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क़ैस जौनपुरी की कहानी - बदरू चाचा

कैस जौनपुरी की कहानी बदरू चाचा

बदरू चाचा

 

क़ैस जौनपुरी

 

औरतों के मामले में बदरू चाचा की क़िस्मत बहुत अच्छी थी. और नहीं तो क्या? और किसी को इस तरह थोक के भाव औरतें मिलते कभी नहीं देखा. बदरू चाचा जहाँ भी जाते एक औरत साथ लेके लौटते. इस तरह, जैसे कोई गया और वापस एक बकरी लेकर आ गया. और बकरी लाके घर के सामने खूँटे से बाँध दी. और फिर लोग आ-आ के नई बकरी को देख रहे हैं. कहाँ से ली? कितने में ली? इस तरह के सवाल होते थे, जब भी बदरू चाचा कोई नई औरत लेके आते थे. पूरी शकरमण्डी में नाम था उनका. लोग उनके ऊपर हँसते भी थे और जलते भी थे. हँसते इसलिये थे कि वो कुछ भी उठा के ले आते थे. न उमर देखते थे न शकल. जो मिली बस सामान की तरह उठा लिया.

घरवाले उनकी इस आदत से बड़े परेशान थे. तब बदरू चाचा कहते, “अरे! जैसे सब दो रोटी खा रहे हैं. ये भी खा लेगी.” और इतना कहके बदरू चाचा हँस देते थे. लोग समझ जाते थे कि बदरू चाचा को कुछ असर पड़ने वाला नहीं है. लेकिन कुछ लोग थे जिनको उनकी इस हरकत से बहुत असर पड़ता था. वो थे उनके पहले से पैदा हुए कुछ बच्चे और पहले से बैठी हुई बीवी.

जी हाँ! बदरू चाचा को इस बात से भी फ़र्क नहीं पड़ता था कि घर में एक औरत कुछ बच्चों के साथ पहले से बैठी है. लोग जब सवाल करते तब बदरू चाचा कुछ अकलमंदों की बनाई हुई बेवकूफ़ी का फ़ायदा उठा जाते और कहते, “अल्लाह मियाँ ने चार शादियों की इज़ाज़त दी है. मैं एक साथ चार रख सकता हूँ. अभी तो सिर्फ़ दो हैं.” तब ऐसा पहली बार होता था कि सबको अल्लाह मियाँ पे बहुत गुस्सा आता था कि “क्या ज़रूरत थी ऐसा नियम बनाने की?”

लेकिन बदरू चाचा अपने मन में ये बात अच्छी तरह जानते थे कि ये नियम अल्लाह मियाँ ने नहीं बनाये हैं. ये तो बस कुछ जिम्मेदार और पढ़े-लिखे लोगों ने अपने फ़ायदे के लिये मुसलमानों को गुमराह किया हुआ है. इसलिये बदरू चाचा तो बस लोगों का मुँह बन्द करने के लिये अल्लाह मियाँ का सहारा ले लेते थे. वो जानते थे कि अल्लाह मियाँ के नाम पे आप कुछ भी कर जाओ, कोई कुछ नहीं कहेगा.

और पहली बीवी अगर ज़्यादा चिल्ल-पों करती तो कहते, “मेरा दिमाग़ मत ख़राब करो. नहीं तो तीन बार बस तलाक़, तलाक़, तलाक़ कहना है और मामला ख़तम हो जायेगा.” उनकी इस बात पर उनकी अम्मी उन्हें गाली देते हुए कहती थीं, “अरे हरमियाँ तीन बार ज़ुबान से तलाक़ नहीं निकालते? तलाक़ हो जाता है तीन बार में.” तब बदरू चाचा मुस्कुराते हुए अल्लाह मियाँ का शुक्रिया अदा करते कि, “देख रहे हो? तुम्हारे नाम पे क्या-क्या नियम बनाये हैं तुम्हारे ठेकेदारों ने! कमाल है! अब मैं क्या करूँ? तुम्हारे जिम्मेदार लोगों की बेवकूफ़ी का मुझे फ़ायदा पहुँच रहा है तो मैं क्या करूँ?” फिर वो अपनी पहली बीवी की तरफ़ देखते और कहते, “अब मेरा मुँह क्या देख रही हो? तलाक़ हो गया. जाओ, अब अपने घर!”

इस तरह से कई बीवियाँ उनको छोड़ भी चुकी थीं. और कितनी उनको छोड़ चुकी हैं और कितनों को वो उठाके ला चुके हैं और कुछ दिन बाद ख़ुद छोड़ चुके हैं, इसका हिसाब ख़ुद उनके पास भी नहीं था. क्यूँकि उनका हाल ये था कि हफ़्ते-हफ़्ते में बीवी बदलते थे वो. कभी-कभी एक हफ़्ते में नई बीवी लाते और अगले हफ़्ते उसे उसके घर छोड़ आते. लोगों के पूछने पर कहते, “मिज़ाज़ नहीं मिला, क्या करें? कोई नहीं. फिर कोई मिल जाएगी. अल्लाह मियाँ की बनाई हुई इतनी बड़ी कायनात में औरतों की कमी थोड़े ही है.” लोग उनकी बात से सहमत भी हो जाते थे.

लेकिन एक बीवी उनको ऐसी मिली जो उनकी इस आदत से सहमत नहीं हुई. उसने साफ़ कह दिया, “या तो इस घर में मैं रहूँगी या ये कलमुई रहेगी.” बदरू चाचा ने कहा, “अरे, दोनों रह लो ना. अपनी छोटी बहन मान लो उसे.” मगर उनकी पहली बीवी ज़िद पे अड़ गयीं.

और आख़िर में बदरू चाचा ही घर छोड़कर चले गये. जो आदमी इतनी सारी औरतों का मुँह और पैर देख चुका हो वो एक ऐसी औरत का कहा भला क्यूँ मानता जिसने अभी-अभी बच्चा दिया हो. उनकी पहली बीवी बिस्तर पे बैठी-बैठी उनको गालियाँ देती रहीं मगर बदरू चाचा उनकी गालियों से बेअसर हर हफ़्ते नई-नई औरतों के नखरे उठाते रहे. इस चक्कर में बदरू चाचा अपनी ज़िन्दगी में कभी पैसे इकट्ठा नहीं कर पाये. और उनके पहले से पैदा हुए बच्चे इधर-उधर भटकने लगे. कोई अपनी नानी के पास रहने लगा तो कोई दादी के पास. मगर बदरू चाचा कभी-कभी अपनी शकल दिखा जाते, और बच्चों का हाल-चाल पूछ जाते.

मगर इस बार तो उन्होंने हद ही कर दी. अब वो एक बिहारी औरत को उठा लाये थे. जो दिखने में ऐसी लगती थी जैसे कोई पुरानी कमज़ोर गाय जिसकी सारी हड्डियाँ उसकी पीठ से बाहर दिखायी देती हैं और जो अब कभी दूध नहीं दे सकती. मगर बदरू चाचा को पता नहीं क्या दिखा था उसमें. पूछने पर उन्होंने बताया कि, “ये बस पहली बीवी को दिखाने के लिए लाया हूँ कि झगड़ा मत किया कर. अभी भी जान बाकी है मुझमें. कुछ दिनों में छोड़ आऊँगा इसे इसके घर.”

फिर कुछ दिन बाद बदरू चाचा उस बिहारिन को उसके घर छोड़ने के लिए ले जाने लगे तो उसने जाने से मना कर दिया. अब बदरू चाचा की मुसीबत हो गयी. उस बिहारिन ने पूरा शकरमण्डी सर पे उठा लिया और बदरू चाचा कि जो थू-थू हुई कि उन्होंने कान पकड़ लिया कि, “अब बस!”

लेकिन बिहारिन अब भी उनका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थी. बिहारिन पहले की सभी औरतों से बिल्कुल अलग निकली. दिखने में सबसे ख़राब मग़र दिल की सबसे अच्छी थी वो. बदरू चाचा की आख़िरी दम तक सेवा की उसने. मरने से पहले उस बिहारिन ने बदरू चाचा से जाने क्या कह दिया कि उनका औरतों का नशा एकदम से गायब ही हो गया. अब जबकि वो बिहारिन नहीं है फिर भी कभी-कभी बदरू चाचा को उस बिहारिन की बहुत याद आती है. जो काम बाकी औरतें अपने जीते जी नहीं कर पायीं थीं वो उस बिहारिन ने मरते-मरते कर दिखाया था. उसने बदरू चाचा को काबू में कर लिया था.

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कैस जौनपुरी

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