गुरुवार, 24 सितंबर 2015

प्रभु के साथ करें प्रकृति विहार

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डॉ0 दीपक आचार्य

 

हर प्रकार के प्रकृति परिवर्तन में भगवान की लीलाओं का समावेश है।

समूचा जीवन निरंतर परिवर्तन दर परिवर्तन की दिशाओं में बढ़ता और ऊर्जित होता रहता है।

प्रकृति और परमात्मा की हर लीला, प्रत्येक कर्म और संकेत किसी न किसी गुह्य वैज्ञानिक रहस्यों और भावी होनी से भरे हुए होते हैं जिसे समझ पाना सामान्य मनुष्यों के बस में नहीं है।

यह दुनिया देखने, समझने और जानने लायक है। प्रकृति का हर परिवर्तन नई ऊर्जा, चेतना और स्फूर्ति का संचार करता है और यही कारण है कि साल भर होने वाले प्रत्येक प्रकार के परिवर्तन का संबंध हमारे किसी न किसी पर्व-त्योहार और उत्सव से रहता ही रहता है।

प्रकृति का प्रत्येक परिवर्तन पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक में समानान्तर परिवर्तन की भावभूमि रचता है और इसी कारण से पिण्ड को स्वस्थ एवं मस्त तथा प्राकृतिक ऊर्जाओं से भरे समीकरणों के अनुकूल व संतुलित बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि हम मनुष्य भी प्रकृति के परिवर्तनों और दैवीय विधानों, परंपराओं, सांस्कृतिक धाराओं आदि का अनुसरण करें और प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए अपने आपको हमेशा ऊर्जित रखें।

वर्ष भर चलने वाले हमारे उत्सवी रंग और रस हमें यही सब संकेत करते हैं। हमारे जीवन की बहुत सारी समस्याओं और बीमारियों का मूल कारण ही यह है कि हमने पुरातन परंपराओं को जानने और समझने की कभी कोशिश नहीं की बल्कि हमने पाश्चात्यों की चकाचौंध भरी फैशन से प्रभावित होकर अत्याधुनिक जीवन शैली अपना ली है जिसमें दिल, दिमाग और शरीर के लिए किसी भी प्रकार का पुनर्भरण प्रकृति और परिवेश से होने की बजाय कृत्रिम संसाधनों और दवाइयों से होने लगा है।

इसका कितना तथा क्या घातक प्रभाव पड़ता है, इस बारे में वे ही लोग अधिक बता सकते हैं जो इनका अंधाधुंध प्रयोग करते हुए समय से पहले बुढ़िया गए हैं अथवा अपने मनःसौंदर्य से लेकर चेहरे की चमक-दमक खो चुके हैं और तन का सौष्ठव भुला चुके हैं।

आज जलझूलणी ग्यारस मनायी जा रही है। प्रभु भी जल विहार के लिए निकलते हैं और प्रकृति तथा जलाशयों के सौंदर्य को निहारते हुए चहुँ ओर अनिर्वचनीय आनंद और सुकून का ज्वार लहराते हैं।

भगवान का अनुगमन हमें भी करना चाहिए लेकिन हममें से बहुत सारे लोग उसी दकियानुसी जिन्दगी और बोझिल ढर्रे के साथ जीते हुए बाहर तक झाँकना नहीं चाहते, प्रकृति और जलाशयों का आनंद पाना तो दूर की बात है।

प्रकृति और परिवेशीय सुकून से कोसों दूर बंद कमरों, एयरकण्डीशण्ड में बैठने वाले लोगों के जीवन में नैसर्गिक और सहज-स्वाभाविक आनंद का अनुभव बेमानी है। इन लोगों के शरीर के घटक द्रव्यों में पंच तत्वों में से किसी न किसी तत्व की कमी हो जाती है अथवा सभी तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है।

यह असंतुलन अपने आप में मानसिक और शारीरिक बीमारियों का सृजन करता हुआ इंसान को दवाइयों पर जिंदा रहने को विवश कर दिया करता है। फिर इन लोगों के लिए चंद फीट के बंद कमरे और एकान्त की विवशता जीवन भर के लिए तय हो जाती है।

जो जितना अधिक घूमता-फिरता है वह उतना अधिक मस्त और बिंदास रहता है। इस सत्य को समझते सब हैं लेकिन निन्यानवे के फेर में मुद्रार्चन और भोग-विलास के आगे सब कुछ भूल जाते हैं।

यही वजह है कि समाज में अब दो तरह के लोगों का वजूद ही दिखता है। एक प्रकृति के साथ और आस-पास रहने वाले और दूसरे बंद कमरों में बिना वजह नज़रबंद।

देवझूलणी एकादशी पर सर्वत्र हमारी पुरातन परंपराओं का दिग्दर्शन होता है,  प्रभु जलाशयों तक विहार करते हैं और प्राणी मात्र को आनन्दोपलब्धि कराते हुए जीवन में नित नूतनता और ताजगी लाने के लिए प्रेरित करते हैं।

हममें से कितने लोग इस तत्व ज्ञान को समझ पाते हैं, यह आज भी रहस्य बना हुआ है। अपने क्षेत्र की संस्कृति, परंपराओं और उत्सवधर्मिता के तमाम रंग-रसों को देखें, अपने नौनिहालों को दिखाएं तथा इनका भरपूर आनंद लेते हुए अपने जीवन की मदमस्ती भरी यात्रा को और अधिक उपलब्धिमूलक बनाएं।

ये ही वे अवसर हैं जब भगवान अनकहे ही हम मनुष्यों को बहुत कुछ कह जाते हैं। प्रकृति और जलाशयों के संरक्षण, जलदेवता की श्रद्धापूर्वक आराधना और जल तत्व की महा महिमा का गान करता है आज का यह उत्सव।

सभी को देवझूलणी ग्यारस की मंगलमय शुभकामनाएँ ....।

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- डॉ0 दीपक आचार्य

 

dr.deepakaacharya@gmail.com

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