हास्य-व्यंग्य - सुपरवाइजर

 

रामनरेश उज्जवल हास्य व्यंग्य सुपरवाइजर

‘सुपरवाइजर’ शब्द अंगेजों द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी या आंग्लभाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ निरीक्षणकर्ता, संचालनकर्ता एवं प्रबंधकर्ता है। ये बात दीगर है कि आराम फरमाने के सिवा वह करता कुछ नहीं है।

‘सुपर’ और ‘वाइजर’ दोनों शब्दों का अर्थ अलग-अलग है। ‘सुपर’ का अर्थ ऊपर, अधिक या अतिरिक्त एवं फालतू है। ‘वाइजर’ का अर्थ शिरस्त्राण-संलग्न, मुखारण, बुर्का, नकाब एवं घूँघट है। यानि फालतू का घूँघट या नकाब ओढ़ने वाले को ही ‘सुपरवाइजर’ नाम से पुकारा जाता है। यह सत्य है कि सुपवाइजर अपने चेहरे पर असत्य का मुलम्मा लेपता एवं लगाता है। गम्भीरता को ओढ़ता-बिछाता और पहनता है। बेअक्ल के घोड़े को खूब तेज दौड़ाता है और बिना पूँछ की मंजिल तक पहुँच कर अपनी पीठ थपथपाता है।

सुपरवाइजर बनना किसी साधारण इंसान के बस की बात नहीं है। साधारण ईमानदार मनुष्य इस कार्य को कदापि नहीं कर सकता है। यह कार्य वही कर सकता है, जिसके अन्दर असीम धैर्य और साहस हो, ताकि वह अपने अपमान को सहन कर भी मुस्कुराते हुए मालिक की जी-हुजूरी करता रहे। सुपरवाइजर के अन्दर शर्म नाम की कोई चीज नहीं होती है, क्योंकि जो करे शरम, उसके फूटे करम। उसे कर्मचारी और मालिक दोनों के अपशब्दों या गालियों को सुनने का आदी होना पड़ता है। वह हमेशा चिकने घड़े की तरह होता है। उसे मान-मर्यादा सब भूलना पड़ता है। वह खुद गुलामी की जंजीरों से जकड़ा रहता है और अपने अधीन कर्मचारियों को पुश्तैनी गुलाम मानने की बीमारी से ग्रस्त रहता है।

बुद्धिहीनता सुपरवाइजर की सबसे बड़ी पहचान होती है। सच पूछें तो वही उसकी जान होती है। सोचने-समझने वाला समझदार प्राणी जिल्लत बर्दाश्त करने में असफल रहता है। बैल-बुद्धि प्राणी इस कार्य में सदैव सफल रहता है। मालिक के लिए कमाऊ गधा साबित होता है।

अज्ञानता सुपरवाइजरी का बोनमैरो है। अज्ञानी अपने आपको बहुत बड़ा ज्ञानी मानता है। हमेशा अज्ञानता का ज्ञान बाँटता है। अपने को प्रकांड विद्वान मानता है। ऐसा आदमी ही सुपरवाइजरी का तमगा धारण करता है।

सुपरवाइजर का गूँगा-बहरा होना अत्यन्त आवश्यक है। वह मालिक के सामने गूँगा होता है और कर्मचारियों के सामने बहरा होता है। वह कर्मचारियों को आँय-बाँय-साँय बोलता है और मालिक की आँय-बाँय-साँय सुनता है। कभी-कभी न वह बोलता है, न सुनता है। सिर्फ सूँघता है और इसी से अपने काम को अन्जाम तक पहुँचाता है।

सुपरवाइजर नामक प्राणी गिरगिट की तरह रंग बदलने में दक्ष होता है। मक्कारी का ग्लूकोज उसकी रंगों में होना अनिवार्य है। इसी की वजह से वह सही अवसर का अनुचित लाभ उठाता है। कुछ विद्वानों ने इसकी तुलना विभिन्न चालाक जीव-जन्तुओं से की है। जैसे उल्लू, भेड़िया,गीदड़, लोमड़ी, कुत्ता, चील, कौआ-बाज आदि इत्यादि। इसके अतिरिक्त हूस, चीकू, चिर्कुट, जंगली, बोदे, डरपोक आदि उपमानों से भी अभिहित किया है।

सुपरवाइजर के पास कोई काम नहीं होता है, इसलिए वह सिर्फ दूसरों के फटे में टाँग अड़ाता है।

 

काम नहीं कुछ करने को तो चुगली कर।

चुगली से जब पेट भरे तो उँगली कर।।

मजा बहुत है उँगली करने में प्यारे।

काम बनेंगें कलयुग में इससे सारे।

 

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रहीम दास कहते हैं कि सुपरवाइजर कुत्ते की तरह बहुत खतरनाक होता है। जैसे कुत्ता दोस्ती करने पर मुँह चाटने का प्रयास करता है और दुश्मनी करने पर भौंकता एवं काटता है। उसी प्रकार सुपरवाइजर भी दोस्ती करके अन्दर के राज जानकर हानि पहुँचाता है। दुश्मनी करने पर नौकरी से निकलवाने की भारी भरकम धमकी देता है। अतः इस प्रकार के प्राणियों से सदैव समान दूरी बनाकर रखें। न उससे दोस्ती करें और न ही दुश्मनी करें। यही हितकर एवं लाभकारी है।

रहिमन ओछे नरन ते, तजौ बैर अरू प्रीत।

काटे-चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति विपरीत।।

...............

जीवन-वृत्त

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नाम : राम नरेश ‘उज्ज्वल‘

पिता का नाम : श्री राम नरायन

विधा : कहानी, कविता, व्यंग्य, लेख, समीक्षा आदि

अनुभव : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग पाँच सौ

रचनाओं का प्रकाशन

प्रकाशित पुस्तके : 1-‘चोट्टा‘(राज्य संसाधन केन्द्र,उ0प्र0

द्वारा पुरस्कृत)

2-‘अपाहिज़‘(भारत सरकार द्वारा राश्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत)

3-‘घुँघरू बोला‘(राज्य संसाधन केन्द्र,उ0प्र0 द्वारा पुरस्कृत)

4-‘लम्बरदार‘

5-‘ठिगनू की मूँछ‘

6- ‘बिरजू की मुस्कान‘

7-‘बिश्वास के बंधन‘

8- ‘जनसंख्या एवं पर्यावरण‘

सम्प्रति : ‘पैदावार‘ मासिक में उप सम्पादक के पद पर कार्यरत

सम्पर्क : उज्ज्वल सदन, मुंशी खेड़ा, पो0- अमौसी हवाई अड्डा, लखनऊ-226009

ई-मेल : ujjwal226009@gmail.com

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