हर मामले में सकाम व्यवहार करते हैं, अपेक्षाओं और अपने नाजायज स्वार्थों, ऎषणाओं की पूर्ति तथा प्रतिशोध को पूरा करने के लिए दूसरे लोगों को खुश रखने के जतन में जुट जाते हैं।

हमें इनसे परे दुनिया से कोई सरोकार नहीं रहता है। इस मामले में हमारा पूरी तरह ध्रुवीकरण ही हो जाता है। अरबों लोगों से भरे शेष संसार को त्यागकर हम चंद लोगों को खुश करने में पूरा बहुमूल्य और दुर्लभ मानव जीवन गँवा दिया करते हैं, हर प्रकार का समर्पण कर दिया करते हैं, भोग-विलास और दैहिक आनंद के सारे प्रबन्धों में रमे रहते हैं, अपनी मानवता और संस्कारों को तर्पण कर तिलांजलि दे दिया करते हैं और भूत-पलीतों, राक्षसों की तरह व्यवहार करते रहते हैं।

इन सबके बावजूद हमारी उद्विग्नता, अशांति और असंतोष कभी थमने का नाम नहीं लेता बल्कि उत्तरोत्तर बढ़ता ही चला जाता है। और यह दौर हमारे जिन्दा रहने तक यों ही बना रहता है।  मरने के बाद भी हमारी गिनती उन अतृप्त आत्माओं या धुंधुकारी में होती है।

जब इतना सब कुछ जतन करने के बाद भी खुशी न मिले तो क्या समझा जाए। जबकि प्रसन्न रहना और प्रसन्नता देना मनुष्य का स्वाभाविक गुण धर्म है और जो ऎसा नहीं कर पाएं देहधारियों को मनुष्य कैसे माना जा सकता है।

खुशी जब से स्वार्थ और अपेक्षाओं के गलियारों से होकर आने लगी है तभी से इसका अक्षत यौवन भंग हो चुका है। निर्धन से निर्धन आदमी से लेकर महान से महान समृद्ध और वैभवशाली न खुद खुश दिखते हैं, न रह पाते हैं, न इनके आस-पास रहने वाले लोग खुश हैं और न ये लोग औरों को खुशी दे पा रहे हैं।

इसका मतलब यही निकाला जा सकता है कि व्यभिचारी गलियारों, अपेक्षाओं की धूल भरे रास्तों और स्वार्थ की हवाओं से भरे कर्म न खुद को खुश रख सकते हैं, न औरों को।

जमीनी हकीकत यही है कि कोई किसी से खुश नहीं है। जब हम अपने आप ही से खुश नहीं हैं तो औरों से खुशी पाने की अपेक्षा क्या करें। घर-परिवार के सदस्य एक-दूसरे से खुश नहीं हैं, पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार, मित्र, संपर्कित और सहकर्मी हमसे खुश नहीं हैं, हमारे इलाके के लोग हमसे खुश नहीं हैं, फिर हमारे जीने और अपने आपको सामाजिक प्राणी मानते रहने का क्या कोई अर्थ रह गया है।

खुश रहने और खुशियां पाने के लिए अपेक्षाओं से मुक्त होकर जीवन जीने का अभ्यास करें, निष्काम सेवा और परोपकार की आदत डालें और सभी के भीतर परमात्मा की उपस्थिति मानकर आत्मीय बर्ताव करें।

खुशी दिमाग का विषय नहीं है, गणितीय समीकरणों, समझौतों और षड़यंत्रों का विषय नहीं है बल्कि खुश रहना, औरों को खुश करना तथा खुशियां बाँटना दैवीय कर्म है, इसमें आसुरी भावों का पूर्ण परित्याग जरूरी है, तभी खुशी प्राप्त हो सकती है, औरों को खुशी प्राप्त करने का सामर्थ्य प्राप्त हो सकता है।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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